
यूपी में आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए ऐतिहासिक शुरुआत : समय पर मिलेगा पूरा वेतन, सामाजिक सुरक्षा की भी गारंटी
यूपी में आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए ऐतिहासिक शुरुआत : समय पर मिलेगा पूरा वेतन, सामाजिक सुरक्षा की भी गारंटी
– आउटसोर्स कर्मियों के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'यूपीकोस' का किया विधिवत शुभारंभ, पोर्टल और वेबसाइट लॉन्च
– आउटसोर्सिंग व्यवस्था में बिचौलियों का खेल खत्म, अब हर महीने की 5 तारीख तक सीधे खाते में आएगा वेतन
– एजेंसियां अब मनमाने ढंग से नहीं कर सकेंगी छंटनी, नई एजेंसी आने पर भी बरकरार रहेगी पुराने कर्मियों की नौकरी
– आउटसोर्स पद चार श्रेणियों में बंटे, डॉक्टरों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मियों तक का मानदेय हुआ निर्धारित
– एमबीबीएस डॉक्टर, इंजीनियर को न्यूनतम 40 हजार और चतुर्थ श्रेणी कर्मियों को 20 हजार रुपये मानदेय मिलेगा
– सभी आउटसोर्स कर्मियों को मिलेगा ईपीएफ और ईएसआई का पक्का कानूनी सुरक्षा कवच
– ईएसआई के तहत मुफ्त इलाज, दवाएं और महिला कर्मियों को मिलेगा पूरा सवेतन मातृत्व अवकाश
– दुर्घटना में मृत्यु या दिव्यांगता पर बिना किसी प्रीमियम के बैंक खाते से मिलेगा 40 लाख रुपये तक का कवर
– चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के बच्चों का उच्च शिक्षा या सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में चयन होने पर 1 लाख रुपये की मदद
– आउटसोर्स भर्तियों में लागू होगा संवैधानिक आरक्षण, जेम पोर्टल के जरिए पारदर्शी ढंग से चुनी जाएंगी एजेंसियां
लखनऊ,
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के जीवन में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को राजधानी लखनऊ स्थित लोक भवन में उत्तर प्रदेश आउटसोर्सिंग सेवा निगम यानी ‘यूपीकोस’ का विधिवत शुभारंभ किया। इस खास मौके पर मुख्यमंत्री ने निगम का आधिकारिक लोगो, वेबसाइट और पोर्टल जनता को समर्पित किया। कार्यक्रम के दौरान आउटसोर्स कर्मियों को पारिश्रमिक के चेक भी वितरित किए गए। प्रदेश के सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों, नगर निकायों और शिक्षण संस्थानों में करीब 3.5 लाख युवा वर्षों से सेवा दे रहे हैं। काम पूरी तरह सरकारी था लेकिन उनकी आजीविका की सुरक्षा निजी एजेंसियों के भरोसे छोड़ दी गई थी। यूपीकोस का गठन इसी बड़ी खाई को पाटने का एक ऐतिहासिक प्रयास बनकर उभरा है।
बिचौलियों के चंगुल में फंसी थी पुरानी व्यवस्था
पुरानी व्यवस्था में आउटसोर्स कर्मचारी हमेशा खुद को असहाय महसूस करता था। कर्मचारी काम तो सरकारी विभाग का करता था, लेकिन उसका वेतन निजी एजेंसी के माध्यम से आता था। सरकार इस पूरे लेन-देन से एकदम अलग-थलग दिखाई पड़ती थी। किसी भी समस्या के समाधान के लिए कर्मचारी को तीन दरवाजों के चक्कर काटने पड़ते थे। विभाग उसे एजेंसी के पास भेजता था और एजेंसी उसे टरका देती थी। कागज पर दर्ज वेतन और हाथ में आने वाली रकम में जमीन-आसमान का अंतर होता था। बिना किसी जवाबदेही के काम कर रहीं ये एजेंसियां कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई में से भी हिस्सा काट लेती थीं। इसके अलावा कई जगह महीनों तक वेतन न मिलना एक सामान्य बात बन चुकी थी।
