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भीलवाड़ा में प्रवासी मजदूरों ने पलटी 66 मोक्षधाम की काया

भीलवाड़ा में प्रवासी मजदूरों ने पलटी 66 मोक्षधाम की काया
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भीलवाड़ा । एएनएन (Action News Network)

कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए भीलवाड़ा मॉडल ने जिस तरह से देश में अपना नाम चर्चित किया है। लॉकडाउन के इस दौरान जिले में ग्रामीण विकास योजना के तहत महात्मा गांधी नरेगा, गुरूगोलवकर व अन्य योजनाओं के जरिए गांव गांव में मोक्षधाम विकसित करने की योजना फलीभूत होती दिख रही है। गांवों के मोक्षधाम भी अब शहरों की तरह रमणीक स्थल के रूप में विकसित हो रहे हैं। प्रशासन ने प्रत्येक ब्लॉक में योजना बनाकर काम शुरू किया। पहले चरण 66 गांवों में मोक्षधाम तो बन चुके हैं और 344 कार्य स्वीकृत हो चुके हैं। लॉकडाउन के दौरान स्थानीय व प्रवासी श्रमिकों को नियोजित कर मोक्षधामों को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बने मोक्षधाम पर टीन शेड व छाया की व्यवस्था नहीं होने से बारीश व आंधी तूफान में अंतिम कर्म करना भी किसी जंग को जितने से कम नहीं था। पूरानी परम्पराओं के चलते कई वर्गों के श्मशान स्थल ऐसे स्थानों पर थे, जहां पहुंचने के लिए 1 से 2 फीट गहरे पानी व किचड़ को पार करना पड़ता था। कई बार बारीश के समय क्रियाकर्म के दौरान आये परिजनों का साथ लेकर पानी से बचाव के लिए तिरपाल की छाया करनी होती थी।

मुख्य कार्यकारी अधिकारी गोपालराम बिरड़ा ने बताया कि जिले में महात्मा गांधी नरेगा, गुरूगोलवकर और अन्य योजनाओं के जरिए ग्राम पंचायत में मोक्षधाम विकास कार्य करवाए जा रहे हैं। इनके अंतर्गत मोक्षधाम चारदीवारी निर्माण कार्य, टीन शेड निर्माण, लकडीघर, स्नानघर, श्मशान घाट तक पेवर ब्लॉक, वृक्षारोपण कार्य किए गए हैं। मनरेगा योजना के तहत जिले में पूर्व में स्वीकृत कार्यो में से 66 मोक्षधाम विकास कार्य पूर्ण किये जा चुके हैं तथा 344 कार्य अब तक और स्वीकृत किये गये हैं। कई मोक्षधामों पर अभ्रक की ईटों की भट्टी आदि भी बनवाई गई है।

मनरेगा योजना से पंचायत समिति आसीन्द के धोली मोतीपुर में श्मशान घाट निर्माण कार्य पर कार्य करने वाले श्रमिक बालुराम तेली ने बताया की जीवन में इस बात का संतोष रहेगा कि मैंने जिस स्थान पर मजदूरी करके मोक्षस्थल तैयार किया है। मेरे लिए इससे अधिक पूण्य कार्य कोई नहीं है।

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