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आत्मनिर्भर मूक-बधिर बेरोजगार, युवाओं के लिए बन सकता है प्रेरणास्त्रोत

आत्मनिर्भर मूक-बधिर बेरोजगार, युवाओं के लिए बन सकता है प्रेरणास्त्रोत
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बीजापुर । एएनएन (Action News Network)

जिले के नक्सल प्रभावित ग्राम धरमापुर के निवासी देवेन्द्र दुर्गम नाई का काम करते हैं, लेकिन बोलने और सुनने की क्षमता नहीं होने के बावजूद अपनी काबिलियत से स्वरोजगार हैं। शिक्षित, संपन्न और संसाधनों के बावजूद लाखों बेरोजगार युवाओं के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए यह दिव्यांग मूक-बधिर प्रेरणास्त्रोत बन सकता है।

लॉकडॉउन के दौरान जब हर वर्ग आर्थिक तंगी से गुजर रहा था, तब इसकी आय दुगुनी हो गई थी।दिव्यांग मूक-बधिर देवेन्द्र दुर्गम 2 वर्ष की उम्र में चिकनपॉक्स का शिकार हो गया जिसके बाद देवेन्द्र की सुनने और बोलने क्षमता बचपन में ही खत्म हो गई। 06 वर्ष की उम्र में उसके मां और भाई ने उसे अकेले ही छोड़ दिया।

बोलने और सुनने की क्षमता का नहीं होना और परिवार के द्वारा उसे अकेले छोड़ देना दुगनी आफत के बावजूद देवेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी। जैसे-तैसे कक्षा नवमी तक की शिक्षा अपने मामा के घर पर रह कर पूरी करने के बाद देवेन्द्र नाई का काम सीखते हुए अकेले ही किराये के कमरे में रहकर पढ़ाई जारी रखते हुए धुर नक्सल प्रभावित ग्राम बासागुडा के शासकीय स्कूल से ही 12वीं तक की शिक्षा ग्रहण करने में कामयाब हुआ।

इसके बाद देवेन्द्र बासागुड़ा से बीजापुर आकर यहां अलग-अलग सैलून के दुकान पर नौकरी करने लगा। मूक-बधिर होने के बावजूद दिव्यांग देवेन्द्र की हुनर और उसकी सेवा से उसके ग्राहक काफी खुश रहते हैं।देवेंद्र ने अपनी किस्मत को कोसे बिना हौसले के साथ आगे बढ़ाते हुए अपना काम पूरी लगन के साथ कर रहे हैं।

देवेन्द्र जिस सैलून में काम करते हैं, उसके संचालक हरिश बताते हैं कि देवेन्द की आय महीने में 20 से 25 रूपये है। जब लॉकडाउन में सभी सैलून बंद हो गये थे, तब लोग बाल कटवाने के लिए देवेन्द्र को अपने घर बुलाने लग गये थे।

जिससे देवेन्द्र की आय भी दुगुनी हो गई थी। जिन्दगी के तमाम उतार चढ़ाव के बावजूद देवेन्द्र ने बीजापुर के शांतिनगर में स्वयं का दो कमरे का एक छोटा सा मकान भी बनाकर अपना जीवन निर्वाह अच्छे से कर रहा है, ऐसे कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ते रहना मानव जीवन को सार्थक बनाता है।

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