आतंकवाद विरोधी अभियान के लिए प्रेरक है बगदादी की मौत

डॉ. प्रभात ओझा/एआईएन
अबू-बकर अल-बगदादी जिसे बगदादी के नाम से पहचाना गया, उसका खात्मा हो गया है। जो लोग दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के बारे में जानते हैं, वह बगदादी के मारे जाने का मतलब समझ सकते हैं। जब भारत में दीपावली मनायी जा रही थी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर बताया कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है। यह ह्वाइट हाउस के लिए वास्तव में किसी बड़ी खबर का संकेत था। जहां खुद ट्रंप भी दीपावली उत्सव में शरीक हुए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बाद में बगदादी के मारे जाने का दावा किया। बगदादी के मारे जाने को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति के शब्दों में समझा जा सकता है। अबू-बकर अल-बगदादी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया का संस्थापक था। यह दुनिया का सबसे हिंसक और क्रूर संगठन है। अमेरिका कई वर्षों से बगदादी को खोज रहा था। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी बात में जो तथ्य जोड़ा, उससे आतंकवाद के प्रति पूरी दुनिया की चिंता का पता चलता है। ट्रंप ने इस ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए रूस, तुर्की और सीरिया का शुक्रिया भी अदा किया। यानी बगदादी को मारने के अभियान में अमेरिका अकेला नहीं था। यह अलग व्याख्या का विषय है कि सीरिया और इराक में आईएसआईएस के कब्जे वाले हिस्सों को मुक्त कराने के लिए और दूसरे देशों में आतंकवाद के खात्मे के लिए किस तरह के अभियान चलाये जाते रहे हैं। फिलहाल विषय बगदादी है, जो खुद में पढ़े-लिखे नौजवानों के भटककर मानवता के लिए खतरा बनने का प्रमाण है। दक्षिण एशिया के बाकी देशों के साथ हमारा देश भारत भी है, जहां आतंक का खतरा मुंह बाये खड़ा है।
ट्रंप कहते हैं कि बगदादी अमेरिकी सैनिकों के डर से भागा फिर रहा था। अंत समय में वह एक सुरंग में गिरकर मर गया। बगदादी ‘कुत्ते की मौत’ मरा। कहा गया कि उसने विस्फोटकों से लैस अपने जैकेट के जरिये खुद को उड़ा लिया। सवाल बगदादी कैसे मरा, यह नहीं है। मूल बात यह है कि 1971 में इराक के सामरा में एक मध्यमवर्गीय धर्मनिष्ठ परिवार में पैदा हुआ, इराक की सद्दाम यूनिवर्सिटी फॉर इस्लामिक स्टडीज से मास्टर्स और पीएचडी डिग्री हासिल करने के बावजूद वह इस्लाम से भटककर मानवता के लिए खतरा बना हुआ था। पढ़े-लिखे नौजवानों के इस तरह पथभ्रष्ट होने के चलते भारत सहित दक्षिण एशिया आतंकवाद के खतरे से कुछ अधिक ही दो-चार हो रहा है।
दक्षिण एशिया में आतंकी खतरे को भारत से अधिक भला कौन समझ सकता है। तमाम दूसरे संगठनों की तरह इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस एक बड़ी मुसीबत है। इस संगठन के लिए कुछ कट्टरपंथी ताकतों का काम करना बेहद चिंता का विषय है। अप्रैल में जब श्रीलंका के पूर्वी शहर कट्टनकुड़ी में कुछ चर्चों पर आतंकी हमले में ढाई सौ से अधिक लोग मारे गये, तब भी आईएसआईएस ने हमलों की जिम्मेदारी ली थी। इस संगठन ने भारत और पाकिस्तान में अपनी कुछ नई शाखाएं खोलने की जानकारी दी थी। चर्चा का अलग विषय है कि पाकिस्तान इस तरह के आतंकी संगठनों से हाथ मिलाकर हमारे खिलाफ षडयंत्र करता रहा है। श्रीलंका, भारत और पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश और मालदीव में भी सलफी यानी कट्टरपंथी