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दिसम्बर में क्यों नहीं याद आते हैं बिस्मिल

दिसम्बर में क्यों नहीं याद आते हैं बिस्मिल
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बेगूसराय, 04 दिसम्बर (हि.स.)। दिसम्बर आते ही लोग सब कुछ भूलकर नव वर्ष की पूर्व संध्या और प्रथम प्रभात के स्वागत में लग जाते हैं। इस भागदौड़ में किसी को भी याद नहीं है की दिसम्बर माह के महीने में उन्हें भी याद करना है, जिनके लिए मेले लगाने की बात देशभक्ति गानों में कही गई है। आज के कुछ देशवासी यह जानते भी नहीं है कि सच्चे हिंदुस्तानी वह थे जिन्होंने भारत मां को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। स्वतंत्र भारत की रक्षा के लिए कभी पाकिस्तान, कभी चीन और फिर पहाडों की बर्फीली चोटियों पर जान हथेली पर रख दुश्मन से लोहा लेते हुए विजय प्राप्त किया। उन्होंने अपनी जवानियां देश के लिए अर्पित कर दी।

क्या सभी देशवासी जानते हैं कि दिसम्बर में ही काकोरी कांड के शहीद अशफाक उल्ला ने फांसी का फंदा गले में डालने से पहले कहा था 'हिंदुस्तान की जमीन में पैदा हुआ हूं। हिंदुस्तानी मेरा घर, धर्म और ईमान है। हिंदुस्तान के लिए मर मिटूंगा और इसकी मिट्टी में मिलकर फख्र महसूस करूंगा।' शहीद मदनलाल ढींगरा ने लंदन के जेल में फांसी दिए जाने से पहले कहा था 'भारत मां की सेवा मेरे लिए श्री राम और कृष्ण की पूजा है।' आजादी के दीवानों के लिए भारत में थी और अब भी है। लेकिन स्वतंत्र भारत के कुछ तथाकथित उच्च शिक्षित एवं सत्ता वालों ने इसकी संस्कृति को विस्मृत कर दिया।

महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस के नेतृत्व में मां भारती के वीर पुत्रों ने अपने संकल्प बल से 23 दिसम्बर 1912 को दिनदहाड़े दिल्ली के दिल चांदनी चौक पर एक धमाका कर अंग्रेजी शासकों का स्वागत किया था। कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाकर अंग्रेजी शासक अपनी सत्ता का सिक्का जमाना चाहते थे तो इस धमाके से हड़कंप मच गया और सत्ता के मद में चूर लॉर्ड हार्डिंग घायल हो गया। जिसमें बाल मुकुंद, अवध बिहारी, अमीरचंद और बसंत कुमार आदि पकड़े गए। अदालतों में न्याय का नाटक हुआ और सभी क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर लटका दिए गए।

वह शहीद हो गए, किंतु शहीदों की चिताओं पर मेले लगाने का संकल्प करने वाले शहीदों को भी भूल गए। मेला लगना तो दूर लोग भूल चुके हैं कि चांदनी चौक पर इसी दिसम्बर के महीने में किसी ने जीवन देकर अंग्रेजों का दिल दहला लाया था। काकोरी कांड को लेकर इसी दिसम्बर के महीने में राम प्रसाद बिस्मिल के साथ राजेंद्र नाथ लाहिरी, अशफाक और रोशन आदि क्रांतिकारी युवा पकड़े गए थे। वचन के धनी राम प्रसाद बिस्मिल ने जो कहा वह कर दिखाया और 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर जेल में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया। काकोरी कांड के दूसरे क्रांतिकारी वीर अशफाक उल्ला को भी जीवन के 27 वें वर्ष में 19 दिसम्बर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

फांसी पर लटकाए जाने से पहले अशफाक ने कहा था 'यह तो मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे वतन का आलातरीन इनाम मिला है, मुझे फख्र है, पहला मुसलमान होऊंगा जो भारत की आजादी के लिए फांसी पा रहा हूं। बंगाल के राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को भी काकोरी में रामप्रसाद बिस्मिल के साथ रहने के कारण 17 दिसम्बर 1927 को भी फांसी के फंदे पर झूलना पड़ा था। भारत के बेटे फांसी के फंदे पर झूल कर अमर हो गए। तीन दिन में मां भारती के तीन बेटे फांसी पर लटका दिए गए।

दिसम्बर के शहीदों की कड़ी में स्वामी श्रद्धानंद का नाम भी अविस्मरणीय है। मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानंद बने इस महापुरुष ने अंग्रेजी साम्राज्य और अंग्रेजी व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन चलाया। गुरुकुल शिक्षा पद्धति इन्हीं की देन है और कई सामाजिक धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध भी इन्होंने सफल आंदोलन चलाया। इसी कारण कुछ कट्टरवादी विचारधारा वाले लोगों ने 23 दिसम्बर 1926 को गोलियों से भून डाला। ऐसे अनेक महापुरुष है जो राष्ट्र और समाज हित के लिए जीवन अर्पण कर गए।

फिर भी करोड़ों देशवासी और नेता दिसम्बर में शहीदों को भूल गए। केवल नया बरसे उन्हें याद है मौज मस्ती करने के लिए। कटु सत्य तो यह कि नई पीढ़ी इन बलिदानों से परिचित ही नहीं हो सकी और इसके लिए दोषी हैं हमारे देश के नेता, तथाकथित कर्णधार, धर्मगुरु, शिक्षा व्यवस्था और टीवी चैनलों के नीति निर्धारक। जो कि नववर्ष के स्वागत के कार्यक्रमों का आनंद की चिंतापूर्ण तैयारी में बेचैन और परेशान हैं। इसलिए दिसम्बर में याद करें उन शहीदों की शहादत को, हमारा कुछ कर्तव्य है राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए बलिदान होने वाले दीवानों और परिंदों के लिए।

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