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गेंडे छाप अवसरवादी टोपी पहन इठलाओ - रामविलास जांगिड़

नई दिल्ली । Action India News

हिंदी का टोपी शब्द बड़ा विवादास्पद, वादास्पद व दादास्पद है। यह शब्द हिंदी के तोप या तोपना से जोड़ा गया है। स्वयं तोपना प्राकृतिक रूप से तोप के संबंध को ही कहा गया है। तोप का तो आपको पता ही है कि वह कागजों में ही गरजती रही है। सही है कि टोपी धारी कब वोटखेंचक कुर्सीधारी बनकर वोटर को तोप से उड़वा दे इसका पता ही नहीं चलता है।

नेपाली कोष कल्पतरु में टोपी का टॉप से संबंध मानते हैं तो पुर्तगाली इसे तोपों से उत्पन्न हुआ मानते हैं। दोनों ही सही है। यह टोपी वास्तव में आई कहां से? यह भी शंका की बात है। लघु व दीर्घ, बहुत छोटी व बड़ी सभी टाइप की शंकाएं वातावरण में व्याप्त है! क्योंकि इसकी टोपी इसके सिर और इसका सिर उसकी टोपी में तमाम शंकाएं आप्त हैं।

एक दूसरे की टोपी उछालने में अपनी टोपी को बचाए रखना ही एक महान टोपीधारी का धर्म बन गया है। ऐसी स्थिति में यह टोपी शब्द लगातार मर्यादित रूपा विवादित बनता जा रहा है। पता नहीं कब-किसे, कहां-कैसे कौन बंदा-बंदी चूना लगाकर टोपी पहना जाए! श्री मान जी इसका पता लगाने में अच्छे-अच्छों की नानी मृत्यु को प्राप्त हो चुकी है।

माना जाता है कि भारतीय भाषाओं में यह शब्द तुर्की भाषा के घोड़े पर सवारी गांठते हुए आया हुआ है। कई जगह पुर्तगालियों के संपर्क बाद ही टोपी का प्रयोग मिलता है। पुर्तगाली शब्द का टोपिया तोपों से जुड़ा है। तब इसको बहुत ही सटीक माना जाएगा क्योंकि यहां जो कोई भी टोपी पहनता है वास्तव में एक दूसरे को तोप से उड़ाने की कोशिश ही करता रहता है।

अलग-अलग प्रकार की टोपी वाले सिर अलग-अलग प्रकार के तोपों से उड़ाने की कोशिशें करते रहते हैं। इस प्रकार हवा में कई तरह की रंग-बिरंगी टोपियां उछाली जाती है। संस्कृत के एक ग्रंथ धूर्त समागम में एक शब्द टॉपर आया है। जिसका अर्थ होता है छोटा थैला।

वास्तव में यह टोपी एक प्रकार का छोटा थैला ही है क्योंकि इस थैले में कई प्रकार के कमीशन और ठेकों से संबंधित रुपयों को भरकर इन्हें अपने घर में प्रतिदिन ले जाने का कर्म किया जाता है। मेरे विचार से वास्तव में टोपी का मूल व सार्थक शब्द यही है क्योंकि अर्थ और भाव दोनों की दृष्टि से ही यह शब्द टपोरी और उससे प्राप्त अन्य सभी रूपों में ही समान टपोरत्व की शक्ति रखता है।

इधर इस शब्द के बारे में बहुत कुछ जानने और पढ़ने को मिला है। गांधी से लेकर गूगल देव के मार चक्कर काटने पर भी ऐसी कोई फोटो नहीं मिली जिसमें गांधी जी कोई अपनी ट्रेडमार्का टोपी लगाये हुए हों। लेकिन गांधी टोपी का अपना जलवा है जो जाने कहां से पैदा हुआ है और नेताई व्यापार में यह टोपी करिश्माई कार्य कर रही है।

दिल्ली में केजरीवाल की टोपी हो या फिर उत्तर प्रदेश में अखिलेश की टोपी हो। इधर महाराष्ट्र में ठाकरे टोपी ने अपना एक नया ही रूप धारण किया है। ठाकरे टोपी पवार टोपी से आपस में मिलकर एक अलग तरह की कांग्रेसी टोपी से सौदा कर बैठी है। गांधी के नाम की टोपी देश में खूब चली, चल रही है और चलती ही रहेगी।

आज देश में अलग-अलग रंग की अलग-अलग टोपियां हैं। किसी का रंग लाल है तो किसी का काला। किसी का केसरिया तो किसी का नीला। बेनीआहपीनाला कलर फुलं फूल बनाने के लिए बाजार में रंगीन टोपियां उपलब्ध है। कुछ पार्टी बाजों ने टोपी को अपने गणवेश में जगह दी। दो अक्तूबर को देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र गांधी टोपी ही दिखाई देती है।

अब इस तरह की टोपी पहनना पाॅलिटिकल आवश्यकता हो गई है। अगर कोई किसी प्रकार की टोपी न पहन पाए तो नेतागीरी के पहले राउंड में ही वह आउट हो जाता है। खुद को योग्य नेता दिखाने व आम आदमी से कनेक्ट कर मंत्री पद पाने के लिए ही टोपी पहनी, पहनाई व उछाली जाती रही है।

वोटों के तुष्टिकरण व मंत्री पद के पुष्टिकरण में वोट हड़पू एंड खाऊनीति के तहत वांछनीय टोपी पहनना आवश्यक है। सत्ता के गलियारों में खड़ा है टोपी वाला। बिना प्याज के रो रहा है रोटी वाला। थाने में पड़ा सो रहा है सोटी वाला। गली के नुक्कड़ पर मजमा जमाता टोपीवाला। सच्चे का है मुंह काला। वोटों की फसल जल्दी से काट लाओ। हर चुनाव में कुर्सी छाप टोपीवाले झूठ बाज का है बोलबाला। अपने राज के लिए टोपी नीति सजाओ। गेंडे छाप अवसरवादी टोपी पहन खूब इठलाओ।

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