थमती सांसों के लिए आखिर जिम्मेवार ठहराये तो किसे?

ङा एस डी सेठी

आदरणीय मुख्यमंत्री जी
श्री अरविंद केजरीवाल जी, सस्नेह नमस्कार। मैं दिल्ली का रहने वाला पर्यावरण प्रेमी बेहद ही दुख सहित स्कूल विद्यार्थियों की बढते पलूशन, और बिगडते पर्यावरण पर क्या सोच है, खुलासा करना चाहता हूं। आशा है आप इस सीनियर सिटीजन को क्षमा करेंगें। राजधानी दिल्ली में बढते जानलेवा पलूशन लेवल के मद्देनजर दिल्ली के स्कूलों में पांच नवंबर तक छुट्टी घोषित करने का ऐलान दिल्ली सरकार ने जारी तो कर दिया, लेकिन स्कूल बंद करने के पीछे बच्चोंं में बढते पलूशन पर जागरूकता का ज्ञान कहीं से भी दिखाई नहीं पड रहा है। बच्चों को स्कूलों के पलूशन से बचाव के लिए 50 लाख थूथन (मास्क) जरूर दे दिए गये हैं।

दिल्ली सरकार के स्कूल बंद करने की मंशा बच्चोंं को मौजूदा खतरनाक दम्मघौंटू हालात से शारीरिक बचाव के चलते घरों में सुरक्षित रहने की हिदायत दी गयीं थी, साथ ही घरों में रहकर बच्चे अपने स्वास्थ्य और बिगडते पर्यावरण पर अपनी चिंता करें लेकिन स्कूल बंद होने के पहले ही दिन घरों में रहने के सभी दावों और सलाह के विपरीत बच्चोंं ने पलूशन पर चिंता के बजाये पार्को में जमकर धूल, मिट्टी को उडाया। फुटबाल, क्रिकेट जैसी गहरी सांसो को लेने वाले खेल खेलते नजर आये। उन्होंने दिल्ली सरकार द्वारा दिये गये मास्क तक दरकिनार कर खुले मुंह भोर में जमकर धूल मिट्टी उडाते और फांकते हर तरफ दिखाई दिये।

जब मैंने बुजुर्ग होने के नाते बढते खतरनाक पलूशन पर सावधानी बरतने की सलाह दी तो दसवीं, बाहरवीं क्लास में पढने वाले बच्चों सरकार की खिल्ली उडाते हुए बडे बे फिक्र लहजे में धमकाया और कहा कि स्कूल की छुट्टी हो गयी है तो इससे हमें क्या लेना।

अक्सर हम लोग तो स्कूल की छुट्टी के दौरान ऐसे ही मजे लुफ्त उठाते हैं। यानि उनके चेहरे पर जरा भी इस खतरनाक जानलेवा पलूशन स्थिती पर जरा भी खौफ या जिम्मेवारी का भाव दिखाई नहीं दिया। उल्टा उन्हें समझाने पर टका सा जवाब और मिल गया कि अंकल आप जाओं आपको इससे क्या मतलब। शरीर, स्वास्थ्य का नुकसान होगा तो हमारा ही न। लेकिन अज्ञानी यह भूल गये कि पार्क मैं बुजुर्ग, बिमार सांस व दम्मा पीडित भी सैर व स्वास्थ्य लाभ और योग आदि करने वालों पर फुटबाल, क्रिकेट खेलने से पार्क के माहोल में उडने वाली धूल के लपेटे में अन्य लोगों का भी दम घुट लपेटे में आ रहे हैं।

पीडित बुजुर्गों ने उन स्कूली बच्चोंं से अपनी खैर मनाते हुए चुप रहना ही बेहतर समझा। और उनको मिल रही किताबी ज्ञान को सभी बुजुर्ग कोसने लगे। हमने यही समझा और जाना कि सरकार या शिक्षकों का मकसद सिर्फ स्कूल, संस्थानों को बंदकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने जैसा पर्व मनाया जा रहा है। असल में होना यह चाहिए था कि स्कूलों में बाकायदा उन्हें शिक्षकों के माध्यम से तसल्ली बख्श इस ज्वलंत विषय पर स्कूली बच्चों को जागरूक करना चाहिए था। कि सरकार जीवन पर आ रहे आपात खतरे की धंटी को भांपते हुए उन्हें भी जिम्मेदारी का एहसास करवाते हुए इस मिशन में शामिल करती।

इससे उनको बिगडते पलूशन हालात और उसके निदान के प्रति चिंता होती और आगे बडकर इस पर काम करते। यहां उल्टा उन्हें बेपरवाह कर स्कूल बंद करने का ऐलान कर निश्चिंत कर दिया। तब क्यों नहीं 10वीं 12 वीं कक्षा के विधार्थी अपात स्थिति में बंद स्कूलौं की घोषणा से बच्चोंं में गम्भीरता दिखने की बजाय खुशी का माहोल है। ऐसी हालत में हमदेश के भविष्य इन नौनिहालो को क्या शिक्षा दे पा रहे हैं। यह एक राष्ट्रीय चिंतन का विषय हैं, जिसे हम छुट्टीयों के उपहार में बच्चों में बांट रहे हैं। बच्चोंं में जरा भी गम्भीरता की सोच नहीं पनपाने में खालिस किताबी ज्ञान देने के नतीजे खासे डरावने लगने लगे हैं। प्रैक्टिकल से कौसों दूर यह अहसास दिलाता है उनकी राष्ट्रीय समस्याओ से विमुखता।

शिक्षक सरकार बच्चों में बढते पलूशन, बिगडते पर्यावरण के असर से बढते रोगौं पर चिंता के चलते उन्हें लेख, निबंध, डिबेट जैसे सवालों पर अभी से ही घेरा जाना चाहिए। बल्कि एक पूरा अध्याय विषय अलग से अनिवार्य सम्मलित करना चाहिए। इस विषय पर सौ प्रतिशत नम्बर लाना जरुरी रखना चाहिए। इस पर कोई छूट बर्दाश्त नहीं हो। लेकिन देखने में आ रहा है कि ऐसे राष्ट्र हित के गम्भीर विषयों से दूर अंग्रेजीयत शैली में स्कूलों को व्यापार में तब्दील करने की होढ मची हुई है। दडबे रूपी छोटे छोटे प्राईवेट स्कूलों पर खास नजर रखनी जरूरी है कि वह कौन सी शैली में ज्ञान परोस रहे हैं, जहां से ऐसे शिक्षित होनहारों को जमीन पर उतार रहे हैं जिन्हें बडे बुजुर्गों तक से बात करने की तहजीब तक नहीं दी जा रही है।

उजडती हरियाली, बिगडता पर्यावरण और थमती सांसों पर बच्चोंं की निर्भीक घोर लापरवाही के लिए आखिर जिम्मेवार ठहराये तो किसे? सरकार-माता-पिता या शिक्षक जो वर्तमान में गम्भीर राष्ट्रीय मुद्दों पर गम्भीर चिंतन की बजाये, सिवाय खाऔ पियो और ऐश करो की कार्यशैली को अपनाते जा रहे हैं। इन खतरनाक हालातों पर हम कैसे राष्ट्र निर्माण की कल्पना कर रहे हैं। जरा सोचिये? अभी भी वक्त है। इन गलियों को सुधारने का। मेरा सिर्फ निवेदन यह है कि भविष्य के राष्ट्र निमातार्ओं को ठीक सा गढने का अवसर दिया जाये।