वैज्ञानिक युग में भूतों का मेला बना बेचूबीर बाबा की चौरी

लाठी टेककर भी बाबा की चौरी तक पहुंचने की है वृद्ध महिलाओं की चाह

मीरजापुर। एएनएन (Action News Network)

अहरौरा से 14 किलोमीटर पश्चिम जंगलों व पहाड़ों के गर्भ में बसे बरही नामक निर्जन गांव की पहचान बेचूबीर बाबा धाम के नाम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। इतना ही नहीं आज के इस वैज्ञानिक युग में भूतों का यह मेला कौतूहल का विषय भी बना हुआ है, जहां कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को लाखों भक्तों का जत्था अलग-अलग रवाना हुआ।

सन्नाटे में डूबे इस बियावान जंगल की तन्मयता लाखों श्रद्धालुओं के कोलाहल और वाहनों की चीत्कार से भंग हो रही है। अंतरप्रांतीय भक्तों को एक जगह इकट्ठा करने वाले बाबा के धाम में मानों तिल रखने की भी जगह नहीं बची है। नौनिहालों को गोद में लिए हुए पैदल यात्रा में शामिल महिलाओं की दशा दयनीय बनी रही। श्रद्धा पर नतमस्तक वृद्ध औरतें भी किसी तरह लाठी टेकते हुए तो कुछ ट्रैक्टर पर सवार होकर बाबा के धाम में पहुंच रही है।

मेला धाम में श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे बेसहारा की तरह अपनी मनोकामना पूर्ति की इच्छा संजोए बाबा की चौरी पर टकटकी लगाए बेसुध नजर आए। वीरान स्थल पर विद्यमान नीम के पेड़ के नीचे स्थित बेचूबीर बाबा की चौरी को आकर्षक रूप से सजाया गया है। अधिक भीड़ के चलते इस पहाड़ी और जंगली क्षेत्र में श्रद्धालुओं के दुख-दर्द बांटने की फुर्सत किसी को नहीं है।

रोज कमाने-खाने वालों ने इस पर्व पर मेला क्षेत्र में रास्ते भर चाय-पान की कई दुकानें लगा रखी हैं, जिससे यातायात में दुर्व्यवस्था नजर आई। गंदगी के चलते गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं की हालत बद से बदतर हो गई है। संतान प्राप्ति की इच्छा व प्रेत बाधा से ग्रसित महिलाओं के ऊल-जुलूल कारनामों से भय-दहशत एवं रोमांच का माहौल पूरे मेला क्षेत्र में कायम है। दर्शनार्थियों की आस्था और विश्वास का केंद्र वह चौरी है, जिसे आने वाला हर पीड़ित सजल नेत्रों से नतमस्तक हो एकटक देखता ही जा रहा है। परंपराओं के अनुसार बेचूबीर के इस मेले में मनरी नामक वाद्य यंत्र के बजते ही पुजारी की विशेष पूजा के बाद भीड़ की कोलाहल ठहर जाती है और श्रद्धालुओं के आस्था और विश्वास के इस पर्व को अश्रुपूरित नजरों से अन्त मे विदा कर दिया जाता है।

नहीं टूट रही दर्शनार्थियों की लड़ी
बाबा तक पहुंचने की चाह में भक्तों की अनवरत् चल रही कतार टूट ही नहीं रही है, हजारों की संख्या से ऊपर आस्थावान बाबा का नाम लेकर निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं। मेला क्षेत्र में प्यास से गला तर करने का पर्याप्त प्रबंध नहीं है। बावजूद इसके श्रद्धा और विश्वास चरम पर है। एकादशी की भोर सूर्य की लालिमा के पूर्व पुजारी का शेर सरीखे चिंघाड़ते हुए चौरी पर पहुंचकर चित्कार करना ही इस अलौकिक और दुर्लभ मेले का आध्यात्म माना जा रहा है। संगत का साज अतिप्राचीन मनरी नामक वाद्य यंत्र है, जो थम चुके शोर का विस्फोटक कोलाहल है। पूरा मेला क्षेत्र इस दौरान भक्तिमय हो जाता है मानो दुनिया में किसी को किसी की फिक्र ही नहीं।

जंतर धारण करने से मिलती है ऊपरी बाधाओं से मुक्ति
मेले में पुजारी बृजभूषण यादव से बेचूबीर बाबा के जंतर की सबसे ज्यादा मांग की जा रही है। यहां आने वाले श्रद्धालु दर्शन-पूजन के अलावा जंतर भी खरीद रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह जंतर धारण करने से ऊपरी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

आर्य समाज करता है पाखंड का विरोध
आर्य समाज के लोगों का कहना है कि दुष्टों पाखंडियो का गढ़ हम सब मिलकर तोड़ेंगे, इस भूत प्रेत के मेले को आदर्श बनाकर छोड़ेंगे। आर्य समाज चित्कार कर निर्वस्त्र हो रही महिलाओं की लज्जा का विरोध करता है। टेन्ट के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का प्रयास निरंतर जारी है। परंतु बाबा के प्रति आस्था के सामने इनका जागृति अभियान औचित्यहीन बन गया।