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कन्नौज : कोरोना से गायब हुई फूलों की महक व इत्र नगरी की विदेशों में धमक

कन्नौज : कोरोना से गायब हुई फूलों की महक व इत्र नगरी की विदेशों में धमक
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कन्नौज । एएनएन (Action News Network)

इत्र और इतिहास के लिए प्रसिद्ध उत्तर प्रदेश का कन्नौज जनपद, अपने इस उद्योग के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां बनने वाला इत्र विदेशों में निर्यात होता है। लेकिन महामारी घोषित हो चुके कोविड—19 के खौफ ने इत्र नगरी कन्नौज के पारंपरिक इत्र उद्योग पूरी तरह चौपट कर दिया है। मौजूदा हाल यह है कि कन्नौज में इत्र की दुकानों पर खरीदार गायब हैं। इत्र का एक्सपोर्ट भी पूरी तरह से बन्द होने के कारण कई कारखानों में ताले लटक रहे हैं।

चाइना से फैले कोरोना वायरस ने पहले ही इत्र नगरी कन्नौज के पारंपरिक इत्र उद्योग को चौपट कर रखा है। अब देश में इसके महामारी घोषित होने के बाद इत्र उद्योग की रही सही कमर भी टूटने लगी है। इत्र नगरी में करीब ढाई हजार छोटी—बड़ी इत्र निर्माण इकाइयां हैं। जहां से हर माह विदेशों में डेढ़ से दो सौ टन विभिन्न प्रकार का नेचुरल इत्र एक्सपोर्ट होता है, लेकिन हवाई सफर बन्द होने के बाद एक्सपोर्ट पूरी तरह बन्द है। इसका असर यहां की इत्र निर्माण कम्पनियों के साथ ही अब यहां के फूल उत्पादन पर भी दिखाई दे रहा है। जो किसान इन उद्योगों के लिए फूलों की खेती करते हैं वह अपने फूलों को नष्ट करने पर मजबूर है।

जनपद में करीब 670 हेक्टेयर में फूलों की खेती होती है। गुलाब के साथ—साथ बेला, चमेली, मेहंदी, गेंदा के फूलों की पैदावार कन्नौज में ही होता है। इसके अलावा जिले के कई इलाकों में ग्लोडियोलस, कच्चा बेला, रातरानी, चमेली, लेमन ग्रास आदि होती है। किसानों के खेत में इन दिनों फूलों की फसल तैयार है। लेकिन इत्र कारखाना बन्द होने के कारण सैंकड़ों किसानों की मेहनत इस बार खेत में ही दम तोड़ रही है। खेतों में खड़े फूल खरीदार न मिलने से खुशबू खोने लगे हैं। किसान जार-बेजार स्थिति में हैं।

50 हजार किसानों के चेहरे मुरझाएं

इत्र निर्यात जनपद होने के चलते यहां पर फूलों की खेती से जुड़े 50 हजार किसानों के चेहरे का रंग उड़ गया है। तीन साल में 70-80 हजार रुपये की लागत में तैयार होने वाली गुलाब की फसल खराब होने की कगार पर है।

गांव के सालाना टर्नओवर में आई कमी

यहां पर पैंदाबाद निवासी खुशीराम, रामप्रसाद, रामजीत, रामपाल बताते हैं कि अकेले उनके गांव में 200 बीघा फूलों की खेती होती है। इस गांव का करीब सलाना टर्नओवर 4-5 करोड़ रुपये है। इस साल लॉक डाउनके कारण उन्हें भारी नुकसान हो रहा है। बताया कि गुलाब के एक बीघा खेत में प्रतिदिन 100 किलो गुलाब निकलता है। ये फसल चार से आठ माह तक होती है। 10-20 हजार रुपये प्रति बीघा तक गुलाब, गेंदा की खेती में लगात आती है। बता दें कि 80 फीसद माल की बिक्री स्थानीय है। जबकि 20 फीसद बाहर से आता है।

यहां महकते हैं फूलों से खेत

छिबरामऊ के प्रेमपुर, सरायगोपाल, छिपारी, माधौनगर, टडहा, मनिकापुर, श्यमपुर, मिघौला, मिघौली, नगला दुर्गा, मटेहना, सबलपुर, नगला, भजा, कन्नौज सदर के जलालपुर पनवारा, सारोतोप, महमूदपुर, बाबा हाजी, भाऊ खुर्द, महाबलीपुर्वा, रंगियनपुर्वा, बरौली, तहसीपुर, पैंदाबाद, रत्नापुर, वसीरापुर। गंगा कटरी व काली नदी के किनारे वाले करीब डेढ़ सौ गांवों में फूलों की खेती होती है। कन्नौज सदर में करीब 423 हेक्टेयर और छिबरामऊ में 250 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फूलों की खेती होती है। लेकिन इस महामारी के कारण ये खेत में बर्बाद हो रहे हैं।

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