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देश में अकेला है औरंगाबाद का पश्चिमाभिमुखी सूर्य मंदिर, यहांं छठ पूजा का अपना महत्व

देश में अकेला है औरंगाबाद का पश्चिमाभिमुखी सूर्य मंदिर, यहांं छठ पूजा का अपना महत्व
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पटना। एएनएन

देश के कई हिस्सों में भगवान सूर्य के प्रसिद्ध मंदिर हैंं और सभी का अपना विशिष्ट महत्व है। लेकिन बिहार के औरंगाबाद जिले के देव सूर्य मंदिर का अपना ही एक इतिहास है। वैसे तो सालोंभर यहां भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है, मगर छठ पर्व के दौरान इस मंदिर की खासियत और बढ़ जाती है। प्रति वर्ष यहां हर साल सूर्य अचला सप्तमी को महोत्सव का भी आयोजन होता है। यहां छठ पर सूर्यकुंड तालाब का भी विशेष महत्व है।

ऐतिहासिक पश्चिम मुखी सूर्यदेव

विद्वतजनों की मानें तो देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूप आदित्य भगवान हुए, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहा जाता है कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया। इस देव सूर्य मंदिर में छठ करने का अलग ही महत्व है। यहां भगवान सूर्य देव का पूरे देश में यही एकमात्र मंदिर है, जो पश्चिमाभिमुख है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में विराजमान हैं। छठ पर्व के दौरान यहां भव्य मेला लगता है। हर साल पूरे देश से लाखों श्रद्धालु यहां छठ करने आते हैं। मान्यता है कि जो भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं उनकी हर मनोकामना पूरी होती है। छठ के दौरान इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था और बढ़ जाती है।

किवदंती है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने सिर्फ एक रात में किया था। इस मंदिर के बाहर पाली लिपि में लिखित अभिलेख से पता चलता कि इस मंदिर का निर्माण आठवीं-नौवीं सदी के बीच हुआ था। इसकी शिल्प कला में नागर, द्रविड़ और बेसर तीनों शैलियों का मिश्रण दिखाई देता है। मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता है। यहां आने वाले दंपति डेहरी निवासी राहुल आनन्द और निधि सिन्हा की माने तो यहां आकर ही हमारी श्रद्धा पूरी हो जाती है। वैसे तो यहां आने के लिए सालभर इंतजार रहता है, मगर बीच में भी यहां अनुष्ठान करने से मन की मुराद पूरी होने की मान्यता है। वहीं 60 वर्षीय महेंद्र प्रसाद सिन्हा बताते हैं कि इस मंदिर में 30 साल पहले इतनी सुविधायेंं नहींं हुआ करती थींं। मगर समय के साथ अब सुविधाएं उपलब्ध हैं, फिर भी सरकार को इसे बेहतर पर्यटन के रूप में विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।

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