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नहीं बनी बात, तो सियासी दांव आजमाएंगे आंदोलनकारी

नहीं बनी बात, तो सियासी दांव आजमाएंगे आंदोलनकारी
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  • राज्य आंदोलनकारियों में अलग सियासी दल के लिए विचार शुरू

  • यूकेडी की कमजोर स्थिति से खिन्न, भाजपा-कांग्रेस से असहमति

देहरादून । Action India News

उत्तराखंड के राज्य आंदोलनकारी सियासी दलों की मौजूदा स्थिति से खिन्न हैं। राज्य आंदोलनकारियों के सबसे करीब मानी जाने वाली पार्टी यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) दिनोंदिन रसातल पर जा रही है।

भाजपा-कांग्रेस की नीतियों को राज्य आंदोलनकारी अपने हित में नहीं मानते। इन स्थितियों के बीच, राज्य आंदोलनकारियों ने अपने सियासी दल के लिए गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया है। नजरें 2022 के विधानसभा चुनाव पर हैं। हालांकि भाजपा-कांग्रेस से इतर उत्तराखंड की सियासत में तीसरे फ्रंट की जो बेकद्री होती रही है, उसका भी आंदोलनकारियों को ध्यान है।

दरअसल, राज्य आंदोलनकारियों के तमाम मसले आज तक अनसुलझे हैं। राज्य आंदोलनकारियों का चिह्नीकरण नहीं हो पाया है। आंदोलनकारियों को दस फीसदी क्षैतिज आरक्षण का मसला कानूनी तकनीकी पेचीदेगियों में बुरी तरह उलझा हुआ है।

इसके अलावा, आंदोलनकारियों को तमाम तरह की अन्य सुविधाओं का मामला है, जिस पर सरकारों के स्तर से बहुत तेजी से काम नहीं हो पाया है। राज्य आंदोलनकारियों की यूकेडी के साथ बहुत ज्यादा नजदीकी रही है।

कह सकते हैं कि यूकेडी राज्य आंदोलनकारियों की ही पार्टी रही है, लेकिन धीरे-धीरे इस पार्टी के कमजोर पड़ने के बाद इससे जुडे़ आंदोलनकारियों ने इधर-उधर छिटकना शुरू कर दिया है। वह यूकेडी से लेकर भाजपा-कांग्रेस में और ज्यादा बंट गए हैं।

राज्य आंदोलनकारी नब्बे के दशक में राज्य आंदोलन के दौरान चुनाव बहिष्कार का बड़ा आंदोलन चला चुके हैं। उन्होंने राज्य नहीं, तो चुनाव नहीं का नारा दिया था। मगर यह कम दिलचस्प बात नहीं है कि अब बदली स्थिति में राज्य आंदोलनकारी सियासी दल बनाकर चुनाव में भागीदारी के बारे में सोचने लगे हैं।

हालांकि भाजपा-कांग्रेस से इतर तीसरी सियासी ताकत के सपने उत्तराखंड में कभी फले फूले नहीं है। इसके एक नहीं, कई प्रयास हुए हैं। राज्य आंदोलनकारी किसी भी निर्णय से पहले सारी स्थितियों को ठोक बजाकर देख लेना चाहते हैं।

इसलिए सियासी दल का उनका विचार गंभीर जरूर है, लेकिन बहुत प्राथमिक स्तर पर है। यह आगे कहां तक जाता है, यह जरूर देखने वाली बात होगी। प्रमुख राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुकरेती का कहना है कि सभी सियासी दलों ने आंदोलनकारियों के हितों की बात तो की है, लेकिन किया कुछ खास नहीं है। इसलिए उन्हें ऐसी ताकत तो बनना होगा, जो सियासत को प्रभावित करे। यह एक दल के रूप में भी हो सकता है।

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