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पाट जात्रा पूजा विधान के साथ बस्तर दशहरा हुआ प्रारम्भ

पाट जात्रा पूजा विधान के साथ बस्तर दशहरा हुआ प्रारम्भ
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  • रथ निर्माण की पहली लकड़ी से बनेगा विशालकाय हथौड़ा टूरलु खोटाल

जगदलपुर । Action India News

रियासतकालीन ऐतिहासिक बस्तर दशहरा सोमवार को हरियाली आमावाश्या तिथि में परंपरानुसार पाटजात्रा पूजा विधान के साथ शुरू हो गया। पाटजात्रा पूजा विधान में बस्तर दशहरे के लिए तैयार किए जाने वाली दुमंजिला रथ निर्माण की पहली लकड़ी दंतेश्वरी मंदिर के सामने ग्राम बिलौरी से लाई गई ज‍िसका आज परंपरानुसार विधि-विधान के साथ रथ निर्माण करने वाले कारीगरों एवं ग्रामीणों के द्वारा माँझी, चालाकी मेम्बरीन, खाती पुजारी के साथ बस्तर सांसद दीपक बैज, कांग्रेस नेता राजीव नारंग सहित जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में पूजा विधान व बकरे की बलि के साथ संपन्न हुआ।

पाट जात्रा पूजा विधान में झार उमरगांवबेड़ा उमरगांव के कारीगर जिनके द्वारा रथ का निर्माण किया जाना है, वे अपने साथ रथ बनाने के औजार लेकर आते है तथा रथ बनाने की पहली लकड़ी के साथ औजारों की पूजा परंपरानुसार रथ निर्माण के कारीगरों एवं ग्रामीणों के द्वारा की जाती है। पाट जात्रा पूजा विधान में चावल, मोंगरी मछली, अंडा, लाई और महुआ की मदिरा का उपयोग किया गया। पूजा के पश्चात बकरे को अन्न खिलाने के बाद उसकी बलि दी गई।

रथ निर्माण के उपयोग हेतु हरियाली अमावस्या को लाई गई पहली लकड़ी जिसकी पाट जात्रा पूजा विधान में आज दन्तेश्वरी मंदिर के सिंह द्वार के सामने स्थपित कर माई दन्तेश्वरी को आह्वान कर पूजा विधान सम्पन्न की गई। उस पहली लकड़ी से रथ के पहिये बनाने के लिए औजार विशालकाय हथौड़े का निर्माण किया जाता है।

इस विशालकाय हथौड़े को स्थानीय बोली में टूरलू खोटला कहा जाता है। बस्तर दशहरा में संचालित होने वाले लकड़ी के दुमंजिला रथ के पहियों के निर्माण में विशालकाय हथौड़े-टूरलु खोटाल की भूमिका अहम होती है। जिसके बिना पहियों का निर्माण असंभव है।

उल्‍लेखनीय है क‍ि बस्तर दशहरा में 612 वर्षों के रियासत कालीन अपनी मान्यताओं परम्पराओं का निर्वहन बस्तर के ग्रामीणों के द्वारा आज भी निभाते चले आ रहे है। शताब्दियों पुरानी इसी विलक्षण मान्यताओं एवं परम्पराओं के कारण बस्तर दशहरा की ख्याति पूरे विश्व मे मान्यता प्राप्त है। बस्तर दशहरा परंपरागत दशहरे से भिन्न है।

यहां का दशहरा कुछ अलगही अंदाज से मनाया जाता है। इस दशहरे में आस्था और विश्वास की डोर थामे आदिम जनजातियां अपनी आराध्य देवी मॉ दंतेश्वरी के छत्र को दुमंजिला भवन की ऊँचाई का विशालकाय लकड़ी से निर्मित रथ में विराजमान कर, रथ परिक्रमा मार्ग से माँ दन्तेश्वरी मंदिर पहुंचती है।

बस्तर रियासत के राजपरिवार की ईष्ट देवी और बस्तर अंचल के समस्त लोक जीवन की अधिशष्ठात्री देवी मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा भक्ति की सामूहिक अभिव्यक्ति का पर्व बस्तर दशहरा आज पाट जात्रा पूजा विधान के साथ प्रारम्भ हो गया है।

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