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प्याज उत्पादक किसानों पर पड़ी दोहरी मार, व्यापारी के नहीं आने से सड़ रहे हैं प्याज

प्याज उत्पादक किसानों पर पड़ी दोहरी मार, व्यापारी के नहीं आने से सड़ रहे हैं प्याज
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बेगूसराय । एएनएन (Action News Network)

कोरोना से उत्पन्न स्थिति को लेकर हर कोई तबाह है। छात्र और मजदूर हैरान परेशान हैं तो वहीं देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। पहले तो लॉकडाउन के कारण गेहूं काटने के लिए मजदूर नहीं मिले और बारिश ने सैकड़ों एकड़ में लगी गेहूं को बर्बाद कर डाला। उसके बाद अब प्याज उत्पादकों पर लॉकडाउन और बारिश की दोहरी मार पड़ी है। लगातार रुक-रुक कर हुई बारिश के कारण लाखों रुपए का प्याज गल रहा है। जो प्याज तैयार कर पैकिंग हो भी गया तो ग्राहक नहीं आ रहे हैं। व्यापारी के नहीं आने से हजारों क्विंटल प्याज बेकार हो रहा है, तो प्याज उत्पादक किसानों में हड़कंप मच गया है। एक तो अंतिम समय में मजदूर के अभाव से मेहनत नहीं हो सका, जिससे उत्पादन कम हुआ। तैयार प्याज घर नहीं आ रहे हैं जो घर आ रहे हैं तो उसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं। बेगूसराय में सबसे अधिक प्याज का उत्पादन सदर प्रखंड के सांख गांव में होता है।

यहां चार सौ एकड़ से अधिक में प्याज प्रत्येक साल लगाया जाता है। जहां से बेगूसराय, खगड़िया, समस्तीपुर, सहरसा, कटिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक के व्यापारी आकर खरीदते थे। कम खाद के उपयोग से उत्पादित यह प्याज नासिक के प्याज से अधिक टिकाऊ होता था। जिसके कारण इसके खरीदार भी काफी होते थे। लेकिन इस बार व्यापारी नहीं आ रहे हैं, रेट कम हो जाने के बावजूद लोग खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं। एक तरफ लॉक डाउन के कारण वह प्याज मंडी में ले जाकर नहीं बेच पा रहे हैं। तो दूसरी तरफ बिन मौसम बरसात ने प्याज कुड़ाई के काम को बुरी तरीके से प्रभावित किया है। खेतों में रखे प्याज को बोरों में भरते किसानों के चेहरे पर मायूसी छाई हुई है।

सांख के प्याज उत्पादक किसान सुधीर कुमार साह, बेचू साह, धर्मेंद्र कुमार आदि बताते हैंं कि यहां के पतिलवा एवं मसुलिया बहियार में अन्य वर्षो की तरह सैकड़ों एकड़ में प्याज लगाया गया था। हम किसानों ने खून-पसीना एक कर फसल तैयार किया। पहले तो उत्पादन कम हुआ, ऊपर से बारिश के कारण खेत में ही प्याज सड़-गल रहा है। जो प्याज तैयार हो गया, बाहर के व्यापारी नहीं आने के कारण बेकार पड़ा है। हम लोग अब अगली फसल कैसे करेंगेे, कहां से पैसा आएगा, यह गंभीर सवाल बन गया है। कुल खर्च 35 से 40 हजार प्रति बीघा पड़ता है, अगर प्याज की कीमत 14 रुपए किलो के आसपास जाती है तब जाकर लागत आएगी। 14 से ऊपर प्याज का भाव होने पर कुछ फायदा मिल पाएगा।

लेकिन यहां तो 9-10 रुपए किलो भी लेने के लिए कोई नहीं आ रहा है। इसके लिए वे कुदरत को दोष देंं या कोरोना को, क्योंकि इन दोनों पर उनका कोई वश नहीं है। जिस पर वश है वो सुनने को तैयार नहीं। समस्या पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, तभी जाकर कोई रास्ता निकल सकता है। सरकार को निर्धारित मूल्य तय करना चाहिए, बाजार उपलब्ध करानी चाहिए। ताकि गेहूं, मक्का और धान की तरह प्याज उत्पादक किसानों को उनकी फसल का ए​क निश्चित आय प्राप्त हो सके। लेकिन सरकार के पास प्याज उत्पादक किसानों की समस्या को लेकर कोई योजना नहीं है। जिसके कारण बदहाल किसान खून के आंसू रोने को मजबूर हैं।

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