शोषण, कटौती और भय के अंतहीन दौर का अंत
पहले के दौर में आउटसोर्सिंग का दायरा मनमानी और शोषण का पर्याय बन चुका था। एजेंसियां कर्मचारियों के पारिश्रमिक से मनमाने ढंग से अवैध कटौती करती थीं। नौकरी पर रखने और अनुबंध के नवीनीकरण के नाम पर गरीब अभ्यर्थियों से धन उगाही की शिकायतें आम थीं। चयन की कोई पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था न होने से मेधावी युवा पिछड़ जाते थे। ईपीएफ और ईएसआई की सुविधाएं सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गई थीं। कई कर्मचारियों के खाते तक नहीं खोले जाते थे। यदि खाते खुल भी गए तो उनमें पैसा समय पर जमा नहीं होता था। एजेंसी बदलते ही पुराना जमा पैसा फंस जाता था। नतीजतन बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में कर्मचारियों को कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाती थी।
त्रिपक्षीय व्यवस्था से पारदर्शी समाधान की व्यवस्था
इस गंभीर और पुरानी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने एक मजबूत निगम की नींव रखी है। यूपीकोस के माध्यम से अब शोषण के सारे रास्ते बंद किए जा रहे हैं। नई नीति के तहत विभाग, यूपीकोस निगम और सेवा प्रदाता एजेंसी एक कानूनी त्रिपक्षीय समझौते से बंधेंगे। संबंधित सरकारी विभाग अपनी आवश्यकता सीधे निगम को भेजेगा। निगम तय नियमों के तहत एजेंसी के जरिए कुशल कर्मचारी उपलब्ध कराएगा। इस व्यवस्था से कर्मचारी अब अकेला नहीं रहेगा और सरकार उसकी सुरक्षा की सीधी गारंटर बनेगी। व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए एजेंसियों का चयन जेम पोर्टल के जरिए होगा। सभी कर्मचारियों की भर्ती, उपस्थिति और भुगतान का पूरा ब्योरा एक ही पोर्टल पर दर्ज रहेगा। नियम तोड़ने वाली एजेंसियों को तुरंत ब्लैकलिस्ट कर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा।
हर महीने की पांच तारीख पर आ जाएगी तनख्वाह
नई व्यवस्था का सबसे क्रांतिकारी और राहत देने वाला पहलू समय पर पूरा भुगतान सुनिश्चित करना है। अब हर महीने की पांच तारीख को कर्मचारी के बैंक खाते में पूरा पारिश्रमिक सीधे पहुंचेगा। काम का आकलन हर महीने की इक्कीस तारीख से लेकर अगले महीने की बीस तारीख तक किया जाएगा। व्यवस्था ऐसी बनाई गई है कि एजेंसी को पहले कर्मचारी के खाते में पूरा वेतन जमा करना होगा। जब कर्मचारी का वेतन सुरक्षित हो जाएगा, उसके बाद ही निगम एजेंसी को उसका तय कमीशन जारी करेगा। यदि किसी विभाग में समय पर बजट उपलब्ध नहीं होगा, तो भी कर्मचारी का वेतन नहीं रुकेगा। ऐसे हालात में वित्त विभाग से अग्रिम बजट लेकर कर्मचारियों को समय पर पैसा दिया जाएगा और विभाग बाद में यह राशि लौटाएगा।
छंटनी की मनमानी पर लगेगी पूरी तरह से रोक
