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आज़ादी की जंग लड़ी इन अख़बारों ने और फ्री प्रेस, सरकारी अनुदानों के मजे लूट रहे हैं आज के ब्रांडेड अख़बार

आज़ादी की जंग लड़ी इन अख़बारों ने और फ्री प्रेस, सरकारी अनुदानों के मजे लूट रहे हैं आज के ब्रांडेड अख़बार
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भारतीय पत्रकारिता आज अपने चरम पर है. हर चैनल अपने आप को तेज – तर्राट और सेकुलर बताने को ललायित है. जहाँ देखो बस टीआरपी बढ़ाने की होड़ है. लोगो से जुडी समस्याओ के लिए किसी के पास समय नहीं. यहाँ तक की लोकशाही का चौथा आधारस्तम्भ माने जाने अखबारों की भी यही हालात है. विज्ञापनों के बूते कमाई का अग्रिम जरिया बन चुके इन समाचार पत्रों ने भी अपनी सार्थकता खो दी है. आज व्यक्ति अख़बार तो पढता है मगर उनसे लगाव की भावना बिलकुल नहीवत हो चुकी है.

इतिहास में झांके तो हम अक्सर सुनते-पढ़ते हैं कि "अखबारों ने भारत की आजादी में एक अहम् भूमिका निभाई थी." मगर सच्चाई को परखें तो हमें मालूम होगा की अंग्रेजी हुकूमत के समय देश में एकता, सद्भावना, समाजसेवा और देशभक्ति जैसे बीजो को अंकुरित करने वाले इन स्वतंत्रता सैनानी अखबारों का आज ना ही कोई वजूद है नाही इनको पुनर्जीवित करने को कभी सोचा गया. आजादी की जंग लड़ने वाले इन अखबारों की बातें सिर्फ सुनने और पढने तक ही सीमित है. वहीं दूसरी ओर, कुछ ऐसे अख़बार जिनकी शुरुआत ही अंग्रेजो की भारत विरोधी नीतियों का समर्थन करने हेतु हुई थी वे आज देश की पत्रकारिता की पहचान बने हुए हैं.

अफ़सोस की बात तो यह भी है कि आजादी के 60 सालो में कितनी ही सरकारे आई गई, कितने की मीडिया चैनल्स और अखबारों ने जन्म लिया और बंद भी हो गए लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर किसी का भी ध्यान नहीं गया या शायद इसे जरुरी नहीं समझा गया. मगर आज हम इस मुद्दे को टटोल कर आपके सामने रखेंगे.

भारत का पहला प्रिंटेड समाचार पत्र जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी के एक कर्मचारी ने शुरू किया था.

जेम्स ऑगस्टस हिक्की मूलतः आयरलैंड के थे और ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करे थे. उन्होंने ई. सन 1780 में भारत के पहले प्रिंटेड समाचार पत्र का प्रमोचन किया जिसका नाम 'बंगाल गेजेट' था इसे आगे चलकर 'हिक्की'ज बंगाल गेजेट' के नाम से भी जाना गया. उन्हें क्रिस्टियन मिशनरी द्वारा टाईप-राईटर की अनुमति मिली थी. उनका अख़बार अंग्रेजी भाषा में छपता था जिसमे कुल 12 पन्ने थे.


ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी होते हुए भी वे भारत के पहले पत्रकार थे जिन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया था. उन्होंने तत्कालीन गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स के अनैतिक संबंधो और उसके द्वारा भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों की कटू आलोचना अपने समाचार पत्र से की थी, जिसके कारण उन्हें जेल भेज दिया गया. कुछ समय बाद अच्छे आचरण के कारण उन्हें जेल से छोड़ दिया गया मगर फिर भी उन्होंने अंग्रेजो की सरकार के खिलाफ लगातार लिखना जारी रखा जिसके कारण उनका टाईप-राईटर छीन लिया गया और उन्हें भारत से बहार भेज दिया गया. इस तरह भारत के पहले पहले प्रिंटेड और नैतिक समाचार पत्र को वारेन हेस्टिंग्स की तानाशाही ने बंद करवा दिया.

भारत का पहला हिंदी अख़बार

वारेन हेस्टिंग्स की तानाशाही ने भले ही 'हिक्की'ज बंगाल गेजेट' को बंद करवा दिया लेकिन उस अख़बार के असर की जो गूंज भारत में सुनाई देना शुरू हुई थी इसको सबसे पहले कानपुर के साहित्यकार पंडित जुगल किशोर सुकुल सुना.

