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बिखरी बस्तियों के चलते बांसवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं पहुंच सका कोरोना

बिखरी बस्तियों के चलते बांसवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं पहुंच सका कोरोना
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बांसवाड़ा । एएनएन (Action News Network)

कोरोना जैसी भयंकर महामारी में सोशल डिस्टेंसिंग ही रामबाण इलाज बताया जा रहा है। यही वजह है कि देश और दुनिया में लॉकडाउन लगा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हो या अन्य मंत्री और डॉक्टर हर कोई सोशल डिस्टेंसिंग की अपील कर रहा हैं।
लोग भी अब सोशल डिस्टेंसिंग का महत्व समझने लगे हैं, लेकिन आदिवासी बहुल बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले में मानों लोग सालों पहले से ही सोशल डिस्टेंसिंग की खासियत समझ चुके थे। आदिवासी बाहुल्य बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिला सीमावर्ती गुजरात राज्य से सटा है।

अरावली पर्वत श्रृंखला से घिरे इन जिलों में कई छोटी-बड़ी पहाड़ियां हैं. जिनमें कहीं वन क्षेत्र तो कहीं आबादी है। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ के अलावा उदयपुर और सिरोही का कुछ हिस्सा भी आता है। यहां के आदिवासी परिवारों की संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज और रहन-सहन अतिप्राचीन हैं। यहीं कारण है की यहां के लोग कभी भी एक जगह पर समुदाय में नहीं रहते बल्कि एक भाई इस पहाड़ी पर तो दूसरा भाई का घर दूसरी पहाड़ी पर ही दिखाई देगा।

बांसवाड़ा जिले में सैकड़ों बिखरी बस्तियां जिसके चलते वह आज तक राजस्व गांव नहीं बन पाए। घरों के बीच दूरी 200 से 300 फीट या इससे भी ज्यादा होती है। इसके अलावा घरों की सुरक्षा की लिए यहां पत्थर या ईंटों का परकोटा नहीं होता बल्कि कांटेदार बाड़ होती हैं. विशेष तरह के कांटे (स्थानीय भाषा मे थूअर) की बाड़ कही जाती है, ताकि उनके घर सुरक्षित रहे। बांसवाड़ा जिले में अभी तक 61 लोग कोरोना से संक्रमित हुए है,लेकिन इसमें से एक भी ग्रामीण क्षेत्र के जनजाति वर्ग का व्यक्ति नहीं है।

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