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पर्यावरण के रक्षक गांव-गांव जाकर तैयार कर रहे 'पंचवटी'

पर्यावरण के रक्षक गांव-गांव जाकर तैयार कर रहे पंचवटी
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रायबरेली । एएनएन (Action News Network)

जब वर्षों की सरकारी सेवा और जिम्मेदारियों से फुर्सत मिली तो एक अन्य चिंता सताने लगी, वह है लगातार दूषित होता पर्यावरण। अब इनके संरक्षण के उपाय में जुटे हैं ऐसे लोग जो विभिन्न सेवाओं से सेवानिवृत्त होकर पारिवारिक जीवन जी रहे हैं। ऐसे ही बुजुर्ग पर्यावरण प्रेमियों की टीम गांव-गांव जाकर 'पंचवटी' तैयार कर रही है।

इस टीम की ओर से नीम, पीपल, पाकड़, बरगद, जामुन, पारिजात, आवंला जैसे पंचवटी परिवार के हजारों पेड़ गांव-गांव में इनके द्वारा लगाये जा चुके हैं। 2015 में स्थापित 'पंचवटी विकास समिति' जिले के लालगंज को मुख्यालय बनाकर काम कर रही है और किसी से बिना कोई सहायता लिए निःशुल्क गांवों में पंचवटी तैयार कर रहे हैं। इनका लक्ष्य है गावों में अब तक लुप्त हो चुके ऐसे पेड़ों को लगाना जिससे पर्यावरण के संरक्षण में अहम भूमिका रही है। अब तक समिति द्वारा सैकड़ों पंचवटी तैयार की जा चुकी है।

समिति पर्यवारण संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाती है। समिति के सदस्य घर-घर जाकर लोगों को पेड़ लगाने व जल संचयन के लिए प्रेरित करते हुए जागरूकता अभियान भी चलाती है। इसके साथ ही पंचवटी विकास समिति द्वारा क़रीब 26 बीघे में एक आम की बाग भी तैयार की जा चुकी है। गोपालन और जलप्रबंधन पर भी समिति के ये बुजुर्ग सदस्य कार्यक्रम कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन सब काम के लिए पूरा ख़र्च समिति के ही सदस्य अपनी जेब से करते हैं। इस कार्य के लिए ये किसी से कोई मदद नहीं लेते हैं।

पंचवटी विकास समिति के अध्ययन प्रेम नारायण तिवारी का कहना है कि पर्यवारण को संरक्षित और जीवन के लिए बेहद उपयोगी पेड़ अब लुप्त हो रहे हैं,एक तो ये लगाये नहीं जा रहे। दूसरी ओर इन्हें तेजी से काटा जा रहा है, ऐसे में इन्हें फिर से तैयार करना सभी की प्राथमिकता है। समिति के संस्थापक सचिव डॉ महादेव सिंह के अनुसार गावों में पंचवटी तैयार करने के साथ ही जलप्रबंधन और गो सेवा पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उनके अनुसार यह सभी काम पूरी तरह से हम सभी के सहयोग से मुफ़्त किया जा रहा है। समिति के कोषाध्यक्ष रामगुलाम सविता व अन्य सदस्य इस काम में पूरी तरह से जुटे हैं। ऐसे में जब इस उम्र के लोग घरों में रहकर पूजन अर्चन में व्यस्त रहते हैं,पंचवटी परिवार के लोग गांव-गांव जाकर पर्यवारण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी में व्यस्त हैं।

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