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असम के लिए बाढ़ वरदान या अभिशाप ? - अली खान

असम के लिए बाढ़ वरदान या अभिशाप ? - अली खान
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नई दिल्ली । Action India News

देश में हर साल बारिश का पानी मौत का सबब बनकर टूट पड़ता है | बाढ़ का पानी जानवरों के साथ-साथ भौतिक संपत्ति को भारी पैमाने पर नुकसान पहुंचाता हैं | देश में कभी केरल बाढ़ की भयावहता को झेलता है, तो कभी बिहार बाढ़ की भेंट चढ़ता है | जब जिक्र पूर्वोत्तर राज्यों का होता है, तो असम की गिनती बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित प्रदेश के रूप में होती है |

असम में पिछले कुछ वर्षों की बात करें, तो यहां हर 2 वर्ष के भीतर बाढ़ आन दस्तक देती है | असम में जब भी बाढ़ आई है, तब उसका सर्वाधिक क्षेत्र प्रभावित हुआ है | इस साल असम में बाढ़ के चलते 70 से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा हैं | वहीं पर जानवरों के मरने का सवाल है, तो उसका आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हैं |

असम में बाढ़ से प्रभावित आबादी की बात करें तो लगभग 40 लाख से अधिक लोग इससे प्रभावित बताए जाते हैं | हम बाढ़ की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से ही बखूबी लगा सकते है | ऐसा बिलकुल नहीं है कि असम में इस साल बाढ़ ने अपना भयंकर रूप दिखाया है बल्कि हर साल बाढ़ अपना बरपाती है |

बाढ़ इतना कहर बरपाती है कि जन जीवन सामान्य होने में महिनों गुजर जाते हैं | वहां न सिर्फ फसलें चौपट होती हैं बल्कि भौतिक संरचना भी खासी प्रभावित होती है | बाढ़ के पानी का तीव्र वेग अपने साथ मिट्टी बहा ले जाता है | जिससे वहां मिट्टी की उपजाऊ परत गायब हो जाती है |

असम की इस बाढ़ से ग्रसित क्षेत्रों में से एक मुख्य क्षेत्र काजिरंगा नेशनल पार्क है, जो हर वर्ष की भांति इस बार भी जलमग्न हो गया है | इस बार काजिरंगा नेशनल पार्क के कुल क्षेत्र का 85 फीसदी भाग जलमग्न हो गया है | इस दौरान करीब सौ जानवरों की मौत हो चुकी हैं | इस बाढ़ से जानवरों में सर्वाधिक हिरन, गैंडा और जंगली सूअर प्रभावित हुए हैं |

काजिरंगा नेशनल पार्क सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र माना जाता है | यह राष्ट्रीय पार्क ब्रह्मपुत्र नदी और कार्बी आंगलोंग पहाड़ियों के बीच अवस्थित है | काजिरंगा नेशनल पार्क के बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि असम में आने वाली बाढ़ इसके लिए सबसे बड़ी वरदान है | क्योंकि इसका पारिस्थितिकी तंत्र एक नदीय पारिस्थितिकी तंत्र है |

इसके लिए यह जरूरी है कि यहां पानी की आपूर्ति हो | इस आपूर्ति को पुरा करने में बाढ़ अपना कारगर योगदान अदा करती है | काजिरंगा घास के मैदानों को हरा-भरा और खुशहाल करने में बाढ़ का काफी योगदान रहता है | वहीं बाढ़ का पानी जल-भराव क्षेत्र में मछली प्रजनन में भी सहायक होता है |

जहां बाढ़ के फायदे है, वहीं इसके नुकसान भी कम नहीं हैं | बाढ़ के कारण भारी जान-माल की क्षति उठानी पड़ती है | बाढ़ के चलते विकास न केवल बाधित होता है बल्कि पिछड़ेपन का प्रमुख कारण भी बनता है | बाढ़ से लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है, लेकिन इससे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक क्षेत्र भी सर्वाधिक प्रभावित होते हैं | बाढ़ के आने के पीछे के कई कारण हो सकते हैं | यदि हम बड़े कारणों पर प्रकाश डाले तो मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और निर्वनीकरण को माना जाएगा | पिछले कुछ वर्षों में जलवायु के मानक पैमानों में बड़ा फेरबदल देखा गया है |

जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा मानवीय कारक जिम्मेवार हैं | जिम्मेवार कारकों में ओजोन परत में छेद का होना माना जाता है, चूंकि इससे जीव, कृषि तथा जलवायु पर बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि यह परत सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है | संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में प्रतिदिन औसतन 50 प्रकार के जीवों का विनाश हो रहा है जो वास्तव में आनुवंशिक विनाश है |

ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर प्रवाल जीवों के असामयिक विनाश का मुख्य कारण भी ओजोन परत में ह्रास को माना जा रहा है | ग्रीन हाउस गैसों में तीव्र वृद्धि के परिणामस्वरूप भूमंडलीय ताप में वृद्धि हुई है | भूमंडलीय ताप के लिए मुख्यतः कार्बन डाई अॉक्साइड उत्तरदायी है | एक अनुमान के मुताबिक वायुमंडल में कार्बन डाई अॉक्साइड की मात्रा में लगातार इजाफा होता रहा, तो 1900 ईस्वी की तुलना में 2030 में विश्व के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की संभावना जताई जा रही है | इससे समुद्री जल स्तर के बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है | जिससे अनेक द्वीपों के जलमग्न होने की संभावना है | जलवायु परिवर्तन बाढ़, भूस्खलन और सुनामी के लिए भी उत्तरदायी माना जाता है |

हालांकि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कई प्रयास किए जा रहे है, इसमें रियो-डि-जेनेरियो सम्मेलन-1992 अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा महत्वपूर्ण प्रयास था | वहीं ग्रीन हाउस गैसों का स्तर कम करने और उत्सर्जन मानक निर्धारित करने की दिशा में क्योटो सम्मेलन-1997 भी उल्लेखनीय हैं | फिर भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सतत व लगातार प्रयासों की सख्त दरकार हैं |

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