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गर्मी का आगाज शुरू पचनद की सहायक नदियां लगी सूखने

गर्मी का आगाज शुरू पचनद की सहायक नदियां लगी सूखने
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औरैया । एएनएन (Action News Network)

गर्मी ने अभी से अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया है। प्रखंड से होकर बहने वाली नदियों का जल सूखने लगे हैं। नदियों का पानी सूखने से स्थानीय लोगों को परेशानी हो सकती है। क्योंकि यहां आसपास के गांवों व बस्तियों के अधिकतर लोग पानी से जुड़ी अपनी दैनिक आवश्यकता के लिए इन नदियों पर ही निर्भर रहते हैं।

जल के सूखने के कारण आम लोगों के साथ साथ पशुपालकों को भी परेशानी का सामना कर पड़ सकता है। प्रखंड से होकर बहने वाली नदियां क्षेत्र के लोगों के लिए काफी उपयोगी होती है। गर्मी के दिनों में लोग इन नदियों के जल में ही कपड़ा साफ करने के अलावा स्नान करने का भी काम करते हैं। नदी के स्रोत के सूखने के कारण गर्मी के दिनों में नदियांं खत्म हो जाती है। पानी का प्रवाह कम हो जाने के कारण इसका जल ठहर जाता है। इससे पानी गंदा हो जाता है तथा यह किसी काम का नहीं रह जाता है। जानकारों का कहना है कि अगर इन नदियों के स्रोत को नहीं साफ किया जाता है, तो लोगों के साथ-साथ पशुओं को भी पेय जल की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।

पहले नहीं थी ऐसी स्थिति

लगभग 15 वर्ष पूर्व ऐसी स्थिति नहीं थी। पचनद के नजदीक इन छोटी नदियों का अस्तित्व समाप्त हो गया। यमुना, चम्बल, सिंध, क्वेरी, पहूंज ये पांचों नदियों में अवैध रूप से होने वाली बालू खनन से गहरा असर पढ़ रहा है। यहां नदियों से ओवर लोडिंग बालू माफिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों एवं एनजीटी नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं इसलिए कटाव के कारण नदियों का मार्ग संकरा होकर समाप्त हो गया।

इसके बाद मनरेगा में मिट्टी के कार्य होने के कारण ठेकेदारों द्वारा इन नदियों को जगह-जगह सिंचाई करने के नाम पर बांध दिया गया। इससे इसके प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ा तथा जल का प्रवाह बंद हो गया। इसके अलावा नदियों के किनारे चल रहे ईट-भट्टा के लिए पानी की जरूरत के लिए भी पानी के बहाव को रोक दिया जाता है। इस कारण नदी का जल उपलब्ध होने में परेशानी का कारण बना।

पर्यावरणविदों का कहना है कि नदी के जल के सुखने का कारण मनुष्य ही है। अगर लोग नदियों के रास्ते पर बाध या रिंग बाध अपने स्वार्थ के लिए नहीं बनाते तो ऐसा नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों के पारंपरिक जल प्रवाह को रोकने के कारण आज ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इससे बचने के लिए नरेगा जैसे कार्यों को हाइड्रोज्योलोजिकल क्षेत्र को छोड़कर काम करना चाहिए अन्यथा इसका खराब प्रभाव पड़ेगा।

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