उन्होंने अपने जीवन की सम्पूर्ण जमापूंजी को इकट्ठा कर बड़ी चालाकी से अंग्रेजों से ही उनकी प्रिटिंग मशीन खरीदी. शायद अंग्रेजी हुकूमत को इस बात की भनक भी नहीं होगी कि वे पंडितजी को प्रिंटिंग मशीन देकर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं.

अंग्रेजो की नीतियों के बारे में सीधा-सीधा लिखने के कारण जो हश्र 'हिक्की'ज बंगाल गेजेट' का हुआ था उससे सबक लेते हुए पंडित जुगल किशोर ने अपने अख़बार के लिए ब्रज और खड़ीबोली को चुना जो अंग्रेजो को एकदम से पल्ले नहीं पड़ने वाली थी. उन्होंने अपने अख़बार का नाम 'उदन्त मार्तण्ड' संस्कृत से लिया जिसका अर्थ होता है 'समाचार सूर्य'.


चूँकि 'उदन्त मार्तण्ड' में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ व्यंग और खड़ीबोली की भाषा में लिखा जा रहा था इसलिए अंग्रेजो को पहले तो पंडितजी के मंसूबो की भनक तक नहीं लगी लेकिन कुछ समय बाद जब उन्होंने पाया कि जनता में जो क्रांति की भावना पैदा हो रही है इसके पीछे इस अख़बार का भी हाथ हो सकता है तब उन्होंने अखबार की डाक ड्यूटी बढ़ा दी. जिसका सीधा असर पंडितजी की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और इस तरह भारत का पहला हिंदी अख़बार बंद हो गया.

भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और उनकी पत्रकारिता

राजा राम मोहन रॉय की इतिहास में एक समाजसुधारक की छवि है. उस समय भारतीय समाज अंधविश्वास और कुरीतियों से लिप्त था, जिस पर राजा राम मोहन रॉय ने अपने अखबारों के जरिये गहरे प्रहार किए और जनता में जागरूकता पैदा की. उन्होंने ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन(अंग्रेजी), संवाद कौमुदी(बांग्ला) और मिरातुल-उल-अख़बार(फारसी) जैसे अखबारों का संपादन और प्रकाशन किया. उन्होंने द्वारकानाथ टैगोर एवं प्रसन्न कुमार टैगोर के साथ साप्ताहिक समाचार पत्र 'बंगदूत' निकाला. बंगदूत एक अनोखा अख़बार था, इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था.

राजा राम मोहन रॉय भी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए नौकरी करते थे मगर कुछ समय के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया. वे सही अर्थ में भारतीय भाषायी प्रेस के संस्थापक माने जाते हैं. उनके समाज सुधारक आंदोलनों और पत्रकारिता का लोगो पर गहरा प्रभाव पड़ा. उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी, वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया. उनकी पत्रकारिता का मुख्य आशय भारतीय समाज में फैले दूषणों – बाल विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का अंत करना और कुछ हद तक अंग्रेजो का विरोध करना था. उन्होंने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए कडा संघर्ष किया था.

उन्होंने अपने अखबारों में अंग्रेजो की आयलैंड विरोधी निति का पुरजोर से विरोध किया जिसके कारण सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए अध्यादेश जारी किया. और इसके विरोध में राजा राममोहन राय ने 4 अप्रैल 1823 को "मिरात-उल-अख़बार" और "संवाद कौमुदी" का प्रकाशन बंद कर दिया.

जब एक मुस्लिम क्रन्तिकारी के अख़बार से डर गए अंग्रेज

अजीमुल्ला खां ने फरवरी सन 1857 में 'पयाम-ए-आजादी' नामक अख़बार शुरू किया. यह अख़बार बहुत कम समय तक चला मगर जब चला अंग्रेज ठीक से सो नहीं पाए. अंग्रेज सरकार इससे इतनी भयभीत थी कि जिस किसी के पास भी इस अख़बार की कॉपी पायी जाती, उसे गद्दार और विद्रोही समझ कर गोली से उड़ा देने का आर्डर था.

