अजित पवार ने महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम पद की शपथ ली

मुंबई। एएनएन (Action News Network)

एनसीपी नेता अजित पवार ने महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम पद की शपथ ली। राज्यपाल कोश्यारी ने आज सुबह पहले देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की और बाद में अजित पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। महाराष्ट्र में बड़े राजनीतिक फेरबदल के तहत भाजपा और एनसीपी साथ आ गए हैं। 

महाराष्ट्र में शिवसेना, एनीसपी और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनने को लेकर सहमति बन चुकी थी। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को सीएम बनाने पर सहमति बन चुकी थी। आज बाकी मुद्दों पर बातचीत के बाद सरकार गठन की तारीख तय होती, तभी रातोंरात सियासी तस्वीर बदल गई। राजनीतिक पंडितों को चौंकाते हुए शनिवार सुबह बीजेपी ने एनसीपी नेता अजित पवार के समर्थन से सरकार बना ली। देवेंद्र फडणवीस दूसरी सीएम बन गए जबकि अजित पवार ने डेप्युटी-सीएम पद की शपथ ली।

शिवसेना ने दावा किया कि अजित पवार ने एनसीपी चीफ शरद पवार को धोखा दिया और इस सरकार को एनसीपी चीफ का समर्थन नहीं है। बाद में शरद पवार ने ट्वीट कर इस दावे की पुष्टि कर दी। इस अचानक उलटफेर से हर कोई हैरान है, लेकिन देश की सियासत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी कई ऐसे मौके आए हैं, जब सियासत की तस्वीर अचानक इस तरह बदली, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

एक वोट से गिर गई थी अटलजी की सरकार
1998 में NDA गठबंधन से अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन 13 महीने में ही सरकार गिर गई। दरअसल, AIADMK प्रमुख जे. जयललिता लगातार सरकार से कुछ मांगें कर रही थीं। उस वक्त तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी और एम करुणानिधि मुख्यमंत्री थे। जयललिता चाहती थीं कि केंद्र तमिलनाडु सरकार को बर्खास्त कर दे। ऐसा नहीं होने पर जयललिता ने NDA से समर्थन वापस ले लिया और बीजेपी को सदन में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा।

17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस हुई। बीएसपी की नेता मायावती ने वोटिंग में हिस्सा न लेने का फैसला किया। फिर थोड़ी ही देर में उन्होंने अपना फैसला बदल दिया और एनडीए के विरोध में वोट कर दिया। अब सदन की निगाहें कोरापुट से सांसद गिरधर गोमांग पर थीं। दो महीने पहले ही गोमांग ओडिशा के मुख्यमंत्री बने थे। ऐसे में छह महीने के भीतर उन्हें ओडिशा में विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुना जाना था लेकिन,उन्होंने लोकसभा की सदस्यसता से इस्तीफा नहीं दिया था।

गोमांग ने बीजेपी सरकार के विश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट कर दिया। उधर, अटल सरकार में शामिल नैशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के सांसद सैफुद्दीन सोज ने पार्टी मैंडेट से हटकर विरोध में वोट कर दिया। ऐसे में बीजेपी सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े जबकि विरोध में 270 वोट पड़ गए और अटल सरकार एक वोट से विश्वासमत हार गई। बाद गोमांग ने कहा भी कि अटल सरकार गिराने के लिए वह नहीं, सोज जिम्मेदार हैं। बाद में सोज ने एनसी छोड़कर कांग्रेस पार्टी जॉइन कर लिया। वह अब भी कांग्रेस में ही हैं।

BJP ने चला ऐसा दांव, देखती रह गई शिवसेना

एक दिन के लिए यूपी के सीएम बने थे जगदंबिका पाल
1998 में यूपी की सियासत में ऐसा ही एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला था, जब सिर्फ एक दिन के लिए जगदंबिका पाल सीएम बन गए थे। अगले ही दिन उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। हुआ यूं कि 21-22 फरवरी, 1998 की रात उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राज्‍य में राष्‍ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की, लेकिन केंद्र ने इसे ठुकरा दिया।

बीजेपी के मुख्‍यमंत्री कल्‍याण सिंह ने बाहरी विधायकों को साथ लेकर सरकार बनाई जिसका विपक्ष ने इसका विरोध किया। गवर्नर भंडारी ने भी ऐतराज जताया और सरकार को बर्खास्‍त करने का निर्णय किया। इसके बाद उन्‍होंने जगदंबिका पाल को सीएम पद की शपथ दिला दी। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी इस फैसले के खिलाफ धरने पर बैठ गए और कल्याण सिंह के समर्थक मामले को लेकर हाई कोर्ट चले गए। हाई कोर्ट ने गवर्नर के फैसले पर रोक लगा दी और फिर कल्याण सिंह दोबारा सीएम बन गए।

…और बड़े उलटफेर के साथ फिर सीएम बने येदियुरप्पा
2018 के कर्नाटक विधानसभा के नतीजे के बाद बीजेपी 104 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। बीएस येदियुरप्पा ने 17 मई, 2018 को सीएम पद की शपथ ली और दावा किया कि उनके पास बहुमत का आंकड़ा है।

मगर 19 मई को बहुमत परीक्षण से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनाई जो 14 महीने ही चल पाई। इसके बाद येदियुरप्पा फिर सीएम बने।