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अवसाद और असुरक्षा का भाव बढ़ने पर हो जाए सतर्क

अवसाद और असुरक्षा का भाव बढ़ने पर हो जाए सतर्क
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  • मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया का है लक्षण, अवसाद और असुरक्षा का भाव बढ़ने से बढ़ रहा मनोरोग

वाराणसी । एक्शन इंडिया न्यूज़

तेलियाबाग निवासी एक व्यक्ति को हमेशा लगता था कि कुछ लोग खासकर पड़ोसी उसे मारने के चक्कर में है। उसने कई बार-बार अपने मिलने वालों से ये शिकायत की। परिचितों ने उसकी शिकायत की पड़ताल की तो ऐसा कुछ नहीं मिला। लेकिन, व्यक्ति की ये शिकायत बढ़ती गई। परिजन भी उसकी बातों को टालते रहे। यह देख वह व्यक्ति गुमसुम रहने लगा। हालत खराब होते देख परिजन उसे लेकर मनोचिकित्सक के पास गये तो जांच में पता चला कि वह व्यक्ति मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया का शिकार है।

शिवपुर बाइपास निवासी जाने-माने वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ.हेमंत सिंह ने गुरुवार को बताया कि लॉकडाउन में लम्बे समय से समाज से कटे और इसके बाद उपजे हालात आर्थिक स्थिति से लोगों में अवसाद और असुरक्षा का भाव बढ़ने से मनोरोग बढ़ा है। ऊपर वाले मामले में मरीज सच्चाई और समाज से अलग होकर अपनी ही कल्पना में सोचता रहता था। खुद उसे और परिजनों को रोग के बारे में कुछ नहीं पता चल पाया।

उन्होंने बताया कि सिजोफ्रेनिया के शिकार ज्यादातर और युवा बनते है। उन्होंने बताया कि इस रोग में रोगी व्यक्ति को हमेशा तरह-तरह की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। उसे हमेशा लगता है कि उसके आसपास के लोग उसके खिलाफ षड्यंत्र रच रहे है। या लोग उसका पीछा कर रहे है। कभी भी उस पर हमला कर सकते है।

डॉ.हेमंत सिंह ने बताया कि ऐसी स्थिति में मरीज की सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो जाती है और वह कोई निर्णय भी नहीं कर पाता है। ऐसी स्थिति ज्यादातार अकेले रहने पर उपजती है। उन्होंने बताया कि इस रोग के लक्षणों में समाज से अलग-थलग रहना, कपड़े ठीक से न पहनना, साफ-सफाई पर ध्यान नहीं देना, बहुत कम बोलना, अकेले में बड़बड़ाना, कभी अनायास हंसना और तेज-तेज रोना है।

उन्होंने बताया कि सिजोफ्रेनिया होने के कोई खास कारण नहीं है। आनुवंशिक, पारिवारिक तनाव या बचपन की कुछ अप्रिय घटनाएं, सामाजिक प्रभाव, डिप्रेशन, तनाव या फिर अपनी खुद की आदतें है। उन्होंने बताया कि दिमाग में बायोकेमिकल बदलाव, मस्तिष्क के चेतन तंतुओं के बीच के रासायनिक तत्वों में होने वाले परिवर्तन भी रोग का कारण बनता है।

उन्होंने बताया कि माता-पिता में से कोई एक सिजोफ्रेनिया का शिकार हो तो बच्चे में इस रोग के होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर दोनों पीड़ित हो, तो बच्चे को यह बीमारी होने की आशंका पचास फीसदी से अधिक बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि इस रोग का इलाज बेहतर व्यवहार और दवाओं से संभव है। डॉ. सिंह के अनुसार खास न्यू जनरेशन एंटी साइकेटिक दवाएं, आधुनिक ईसीटी और सही इलाज और देखभाल से मरीज सामान्य हो सकता है। लेकिन, दवाओं का जरूरत पड़ती रहेगी।

उन्होंने कहा कि ऐसे रोगियों को पारिवारिक सहयोग और स्नेह की जरूरत होती है। मरीज के परिवार को उसका साथ देना चाहिए। उसे समझें। मरीज को व्यस्त रखने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि सिजोफ्रेनिया को मानसिक बीमारियों में सबसे खतरनाक माना जाता है। सिजोफ्रेनिया का अगर सही इलाज न किया जाए तो करीब 25 फीसदी मरीजों के आत्महत्या करने का खतरा होता है। उन्होंने बताया कि लक्षण दिखते ही रोगी को चिकित्सकों को दिखाना चाहिए।

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