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ओशो ने अपने शिष्यों को सिखाई जीवन जीने की कला

ओशो ने अपने शिष्यों को सिखाई जीवन जीने की कला
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  • ओशो के जन्म दिन 11 दिसम्बर पर विशेष

फर्रुखाबाद । एक्शन इंडिया न्यूज़

ओशो रजनीश की प्रतिभा और दर्शन किसी से छिपा नहीं है। 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के ग्राम कुचवाड़ा में पैदा होने वाले रजनीशचंद्र मोहन ने विश्व भर में अपने अनूठे दर्शन का परचम फहराया। उन्होंने अपने सन्यासियों को वीतराग में जीने की कला सिखाई। ओशो रजनीश के शिष्य विश्व भर में पाए जा रहे हैं।

इस संबंध में ओशो रजनीश के शिष्य स्वामी आनंद पुनीत बताते हैं कि एक साधारण परिवार में ओशो रजनीश ने जन्म लिया था। उनके पिता बाबूलाल जैन कपड़ा व्यवसाई थे। छोटी ही उम्र में उन्होंने अपने अनूठे दर्शन का संदेश दिया। जिससे विश्व भर में उनके अनुयाई बन गए। ओशो रजनीश ने पूना से लेकर अमेरिका के ओरेगॉन में रजनीश पुरम की स्थापना की।

स्वामी आनंद पुनीत का कहना है कि ओशो रजनीश का कहना था कि जीवन वीणा की तरह है। यदि वीणा के तारों को ढीला छोड़ दिया जाए तो उनमें संगीत नहीं पैदा होता। और यदि उन्हें ज्यादा कस दिया जाए तो वह टूट जाते हैं। जो बीच की स्थिति है उसमें तारों को लाने से संगीत पैदा होता है। इसी तरह से यदि साधक अपने जीवन में शरीर को यातनायंे देकर हठ योग करते हैं वह टूट जाते हैं। जीवन में संगीत पैदा करने के लिए बीच की स्थिति में आना होगा। इस बीच की स्थिति को राग विराग से हटकर वीतराग नाम दिया गया है।

ओशो का कहना था कि भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद भक्ति में आकर कांटों भरी राह पर नंगे पाव चलते थे। उनके इस हठ योग को देखकर भगवान बुद्ध ने आनंद को उपदेश दिया, और उन्हें वीणा के तारों की तरह बीच की स्थिति में लाकर उनमें संगीत पैदा करने की राह दिखाई। इसी तरह से ओशो रजनीश ने अपने शिष्यों को राग विराग से अलग हटकर वीतराग में जीने की कला सिखाई है।

ओशो का कहना था कि यदि रागी को इस बात का घमंड है कि उसके पास अकूत संपत्ति है तो विरागी को इस बात का अभिमान हो जाता है कि उसने राज पाठ और धन दौलत में ठोकर मारकर सन्यास ले लिया है। उसे भी अहंकार पैदा हो गया। रागी को अगर अपनी संपत्ति को लेकर अहंकार है तो बैरागी को उसे त्याग देने को लेकर अहंकार है। इस वजह से इन दोनों से हटकर एक स्थिति वीतराग की आती है।

जिसमें न खो देने का अभिमान है और ना ही पा लेने का अभिमान है। जो बीत राग में जीते हैं वे जीवन की कला जान जाते हैं। ओशो रजनीश ने अपने शिष्यों को वीतराग में जीने की कला सिखाई है। आज ओशो रजनीश के शिष्य हर देश में पाए जाते हैं। 600 से अधिक उनके प्रवचनों की पुस्तके बन गई है। जिनमें संभोग से समाधि की ओर और प्रेम है द्वार प्रभु का पुस्तकें सारे विश्व में कौतूहल मचाए हुए हैं। ओशो रजनीश के शिष्य 11 दिसंबर को हर साल अपने गुरु का जन्मदिन मनाते हैं। और इस जन्मोत्सव में मृत्यु को महोत्सव बनाने के लिए सुबह से ही ध्यान, कीर्तन और प्रार्थना करके अपने अध्यात्म सम्राट ओशो रजनीश को याद करते हैं। इस ओशो के प्रवचन की ऑडियो और वीडियो के माध्यम से अमृत बर्षा होती है।

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