इस्लाम तेजी से अपने पैर पसार रहा है। खुद श्रीलंका का कट्टनकुड़ी शहर, जहां ईस्टर के दिन ही आतंकी हमले हुए थे, इस तरह के सलफी कट्टरपंथियों का बड़ा ठिकाना है। इन हमलों का मुख्य संदिग्ध जहरान हाशिम ने यहां कट्टरपंथ को फैलाने में बड़ी भूमिका अदा की है। हमारे देश का मोस्ट वांटेड जाकिर नाइक भी उस खास सूची में है। जिसके लोग धर्म प्रचारक की शक्ल में आतंकवाद और घृणा के बीज बो रहे हैं। वर्ष 2016 में बांग्लादेश में एक बड़े हमले के बाद जाकिर नाइक पर शिकंजा कसना शुरू हुआ। कहा गया कि बांग्लादेश में उस हमले का जिम्मेदार युवक जाकिर नाइक के भाषणों से प्रेरित था। इस हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस ने ही ली थी। इसी तरह तबलीगी जमात का तारिक जमील भी है। तबलीगी जमात तो स्वतंत्रता और लोकतंत्र का समर्थक होने का दावा करता है, पर इस संगठन के मुखिया के भाषणों पर उत्तेजना फैलाने के आरोप हैं। कुछ समय पहले फिलीपींस में तबलीगी जमात से जुड़ा एक परिवार मस्जिद के जरिये युवाओं को चरमपंथ की ओर प्रेरित करते हुए पकड़ा गया था। भारत में यह एक धार्मिक संगठन के रूप में ही पहचान रखता है। इसके आतंकवाद से जुड़ने के प्रमाण नहीं मिलते। इससे जुड़े कुछ लोग जरूर संदिग्ध पाये गए। अप्रैल में ही केरल में एक युवा आतंकी ने स्वीकार किया था कि जाकिर नाइक के साथ वह तबलीगी जमात के तारिक जमील के भी भाषणों को सुना करता था।
असल में यह बड़ा घालमेल है कि आईएसआईएस और उसके प्रतिद्वंद्वी अलकायदा जैसे आतंकी समूह खुद को सही बताने के लिए विवादास्पद मध्यकालीन इस्लामिक विद्वान इब्न तैमियाह का हवाला देते हैं। इब्न तैमियाह को अपने ढंग से व्याख्यायित कर ये युवकों को कट्टरपंथ की ओर मोड़ देते हैं। श्रीलंका में आतंकी हमलों के बाद भी इस तरह के प्रमाण मिले थे। जांच के लिए एक भारतीय दल वहां गया था। पाया गया कि साल 2016 में केरल के मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग वहां गए थे। यह लोग वहां एक सलफी केंद्र में गए थे, जहां उन्होंने आईएसआईएस समर्थक विचार रखे। जिन लगभग 200 उपदेशकों को श्रीलंका से बाहर किया गया, उनमें ये लोग भी शामिल थे। भारत लौटने की बजाय ये लोग अफगानिस्तान जाकर आईएसआईएस में शामिल हो गए थे। इस तरह के प्रमाण मिलने के बाद मालदीव और बांग्लादेश में ऐसे तत्वों को रोकने की कोशिशें भी हो रही हैं। मालदीव में तो इस्लामिक समूह टेलिग्राम चैनल ‘मुर्ताद (धर्म से पथभ्रष्ट) वॉच एमवी’ चलाया जा रहा है। ऐसे चैनल पर उन लोगों की तस्वीरें और जानकारी दी जाती है, जो धर्म के खिलाफ माने जाते हैं। इन दोनों देशों में कुछ धर्मनिरपेक्ष लेखकों और विद्वानों की हत्या के पीछे इस तरह के कट्टरपंथी लोग ही जिम्मेदार माने गए हैं। असल में देखा जा रहा है कि धर्म को अपने ढंग से प्रस्तुत कर युवाओं को गलत रास्ते पर धकेलने का बड़ा षड्यंत्र चल रहा है। खुद इसी तरह भटककर दुनिया के लिए खतरा बना बगदादी तो बहुत बड़ा उदाहरण था। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप कहते हैं कि अब वह इस दुनिया से जा चुका है। वह क्रूर और हिंसक व्यक्ति था जिसकी मौत भी हिंसक तरीके से हुई। दुनिया अब बेहतर और सुरक्षित है। सच यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान तात्कालिक ही है। असल में दुनिया को बेहतर और सुरक्षित करने के लिए पूरी दुनिया की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।