अमृत बाजार पत्रिका

1868 में वर्तमान बांग्लादेश के जैजर जिले के अमृत बाजार महोल्ले से 4 भाइयो हेमंत, शिशिर, वसंत और मोतीलाल ने एक छोटे से प्रयास स्वरुप एक बांग्ला साप्ताहिक पत्र 'अमृत बाजार पत्रिका' शुरू की. पत्रिका के सातवे अंक में ही जैजर जिले के डिप्टी मजिस्ट्रेट के गुनाहों की खबर छापी. कुछ समय बाद यह पत्रिका बहुत लोकप्रिय हुई जिसके कारण तत्कालीन गवर्नर जनरल लोर्ड लिटन वर्नाक्युलम प्रेस एक्ट लाए, जिसका मुख्य मकसद 'अमृत बाजार पत्रिका' की आवाज दबाना था.

लोर्ड लिटन के प्रेस एक्ट से बचने के लिए इसे पूर्णतः अंग्रेजी साप्ताहिक बना दिया गया, जो आगे चलकर अत्यधिक लोकप्रिय रहा. इसमें अंग्रेजी सरकार की नीतियों की कटु आलोचना की गई. सरकार की आलोचना करने के कारण पत्रिका के कई संपादकों को जेल की सजा भी भुगतनी पड़ी.

भगत सिहं की पत्रकारिता

शायद हम में से बहुत काम लोगो को इस बात का अंदाज़ा होगा कि भगत सिंह के क्रन्तिकारी जीवन का कनेक्शन 'प्रताप' अख़बार से शुरू हुआ था. यह अख़बार भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के जानेमाने सिपाही, सुधारवादी नेता गणेशशंकर 'विद्यार्थी' का था. भगत सिंह इस क्रन्तिकारी अख़बार में नौकरी करते थे. उनकी छवि एक निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकार की थी.

भगत सिंह की चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात भी इसी अख़बार में नौकरी करते हुए हुई थी. अपनी खास बनावट के चलते, उनदिनों प्रताप प्रेस क्रांतिकारियों के लिए छिपने का गढ़ हुआ करता था लेकिन आज प्रताप प्रेस के उस भवन को कोई देखने वाला तक नहीं.

Source: catchnews.com

'प्रताप' में प्रकाशित लेखों के कारण गणेशशंकर 'विद्यार्थी' को 5 बार जेल जाना पड़ा था. अंग्रेजो के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने के चलते 'प्रताप' की लोकप्रियता मानो अपने चरम पर थी. 1913 में इसकी केवल 500 प्रतियाँ छपती थीं, वहीं 1916 तक इसकी 6,000 प्रतियाँ और 1919 तक आते-आते तो 9,000 प्रतियाँ छपने लगीं. 1921 में रायबरेली में किसानों ने एक बहुत बड़ा आन्दोलन किया था. प्रताप ने इस आंदोलन का समर्थन किया और इसकी रिपोर्टिंग की. इस वजह से अंग्रेज नाराज़ हो गए. अंग्रेजो की नाराज़गी की सीमा क्या होगी इसका आप इस बात से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जिस समय 70 पैसे में एक किलो शुद्ध घी आसानी से मिल जाता था उस ज़माने में 'प्रताप' पर 15,000 रूपए का जुर्माना ठोका गया था.

आपको बता दें कि यह 'प्रताप' ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से लौटे अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा था और भारत में उनको एक विशेष पहचान दिलाई थी.

1925 आते-आते गणेशशंकर 'विद्यार्थी' राजनीती में भी आ चुके थे. वे तब के संयुक्त-प्रांत यानि आज के उत्तर प्रदेश के आला कांग्रेसी नेताओ में शुमार थे.

1928 के इर्द-गिर्द भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी नाम बदलकर प्रताप में अपने लेख छापते थे.

देश में फैली उस क्रांति को देख अंग्रेजो ने लोगों की एकता में सेंध लगाना शुरू किया और इसके तहत उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानो में फुट डाल दी. जब देश की जनता का ध्यान आज़ादी के आंदलनों से भटक कर हिन्दू-मुस्लिम के दंगो जा पहुंचा तब यह प्रताप ही था जो सांप्रदायिक सद्भाव के हिमायती अख़बार की तौर पर उभरा.

