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राज्य में गणेश चतुर्थी की धूम, मंदिरों में सिद्धिदाता गणेश की पूजा-अर्चना

राज्य में गणेश चतुर्थी की धूम, मंदिरों में सिद्धिदाता गणेश की पूजा-अर्चना
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गुवाहाटी । Action India News

पूरे देश के साथ असम में भी गणेश चतुर्थी पर्व उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। शनिवार की सुबह से आरती से लेकर मंगल गायन किया जा रहा है। करोना संकट के कारण गणेश उत्सव हर बार की तरह इस बार धूमधाम से नहीं मनाया गया। इस साल गणेश उत्सव कुछ अलग रूप में सादगी के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या को बेहद सीमित किया गया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश का जन्म हुआ था। इसी दिन देशभर में गणेश चतुर्थी उत्सव मनाया जाता है। हालांकि, इस बार कोरोना के मद्देनजर बहुत सतर्कता बढ़ती जा रही है। वहीं गणेश चतुर्थी के अवसर पर सरकारी नीति-नियमों का पालनकर राजधानी गुवाहाटी के विभिन्न गणेश मंदिरों में सुबह से पूजा अर्चना, हवन, मंगल आरती शुरू किया गया हैं।

शनिवार को गुवाहाटी के गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी के अवसर पर गणेश भगवान की विशेष पूजा व आरती की गई। लोगों में उत्साह देखा गया। पुजारियों ने हवन किया और मंगल आरती की।

राजधानी के खानापाड़ा गणेश मंदिर, बेलतला गणेश मंदिर, लताशील गणेश मंदिर, मांलीगांव पाण्डुनाथ मंदिर, लंकेश्वर, गणेशगुड़ी के गणेश मंदिर आदि विभिन्न गणेश मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु उपस्थित हुए। लेकिन, कोरोना संक्रमण के चलते मंदिर के भीतर प्रवेश कर पूजा करने की अनुमति किसी को नहीं दी गयी है।

मंदिर प्रबंधन ने सिद्धिदाता गणेश की पूजा के लिए श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के बाहर से ही पूजा करने के लिए विशेष व्यवस्था की है। लोगों के घर पर भी गणेश भगवान की पूजा अर्चना हो रही है। शनिवार को नगर में सप्ताहिक लॉक लॉकडाउन के चलते श्रद्धालुओं ने नियमों का पालन करते हुए गणेश जी का दर्शन कर रहे हैं।

वहीं नगर के साथ-साथ पूरे राज्य में हर्ष और उल्लास के साथ गणेश चतुर्थी उत्सव मनाया जा रहा। इस अवसर पर काजीरंगा के ऐतिहासिक हाथी पत्थर में भी सादगी से गणेश चतुर्थी मनायी गई।

इस मंदिर के साथ एक इतिहास जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि स्वर्गदेव गदाधर सिंह की स्मृति में कार्बी पहाड़ के निचले हिस्से में हाथी जैसे आकार के एक विशाल शिलाखंड को एक शिल्पी ने गणेश देवता का आकार दिया था। समय के चलते गणेश जी की मूर्ति मिट्टी से आधा ढंक गया थी।

1965 में वहां कार्बी जन गोष्टी के लोगों ने जब नई बस्ती स्थापित की तो वहां मिट्टी से आधा ढंकी मूर्ति को लोगों ने देखा। बाद में एक सेवा निवृत्त सेना के जवान ने यहां पर एक मंदिर बनवा दिया। उस समय से हाथी पत्थर के गणेश मंदिर में पूजा-अर्चना चल रही है। यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक बना हुआ है।

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