आउटसोर्स कर्मचारियों के मन में हर वक्त छंटनी की तलवार लटकती रहती थी। एजेंसियां अपनी मर्जी से किसी को भी बाहर का रास्ता दिखा देती थीं। यूपीकोस ने इस डर को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। अब कोई भी एजेंसी अपनी मर्जी से किसी कर्मचारी को हटा नहीं सकेगी। अनुशासनहीनता या गंभीर शिकायत की स्थिति में भी विभाग और निगम दोनों की लिखित मंजूरी अनिवार्य होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि तीन या चार साल बाद जब पुरानी एजेंसी की जगह नई एजेंसी आएगी, तब भी कार्यरत कर्मचारियों को हटाया नहीं जाएगा। नई एजेंसी को अनिवार्य रूप से वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों को ही अपने साथ बनाए रखना होगा। एजेंसी का कार्यकाल अधिकतम चार वर्ष तक सीमित रहेगा और उसका सर्विस चार्ज भी सरकार द्वारा पहले से तय होगा।
विशेषज्ञों और डॉक्टरों को श्रेणी एक में मिलेगा सम्मान
निगम ने सभी पदों और योग्यताओं को पारदर्शी बनाते हुए चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी में उच्च शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी दक्षता वाले पेशेवरों को रखा गया है। इसमें एमबीबीएस डिग्री धारक चिकित्सक, सहायक अभियंता, प्रोजेक्ट अधिकारी और वरिष्ठ लेखा अधिकारी जैसे पद शामिल हैं। इस श्रेणी के कर्मियों का मासिक मानदेय न्यूनतम 40 हजार रुपये निर्धारित किया गया है। सरकारी अस्पतालों में संविदा पर सेवा देने वाले डॉक्टरों को अब न सिर्फ सम्मानजनक मानदेय मिलेगा, बल्कि उन्हें पहली बार ईपीएफ, ईएसआई और बीमा का पक्का कानूनी संरक्षण भी हासिल होगा।
तकनीकी और प्रशासनिक पदों के लिए श्रेणी दो की व्यवस्था
दूसरी श्रेणी में स्नातक स्तर की डिग्री और विशेष तकनीकी डिप्लोमा रखने वाले कर्मियों को शामिल किया गया है। इसमें अस्पतालों में दिन-रात सेवा देने वाली स्टाफ नर्स, जूनियर इंजीनियर, सीनियर असिस्टेंट और लीगल असिस्टेंट जैसे महत्वपूर्ण पद आते हैं। इन पदों के लिए न्यूनतम 25 हजार रुपये का मासिक मानदेय तय किया गया है। अस्पताल की समर्पित नर्स हो या दफ्तर का तकनीकी सहायक, सरकार ने दोनों को एक मजबूत और सुरक्षित सामाजिक ढांचे से जोड़ा है। इस व्यवस्था से सेवा के स्तर में सुधार होगा और कर्मियों में अपने दायित्व के प्रति आत्मसम्मान का भाव मजबूत होगा।
इंटर पास कर्मियों के लिए श्रेणी तीन में मिली सुरक्षा
तीसरी श्रेणी में उन कर्मचारियों को रखा गया है जो इंटरमीडिएट उत्तीर्ण हैं और कार्यालयों के संचालन में रीढ़ की तरह काम करते हैं। इसमें डाटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर टाइपिस्ट, स्टोरकीपर, इलेक्ट्रीशियन, पैरामेडिकल स्टाफ, ड्राइवर, मैकेनिक और लैब असिस्टेंट शामिल हैं। इनका मानदेय न्यूनतम 22 हजार रुपये तय किया गया है। जूनियर हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी कर सरकारी तंत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या सबसे अधिक है। पूर्व में सबसे अधिक वेतन कटौती और देरी की मार इसी वर्ग पर पड़ती थी। अब इन्हें तय समय पर सम्मानजनक पारिश्रमिक की पक्की गारंटी दे दी गई है।
बुनियादी कर्मियों को श्रेणी चार में मिला बड़ा सहारा
