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गरीबों पर कहर बन कर बरपा कोरोना, जनजीवन पटरी पर लौटना बनी चुनौती

  • शिक्षा, चिकित्सा, यातायात व्यवस्था ठप होने से बड़ी परेशानी

फर्रुखाबाद । एएनएन (Action News Network)

जानलेवा कोरोना वायरस ने गरीबों की रक्त रहित हत्या कर दी है। शिक्षा, चिकित्सा, यातायात, परिवहन विभाग के बंद रहने से गरीबों तथा उनके बच्चों पर बुरा असर पड़ा है। देखा जाए तो कोरोना वायरस का कहर सबसे ज्यादा गरीबों पर बरपा है। इस वायरस की मार से गरीब पूरी तरह से बेजार है। गरीबों का कहना है कि ना उन्हें रोजगार मिल रहा है और और न ही उन्हें पैसा मिल रहा है।

केंद्र व प्रदेश सरकार की ओर से गरीबों को नि:शुल्क खाद्यान्न उत्पन्न उपलब्ध कराया जा रहा है और जिस मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। पेट भरने के अलावा गरीबों के और खर्चे हैं। जो सभी रुक गए हैं। कोरोना की मार से आहत गरीब खून के आंसू रो रहा है। पूर्ण बंदी के चलते उनके बच्चों की शिक्षा, दीक्षा पूरी तरह से प्रभावित हो रही है।

इस संबंध में रोज मेहनत करके खाने कमाने वाले सर्वेश का कहना है कि गरीबों के लिए खोले गए सरकारी अस्पताल इस समय कोरोना वायरस की वजह से सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। अधिकांश गरीब सरकारी अस्पतालों से सस्ता इलाज करा कर लाभ उठाते थे। लेकिन कोरोना के बाद हुई संपूर्ण बंदी में सभी सरकारी अस्पतालों की ओपीडी बंद कर दी गई। नतीजतन असहाय गरीबों को दवा नहीं मिल सकी। हालांकि ओपीडी की शुरुआत धीरे—धीरे हो रही है, लेकिन इसका लाभ गरीब तबके के लोगों को नहीं मिल पा रहा है। सर्वेश का कहना है कि संपूर्ण बंदी के दौरान शासन ने निजी चिकित्सकों से फोन पर परामर्श लेने का आदेश किया था, लेकिन यह आदेश गरीबों के लिए ढाक के तीन पात साबित हुआ।

निजी चिकित्सक गरीबों के फोन ही नहीं उठाते। वह जान पहचान के लोगों का ही फोन उठाकर उनसे बातचीत करते हैं। बताया कि उसका बेटा बीमार हुआ और उसने एक निजी चिकित्सक को फोन लगाया तो चिकित्सक ने जब उसका नाम पूछकर फोन काट दिया। उसने दोबारा लगाया तो फोन ही नहीं उठाया गया। उसका कहना है कि यह आदेश बड़े आदमियों के लिए वरदान बना और गरीबों के लिए इस आदेश से कोई फायदा नहीं हुआ। नतीजतन गरीब चिकित्सीय सेवाओं से पूरी तरह वंचित रहे।

बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे सुरेश चंद का कहना है कि वह रोज मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार की बसर करता है। उसके बच्चे परिषदीय स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। गांव के प्राथमिक विद्यालय में उसके बच्चे नि:शुल्क शिक्षा पा रहे हैं। लेकिन कोरोना की वजह से स्कूल बंद कर दिया गया। उसके बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से बंद हो गई। उसका कहना है कि उसकी तरह से कई मजदूरों और गरीबों के बच्चों का शिक्षा का सहारा केवल परिषदीय स्कूल हैं। जिनके बंद हो जाने से इन गरीबों की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो रही है। बच्चे घरों में बैठकर अपना पिछला पाठ्यक्रम तक भूल गए हैं।

हालात यह है कि गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों के बच्चे कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं। जहां से उन्हें ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है। लेकिन गरीबों के बच्चों की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। जिससे गरीबों के बच्चों की शिक्षा दीक्षा पूरी तरह से चौपट हो गई है। उसका कहना है कि बच्चों की शिक्षा दीक्षा रुक जाने से उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है।

कोरोना वायरस ने गरीबों पर सबसे ज्यादा चोट की है। जिसकी मार से दुनिया भर का गरीब बेजार है। बेहद गरीबी में जी रहे दुर्विजय का कहना है कि यातायात व्यवस्था का गरीबों पर ही गहरा असर पड़ा है। गरीबों और मजदूरों के आने-जाने का सहारा केवल परिवहन निगम की बसें और रेल थी, जिन्हें बंद कर दिया गया। नतीजतन जो गरीब जहां था वहीं रुक गया। हालांकि केंद्र व प्रदेश सरकार ने गरीबों को उनके घर तक पहुंचाने का प्रयास किया।

लेकिन ना जाने कितने गरीब अपने घर लौटे या फिर वापस नहीं आ सके। जिसका सभी गरीबों को बहुत मलाल है। उनका कहना है कि कोरोना वायरस ने गरीबों पर जितना कहर बरपाया है। उतना उच्च वर्ग के ऊपर ऊपर नहीं बरपा सका। आज गरीब दाने-दाने को मोहताज है। उसे न काम मिल रहा है। न दाम मिल रहा है। गरीब और मजदूर प्रशासन के हाथों की तरफ देख रहे हैं कि उन्हें कब खाद्यान्न मिले। जिससे उनके बच्चों का उदर पोषण हो सके। कोरोना वायरस ने गरीबों को झकझोर कर फेंक दिया है। उसका कहना है कि सरकार ने गरीबी मिटाने का वादा किया था। लेकिन गरीबी तो नहीं मिटी कोरोना वायरस ने गरीबों को ही मिटा दिया है। इस वायरस की मार से सबसे ज्यादा गरीब बेजार है। उसका कहना है कि आखिर गरीबों को कब तक सरकार इस तरह खाना खिलाएगी। उन्हें जब तक रोजगार मुहैया नहीं होगा तब तक वह अपने बच्चों का खर्च कहां से चलाएंगे।

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