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लैंगिक भेदभाव बढ़ती जनसंख्या का मूल कारण

लैंगिक भेदभाव बढ़ती जनसंख्या का मूल कारण
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नई दिल्ली । सोनम लववंशी ( Action India News )

11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की सभा में 11 जुलाई 1989 को पहला विश्व जनसंख्या दिवस मनाया गया था। इस दिवस का प्रमुख लक्ष्य लोगो के बीच जनसंख्या से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता क़ायम करना था। किसी भी राष्ट्र के सामने आज सबसे बड़ी समस्या है तो वह कोई और नही बल्कि बढ़ती हुई जनसंख्या ही है।

आज हमने किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा तरक़्क़ी की है तो वह बढ़ती आबादी ही है। 1947 में हमारे देश की आबादी 34.20 करोड़ थी, जो अब 1अरब 25 करोड़ से ऊपर है। भारत के पास विश्व का 2.4 प्रतिशत भू भाग है। जिसमें विश्व की लगभग 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है। हम बात करें जनसंख्या वृद्धि की तो इसका मूल कारण लैंगिक भेदभाव ही है। कहने को भले ही हम 21वीं सदी में जी रहे है।

चांद और मंगल पर जीवन तलाशने की बात करते है, लेकिन आज भी हमारी सोच में लिंग भेद की मानसिकता भरी पड़ी है। आज भी समाज में बेटों की चाहत बेटियों से अधिक है। यही चाहत जनसंख्या वृद्धि का कारण बनती है।

2019 के ग्लोबल जेंडर इक्वलिटी इंडेक्स में भारत का 129 देशों में 95 वें स्थान पर होना यह बताता है कि हम आज भी पुरूषवादी मानसिकता से ग्रस्त है। भारतीय समाज में पुत्र जन्म को आज भी सौभाग्य के रूप में देखा जाना तो वही लड़कियों को पराये धन के रूप में समझा जाना चिंता का विषय बना हुआ है।

और यही पुत्र चाहत की परिणति जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण बनती है। आज जनसंख्या वृद्धि जिस रफ़्तार से बढ़ रही है। मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उससे कही अधिक तेजी से प्रकृति का दोहन कर रहा है।

यही प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है कि जो घटनाएं वर्षों के लंबे अंतराल में देखने को मिलती थी आज के वर्तमान समय में हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गयी है। आये दिन देश के अलग अलग भूभाग में कही भूकम्प तो कही बाढ़ और न जाने ऐसी कितनी आपदाएं घटती रहती है जो मानव के प्रकृति के साथ किए गए दुष्परिणाम का नतीजा है।

आज मानव ने भले ही अणुबम और परमाणु बम बनाकर अपना सीना चौड़ा कर लिया हो लेकिन आज भी मानव के पास प्राकृतिक घटनाओं से लड़ने का उनका सामना करने की शक्ति उपलब्ध नहीं हो सकी है।

आज भले ही पूरी दुनिया विश्व जनसंख्या दिवस को मना रही हो। लेकिन जब तक महिलाओं की उपयोगिता उनके महत्व को समाज स्वीकार नहीं कर लेता तब तक जनसंख्या वृद्धि को रोक पाना कोरी कल्पना ही बनकर रह जायेगा।

आज समय है महिलाओं को जागरूक करने का उन्हें शिक्षा देने का। बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रोकना का। सरकार के द्वारा चलाए जा रहे परिवार नियोजन जैसे कार्यक्रम का व्यापक तौर पर प्रचार करने का।

जनता को छोटा परिवार सुखी परिवार के महत्व को समझाने का। आज विश्व की आबादी 7 अरब 71 करोड़ के आंकड़े को छू रही है। प्रति वर्ष विश्व की जनसंख्या में 8.30 करोड़ लोग का इज़ाफ़ा हो रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विकसित देश की आबादी में 30 प्रतिशत जनसंख्या अनचाहे गर्भधारण का नतीजा है।

अब इसे अपवाद ही कह सकते है कि विकासशील देश हो चाहे विकसित देश जनसंख्या वृद्धि के मामले में कोई पीछे नही है। ऐसे में प्रकृति के चक्र को अगर बेहतर बनाएं रखना है तो जनसंख्या नियंत्रण को व्यापक पैमाने पर लागू करना होगा। प्रकृति के अनियंत्रित दोहन को रोकने की दिशा में क़दम बढ़ाना होगा, क्योंकि महात्मा गांधी ने भी कहा था कि इस धरा पर सबकी जरूरत भर का सामान है, मगर सबके लालच को पूरा करने का नहीं।

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