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लॉकडाउन ने कबाड़ वालों की जिंदगी को भी बना दिया ‘कबाड़’, खाने को भी तरस रहे नौनिहाल

लॉकडाउन ने कबाड़ वालों की जिंदगी को भी बना दिया ‘कबाड़’, खाने को भी तरस रहे नौनिहाल
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सुल्तानपुर । एएनएन (Action News Network)

लॉकडाउन ने कबाड़ बीनने वाले परिवारों की भी जिंदगी कबाड़ कर दी है। इसका कारण है दुकानों व रोड चलते लोगों द्वारा फेंके गये कबाड़ का अब न मिलना। इससे सर्वाधिक परेशानी तो कबाड़ बीनने वाले नौनिहालों की है, जिन्होंन कापी-किताब उठाने की उम्र में पेट की मजबूरी के कारण कबाड़ उठाना शुरू कर दिया लेकिन आज वह भी धोखा दे गया। अब सवाल है जिन्दगी की डोर कैसे चलेगी। ये नौनिहाल पहले सुबह निकल पड़ते थे एक बोरा लेकर और शाम तक पूरा परिवार मिलकर चार से पांच सौ तक तो कबाड़ बिन ही लेता था लेकिन अब बमुश्किल सौ से दो सौ रुपये ही हो पाते हैं।

ऐसे ही कबाड़ बीनने वाले कल्लू ने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि कबाड़ बीनने निकले है। साहब पहले तो खाने भर का सब लोग मिलकर कमा भी लेते थे लेकिन ये पता नहीं कौन सा रोग आया, जो हमारे धंधे को ही चौपट कर दिया। अब तो दो जून का खाने भर भी नसीब नहीं होता। बमुश्किल सब लोग मिलकर सौ से दो सौ रुपये ही कमा पाते हैं। इससे पूरे कुनबे का खर्च नहीं चल पाता। बंदी के पहले चार सौ से पांच सौ रुपए का कबाड़ मिल जाता था। कल्लू के साथ रेहान भी रिक्शा लिए था। उसके रिक्शे पर उसका छोटा भाई भी था। इनको नहीं पता स्कूल की पढ़ाई कैसे होती है। पता है तो सिर्फ इतना कि कबाड़ कहा मिलेगा। किस कबाड़ की कीमत क्या होगी।

इसी तरह एक महिला अपने तीन बच्चों के साथ सुबह कबाड़ बिनने निकली हुसनी ने कि खाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा न, छोटे-छोटे बच्चे हैं, इनका भी पेट पालना है। इसलिए कबाड़ बीन कर गुजारा करते हैं। बन्दी में सौ दो सौ का ही कबाड़ मिल पाता है। उसने बताया कि हम बंगाल से आए हैं। एक साल पहले आये थे। हमारे साथ और लोग भी हैं। झोपड़ी बनाकर नगर के पास यही रहते है। हमें कोई सहायता नहीं मिली है।

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