Top
Action India

स्त्री किसी की बेटी, बहन, पत्नी हो सकती, फिर इंसान क्यों नहीं?

स्त्री किसी की बेटी, बहन, पत्नी हो सकती, फिर इंसान क्यों नहीं?
X

  • अब सवाल यह उठता है कि जिस देश में नारी को भगवान का दर्जा दिया गया हो वहां नारी इस तरह लापता क्यों और कैसे हो रहीं हैं?

  • न जाने कितनी मासूम ज़िन्दगी को जन्म तक नहीं लेने दिया जाता

  • जिस पत्नी के साथ अग्नि को साक्षी मान फेरे लेता है उसी पत्नी पर हाथ क्यों उठाता है पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सेदार पति?

  • सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण का ढिंढोरा पीट रही है, तो वही कोर्ट महिलाओं को चूड़ी सिंदूर से आगे देखना ही नही चाहता

नई दिल्ली । Action India News

कितनी अजीब बिडम्बना है जिस देश में नारी को नारायणी की तरह पूजा जाता है। उसी देश में नारी तिरस्कृत हो रही है। नारी को आज भी पुरुषों से कमतर आंका जा रहा है। समाज में नारियो को सिर्फ भोगविलास की वस्तु समझा जाता है। आज भी नारियां गुमनामी के अंधेरे में जीवन जीने को मजबूर है।

भले ही हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 से 18 समानता के अधिकार की बात करता हो। लेकिन वास्तविकता इसके उलट ही है। समाज में आज भी पितृसत्तात्मक सोच का वर्चस्व दिखाई देता है। जिस कारण से देश की महिलाएं समान हक के लिए अभी भी संघर्षरत है।

ऐसी तमाम रिपोटर्स समय समय पर प्रकाशित होती है जिसमें महिलाओं की दयनीय स्थिति का पता चलता है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा जारी "वैश्विक आबादी की स्थिति" 2020 रिपोर्ट जारी की गई।

जो यह साफ बताती है कि भारत में पिछले 50 वर्षों में लापता हुई महिलाओं की संख्या में दोगुनी बढोत्तरी हुई है। यह संख्या 1970 में 6 करोड़ 10 लाख थी। जो 2020 आते-आते 14 करोड़ 26 लाख पहुँच गयी है।

अब सवाल यह उठता है कि जिस देश में नारी को भगवान का दर्जा दिया गया हो वहां नारी इस तरह लापता क्यों और कैसे हो रहीं हैं? क्या महिलाओं की भारतीय समाज और लोकतंत्र में कोई अहमियत नहीं? इसके अलावा महिलाएं और बच्चियां ग़ायब हो रही, फ़िर लोकतंत्र के सिपहसलार मुँह पर टेप लगाएं क्यों बैठे रहते? महिला सुरक्षा की बातें तो सबसे ज़्यादा सियासी हुक्मरान ही करते, फ़िर भी महिलाओं के गायब होने का सिलसिला क्यों बद्दस्तूर जारी है? वैसे भी जिस देश की संस्कृति में नारी को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में पूजा जाता रहा हो, वहां आज पुरुषवादी सोच का हावी होना दुखदाई है।

तभी देश में 2013 से 2017 के बीच चार लाख 60 हजार बच्चियां जन्म के समय ही लापता हो जाती है। लैंगिक भेदभाव के चलते दुनिया भर में हर साल लापता 12 से 15 लाख बच्चियां में से 90 से 95 प्रतिशत चीन और भारत की होती है। इन लापता महिलाओं के साथ क्या होता है, वे किस स्थिति में रहने को मजबूर हो रही है। इसकी कोई जानकारी सामने नही आ सकी है।

समाज 21वीं सदी में विकास के नित्य नए आयाम गढ़ रहा हैं। किंतु आज भी वैश्विक पटल पर महिलाओं की स्थिति दयनीय ही है। क्यों आज इक्कीसवीं सदी में भी संविधान के मूल्यों समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बना पाए हम? क्यों अनेक नारीवादी आंदोलन के बावजूद स्त्री-पुरुष की समानता का तर्क यथार्थ का रूप नहीं ले सका? महिलाओं को लेकर हमारे देश मे बहस होती रहती है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट ही नजर आती है।