चौथी श्रेणी में कक्षा आठ और दस पास अत्यंत परिश्रमी कर्मियों को शामिल किया गया है। इनमें सफाई कर्मी, स्वीपर, सुरक्षा चौकीदार, माली, रसोइया, वार्ड ब्वॉय और अनुसेवक जैसे आवश्यक पद आते हैं। इन पदों के लिए न्यूनतम 20 हजार रुपये का मानदेय तय किया गया है। ये वे हाथ हैं जिनके बिना अस्पताल, कार्यालय और नगर निकाय एक दिन भी नहीं चल सकते। पिछली व्यवस्था में सबसे कम मानदेय और सबसे अधिक शोषण इन्हीं बुनियादी कर्मियों का होता था। योगी सरकार ने इन्हें न्यूनतम वेतन, ईपीएफ, स्वास्थ्य बीमा और कानूनी संरक्षण देकर सबसे बड़ा सामाजिक संबल प्रदान किया है।
परिवारों के लिए कल्याण और शिक्षा का संबल बनेगी सरकार
यह नई नीति सिर्फ कर्मचारी तक सीमित नहीं है बल्कि उसके पूरे परिवार की खुशहाली का ध्यान रखती है। सेवा के दौरान किसी कर्मचारी की असामयिक मृत्यु होने पर तत्काल राहत के रूप में अंतिम संस्कार के लिए पंद्रह हजार रुपये दिए जाएंगे। श्रेणी चार के गरीब कर्मचारियों के होनहार बच्चों के लिए विशेष कल्याण कोष बनाया गया है। यदि किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मी का बेटा या बेटी आईआईटी, आईआईएम, एमटेक, मेडिकल या संघ अथवा राज्य लोक सेवा की मुख्य परीक्षा में चयनित होता है, तो उसे एक लाख रुपये की विशेष प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। एक परिवार में एक बच्चे को यह सहायता मिलेगी ताकि आर्थिक तंगी किसी होनहार के सपनों के आड़े न आए।
इलाज, मातृत्व सुख और बुढ़ापे में पेंशन की सुविधा
सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर निगम ने सभी कर्मियों के लिए ईएसआई और ईपीएफ का लाभ अनिवार्य कर दिया है। ईएसआई के दायरे में आने से महिला कर्मचारियों को पूर्ण सवेतन मातृत्व अवकाश मिलेगा। बीमारी की स्थिति में अवकाश और इलाज की पूरी सुविधा दी जाएगी। कर्मचारी और उसके परिजनों को ईएसआई अस्पतालों और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में मुफ्त ओपीडी, जांच, दवाएं और गंभीर सर्जरी की सुविधा मिलेगी। ईपीएफ के जरिए साठ वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवाकाल के आधार पर साढ़े सात हजार रुपये तक की मासिक पेंशन सुनिश्चित की गई है। कर्मी की मृत्यु की दशा में आश्रित पत्नी को आजीवन पेंशन मिलेगी और अविवाहित कर्मी के माता-पिता को भी पेंशन की सुविधा दी जाएगी। बैंक सैलरी खाते से दुर्घटना बीमा के रूप में बिना कोई प्रीमियम दिए 40 लाख रुपये तक का सुरक्षा कवर भी जोड़ा गया है।
संवैधानिक आरक्षण और उच्च स्तरीय निगरानी की व्यवस्था
योगी सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल तैयार किया है। भविष्य में आउटसोर्सिंग के जरिए होने वाली सभी भर्तियों में एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन और महिलाओं को पूरा संवैधानिक आरक्षण दिया जाएगा। कर्मियों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए समय-समय पर विशेष कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। निगम के संचालन और पारदर्शिता की निगरानी के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बोर्ड बनाया गया है। इसमें वित्त, कार्मिक, न्याय और श्रम विभाग के प्रमुख अधिकारी शामिल हैं। हर जिले और मंडल में शिकायतों की जांच के लिए अलग समितियां होंगी। योगी सरकार के इस क्रांतिकारी कदम से अब शोषण का पुराना तंत्र खत्म हो गया है और लाखों आउटसोर्स कर्मियों को उनके श्रम का पूरा सम्मान और अधिकार मिलना तय हुआ है।




