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भारत-चीन से 62 के युद्ध में शहीद हुए थे हमीरपुर के दो सैनिक

भारत-चीन से 62 के युद्ध में शहीद हुए थे हमीरपुर के दो सैनिक
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  • कई सैनिक चीन की गोलाबारी से हुये थे विकलांग, 37 साल बाद जारी हुआ था वीर गति का प्रमाणपत्र

हमीरपुर । एएनएन (Action News Network)

वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में हमीरपुर के दो सैनिकों ने भी वीरता की पराकाष्ठा पार करते हुये दुश्मनों को मुंह तोड़ जवाब दिया था। हालांकि बॉर्डर पर भारत का तिरंगा फहराते हुये गोलाबारी में ये दोनों वीर शहीद भी हो गये थे। 57 साल बीतने के बाद भी आज तक एक शहीद का शव भी नहीं मिल सका। चीन की नापाक हरकत को लेकर यहां शहीदों के परिजनों और रिटायर्ड फौजियों में चीन के खिलाफ आक्रोश है।

हमीरपुर के मझगवां थाना क्षेत्र का मलेहटा गांव फौजियों का गढ़ माना जाता है। इस गांव से तीन दर्जन से अधिक लोग भारतीय सेना में सेवायें दे चुके हैं। मौजूदा समय में भी गांव के एक दर्जन लोग देश की सीमा पर तैनात हैं।

इस गांव के तमाम ऐसे परिवार हैं जिन्होंने भारतीय सेना में रहते हुये सीमा की रक्षा के लिये बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। इस बार चीन के सैनिकों ने भारत के बीस सैनिकों की हत्या कर दी तो यहां रिटायर्ड फौजियों की तेवर तल्ख हो गये हैं।

गांव के हर घर में बस एक ही आवाज उठ रही है कि चीन को उसके किये की सजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब जरूर देनी चाहिये। मलेहटा गांव निवासी रिटायर्ड फौजी हरी सिंह ने बताया कि उनके बड़े भाई प्रकाश सिंह ने भारत और चीन के पहले युद्ध के दौरान गोलीबारी में शहीद हो गये थे।

उन्होंने बताया कि उनके भाई का शव आज तक परिवार को नहीं मिल पाया है। भारत के तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष वेद मलिक ने 6 दिसम्बर 1999 को शहीद प्रकाश सिंह को चीन की सेना के विरुद्ध की गयी कार्रवाई के दौरान मातृभूमि की रक्षा करते हुये सर्वाेच्च बलिदान देने का प्रमाण पत्र देकर मान बढ़ाया था।

स्व. प्रकाश सिंह की पत्नी उर्मिला देवी (81) ने गुरुवार को बताया कि खुशी है कि देश की रक्षा के लिये उनके पति शहीद हुए लेकिन उन्हें आखिरी बार भी देखने का मौका नहीं मिला। सरकार ने भी शहीद के सम्मान के लिये उनके नाम की एक प्रतिमा भी नहीं लगवाई है।

चीन से मोर्चा लेते गोलाबारी में शहीद हुये थे प्रकाश सिंह

मलेहटा गांव के निवासी रिटायर्ड हवलदार हरी सिंह भी वर्ष 1960 में भारत-चीन बॉर्डर पर नथूला, खरगोस सहित अन्य इलाकों में सीमा सुरक्षा के लिये तैनात थे। इनके बड़े भाई प्रकाश सिंह सेकेंड राजपूत रेजीमेंट के सिपाही थे।

वर्ष 1962 में 21 अक्टूबर को भारत-चीन युद्ध के दौरान इन्होंने नेफा के पास सीमा पर चीन के सैनिकों से कड़ा मोर्चा लेते हुये गोलाबारी में शहीद हो गये थे। इनके तमाम साथी भी जख्मी हुये थे। हरी सिंह ने बताया कि शहादत के बाद प्रकाश सिंह का शव आज तक नहीं मिल सका।

राजपूत रेजीमेंट के हवलदार ज्ञान पाल सिंह भी हुये थे शहीद

मलेहटा गांव के निवासी नरेन्द्र सिंह भी भारतीय सेना में सूबेदार थे। ये कई साल पहले रिटायर्ड होकर गांव में रह रहे है। इन्होंने बताया कि गांव के ज्ञान पाल सिंह भी राजपूत रेजीमेंट में हवलदार थे जो भारत चीन के पहले युद्ध (1962) में कर्तव्य पालन की वेदी पर दुश्मन की गोलियों का सामना करते हुये 18 नवम्बर 1962 को शहीद हो गये थे। उन्होंने बताया कि चीन कभी भी खुलकर भारत से लडऩे का मादा नहीं रखता है लेकिन वह धोखे से ही भारत के सैनिकों को हमेशा नुकसान पहुंचाता है।

भारत चीन की जंग में हमीरपुर के कई सैनिक हुये थे विकलांग

मलेहटा गांव के रहने वाले हरी सिंह 16 राजपूत रेजीमेंट में रहकर वर्ष 1965 व 1971 में देश की सीमा की रक्षा करते समय हुये युद्ध में दुश्मन की गोलियों से घायल हो गये थे। वीरता दिखाते हुये ये विकलांग भी हुये थे।

इन्होंने बताया कि राठ कस्बे के सिकन्दरपुरा निवासी राम सिंह राजपूत रेजीमेंट के लांसनायक थे जो वर्ष 1962 में भारत चीन युद्ध में अपनी दोनों टांगे गंवाकर विकलांग हुये थे। चीन को मुंह तोड़ जवाब देकर शहादत हुये प्रकाश सिंह का परिवार तीन पीढ़ी से देश की सेवा में है।

चीन हमेशा पीठ में खंजर भोंकने का करता है काम

रिटायर्ड हवलदार हरी सिंह ने गुरुवार को शाम बताया कि वर्ष 1962 में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने चीन पर बड़ा विश्वास किया था। भरोसे में आयी सरकार को चीनी लोगों ने पीठ में खंजर घोंपने का काम किया।

उन्होंने बताया कि कांग्रेस की सरकार की बड़ी चूक के कारण ही भारत के सैनिकों पर धोखे से वार किया गया था जिसमें उनका बड़ा भाई प्रकाश सिंह को अपनी जान गवांनी पड़ी। उस जमाने में भी सरकार ने शहीद के बारे में यहीं पता नहीं लगाया कि वह जीवित भी है कि नहीं।

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