आधी आबादी को पूरा हक दिलाने की थोथी राजनीति देश की महिलाएं आजादी के वक़्त से देखती आ रही है। आजाद भारत में आज भी महिलाएं ग़ुलामी की जंजीरों में ही बंधी है। महिलाओं के साथ भेदभाव तो उनके जन्म के पूर्व ही शुरू हो जाता है।

न जाने कितनी मासूम ज़िन्दगी को जन्म तक नहीं लेने दिया जाता है। अगर जन्म ले भी लेती है तो बेटों के समान शिक्षा नहीं दी जाती है। उन्हें बचपन से ही समझाया जाता है कि वह पराया धन है। एक मासूम सी जान को न जाने कितनी मौत मारा जाता है। कभी संस्कारो के नाम पर तो कही रूढ़िवादी सोच के नाम पर।

आज भी समाज महिलाओं को पिता और पति की सम्पत्ति के रूप में ही देख रहा है। नारी आज भी किसी की बहन, बेटी या पत्नी तो हो सकती है... पर इंसान नहीं? आज भी समाज नारी को भोगविलास की वस्तु से आगे बढ़कर कुछ और देखना ही नहीं चाहता है। जब तक समाज इस ग्रसित सोच से आगे नही निकलेगा तब तक महिलाओं को उचित सम्मान नही मिल सकता।

असम में चंद दिनों पहले एक शादीशुदा महिला को सिर्फ इस आधार पर तलाक दे दिया जाता है कि वह महिला मांग में सिंदूर लगाने और हाथ में चूड़ी पहनने से इंकार कर देती है। जब हाईकोर्ट में इस तरह पुरुषवादी मर्दाना सोच पर तलाक दे दिया जाता है तो फिर समझ सकते है कि समाज मे पुरुषवादी मानसिकता किस हद तक हावी है।

महिला द्वारा सिंदूर न लगाना पत्नी का अविवाहित होना समझा जाएगा या फिर यह दर्शाया जाएगा कि वह पति के साथ इस शादी को स्वीकार नही करती। क्या महिला का सिंदूर लगाना ही अपने शादी होने का, पति से प्रेम का प्रतीक है? विवाह तो पति-पत्नी के बीच का पवित्र बंधन होता। फ़िर उसमें बंदिशों की बात कहां से आ गई? परम्परा का निर्वहन होना उचित बात है, लेकिन वह स्वैच्छिक होना चाहिए। इस समाज में महिलाओं पर तमाम नियमो ओर बंदिशें होना वही पुरुषों पर किसी प्रकार की बंदिशें, कोई नियम न होना कही न कही पुरुषवादी समाज का ही प्रतीक है।

आज भी हिन्दू समाज में अगर किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है तो उसे बिंदी, चूड़ी, रंगीन कपड़े पहनने की आजादी नही होती है। घर के उत्सवों में भी हिस्सा नही लेने दिया जाता है, लेकिन वही किसी शादीशुदा पुरूष की पत्नी की मृत्यु हो जाने पर समाज मे उस पर कोई बंदिश लागू नही होती है। सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण का ढिंढोरा पीट रही है, तो वही कोर्ट महिलाओं को चूड़ी सिंदूर से आगे देखना ही नही चाहता। हिन्दू धर्म में महिलाओं को चूड़ी, पायल, मंगल-सूत्र पहनना पत्नी धर्म माना गया है। तो वही पति द्वारा फेरे के समय ली गई कसमों को क्यों भूला दिया जाता है? क्यों पत्नी को दहेज के नाम पर जिंदा जला दिया जाता है।

जिस पत्नी के साथ अग्नि को साक्षी मान फेरे लेता है उसी पत्नी पर हाथ क्यों उठाता है पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सेदार पति? क्या किसी धर्म में यह लिखा है कि पत्नी पर हाथ उठाना, उसे मारना सही है। आज एक औरत अगर समाज में अपने हक के लिए आवाज उठाये तो उसे मॉर्डन, फेमिनिस्ट नाम दे दिया जाता है। समाज में इस तरह का दोगलापन आखिर कब तक? संवैधानिक देश में अपनी बात रखना ग़लत कबसे हो गया?

Next Story
Share it