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सुल्तानपुर : इंदौर से लौटे प्रवासी की व्यथा, 'अपनों ने ही छोड़ दिया साथ'

सुल्तानपुर : इंदौर से लौटे प्रवासी की व्यथा, अपनों ने ही छोड़ दिया साथ
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  • 'मनरेगा' की तरह 'टेक्निकल श्रमिकों' को काम मिले तो जाना नहीं पड़ेगा

  • अपनी जन्म भूमि पर मिला बड़ा शकुन, खेत में काम करके ही पेट भर लेंगे

सुल्तानपुर । एएनएन (Action News Network)

कोरोना की पूर्ण बंदी के कारण फैक्ट्री भी बंद हो गयी, आगे भी खुलने की सम्भवना नहीं रही, खाने पीने की समस्या होने लगी, इसीलिए साथी के साथ इंदौर से मोटर साइकिल लेकर निकल लिए और पहुंच गए अपनी जन्मभूमि पर। जहां पर माँ की ममता है, पिता की साया है। यहां पूरा भरोसा है कि खेत में काम करेंगे तो खाने को जरूर मिलेगा।

ये बातें जिले के अहिमाने के बहरौली गांव निवासी अनिल मौर्य ने कही। अनिल मौर्य फिटर से आईटीआई है। सात साल पहले अपने सपने को संजोए हुए इंदौर शहर आईटीआई पढ़ाई पूरी करने के बाद निकल गए थे। वहां एक कंपनी में अप्रेंटिस की। उसके बाद 12 हजार के वेतन पर नौकरी कर रहे थे। कोरोना की महामारी ने देश को झकझोर दिया। इसी बीच कंपनी बंद हो गई। आगे भी चलने की संभावना नहीं थी, इसलिए वे गांव की ओर चले पड़े।

'मनरेगा' की तरह 'टेक्निकल श्रमिकों' को काम मिले तो जाना नहीं पड़ेगा

हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में श्री मौर्य ने कहा कि सरकार मजदूरों को मनरेगा में काम देती है। अच्छा खासा बजट खर्च करती है, परंतु टेक्निकल लोगों के लिए कुछ नहीं करती। जो मनरेगा में मजदूरी नहीं कर सकते हैं, कुछ पढ़े लिखे हैं। आईटीआई, डिप्लोमा किए हैं, उसके हिसाब से सरकार को काम देना चाहिए। सरकार यदि काम देती है, तो जरूर करेंगे। वहां जाने से कोई फायदा नहीं है। परिवार से इतनी दूर रहकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाते हैं, परंतु खाने के लिए परिवार चलाना है तो बाहर काम करने के लिए आखिर जाना तो पड़ता ही है।

कमरे का किराया, खाने पीने की थी समस्या

बताया कि लॉकडाउन में कमरे का किराया भरने की भी समस्या हो गई थी। खाने पीने की समस्या होने लगी। मुसीबत में अपना परिवार व जन्मभूमि की याद सताने लगी। वहां पर अपने भी पराए होने लगे। लोग एक दूसरे से दूरियां बनाने लगे। कोई साथ देने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। इसीलिए अपनी जन्मभूमि याद आई। बताया कि पड़ोसी जिले जौनपुर के एक साथी के साथ मोटरसाइकिल से जन्मभूमि की ओर निकल पड़े। इंदौर शहर से 24 घंटे की यात्रा पूरी करने के बाद सुल्तानपुर पहुंच गए। राहत की सांस ली,सुकून मिला,भरोसा मिला, मां की छांव,पिता का साया मिला। बड़ा शकुन मिला ऐसा महसूस हुआ जैसे सारी खुशियाँ मिल गयी हों। अगले दिन से खेत में काम करने के लिए निकल पड़े। ताकि घर परिवार कोई भी भूखा न रह सके।

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