लेकिन किसको पता था कि हिन्दू-मुस्लिम के दंगो को सुलझाने वाले प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की 1931 में हत्या कर दी जाएगी और इसके साथ ही प्रताप भी कुछ दूर चलकर दम तोड़ देगा!

और तो और किसको पता था कि आज़ादी के 70 सालों के बाद भी 'प्रताप' के लिए सरकारों का खिन्न भाव 'प्रताप' के क्रन्तिकारी विचारों को भी दफ़ना देगा!

राष्ट्रिय पत्रकारिता की नींव रखने वाले लोकमान्य तिलक

23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गाँव में जन्मे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम क्रन्तिकारी पत्रकारों की सूचि में सबसे पहले आता है. वैसे तो तिलक स्कूल और कोलेज में गणित पढ़ाते थे मगर 1880 के मध्य लोगो से जुड़ने हेतु वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आए और 'राष्ट्रीय पत्रकारिता' की नीवं रखी.

वे 1881 में मराठी भाषा में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'मराठा' नामक साप्ताहिक अखबारों से जुड़े और फिर दोनों का स्वामित्व प्राप्त किया. कोल्हापुर के दीवान के बारे में लिखने के कारण उन पर मानहानि का केस हुआ और उनके सहायक अश्रेकर को जेल हुई.

सन् 1896, देश में भारी आकाल पड़ा जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई. बंबई में इसी समय प्लेग की महामारी भी फैली. अंग्रेज सरकार ने स्थिति संभालने के लिए सेना को आवाज़ लगाई. सेना ने घर-घर तलाशी लेना शुरू कर दिया जिससे जनता में क्रोध पैदा हो गया. तिलक ने इस मनमाने व्यवहार और लापरवाही से क्षुब्ध होकर केसरी के माध्यम से सरकार की कड़ी आलोचना की जिसके कारण अंग्रेजी सरकार ने उनपर लोगो को गुमराह करने, सरकार के खिलाफ लोगो को भड़काने और आंतरिक शांति को भंग करने जैसे मुक़दमे दर्ज किए. इस वजह से उन्हें डेढ़ वर्ष के कारावास में गुजरने पड़े.

1905 में अपने उन्होंने बंगाल अधिवेशन में 'बंग-भंग' आन्दोलन का नेतृत्व किया और अपने लेखो द्वारा लोगो को इस आन्दोलन से जोड़ना शुरू किया और देखते ही देखते यह आन्दोलन पुरे देश में फ़ैल गया.

1918 में रानी विक्टोरिया के खिलाफ तीखे सम्पादकीय लेख लिखने के कारण उनपर मानहानि का केस दर्ज हुआ और उन्हें 6 वर्ष कालापानी और 1000 रूपये दंड की सजा हुई. कारावास दौरान ही वे काफी कमजोर हो गए थे. 1920 में उनका स्वर्गवास हुआ.

श्रद्दांजलि के दौरान महात्मा गाँधी ने उन्हें 'आधुनिक भारत के निर्माता' और जवाहर लाल नेहरु ने 'भारतीय क्रांति के जनक' की उपाधि दी थी. आगे चल कर यही नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री बने मगर उनकी नीतियों में 'भारतीय क्रांति के जनक' को कहीं जगह नहीं मिली. 'मराठा' समाचारपत्र पहले ही बंद हो चूका था और 'केसरी' आज तिलक के वंशजो द्वारा चलाया जा रहा है. एक समय महाराष्ट्र में जनचेतना फैलाने वाला यह समाचार पत्र आज दम तोड़ने की स्थिति में है.

गाँधी की पत्रकारिता

गाँधीजी और नेहरु के सम्बन्ध किसी से छिपे नहीं है. वे गांधीजी ही थे जिनकी इच्छा के तहत जवाहरलाल नेहरु को भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया मगर नेहरु सरकार ने भी कभी गाँधीजी के विचारो को पत्रकारिता के जरिए जिन्दा रखने का कोई प्रयत्न तक नहीं किया.

गांधीजी ने भारत में रहते हुए 'यंग इंडिया' और 'नवजीवन' जैसे समाचार पत्रों का संपादन और प्रकाशन किया था. उनकी पत्रकारिता का मुख्य मकसद भारत में सद्भावना फैलाना और देश के युवा धन को सही दिशा देना था. लेकिन जल्द ही ब्रिटिश शासन द्वारा पारित कानूनों के कारण और जनमत के अभाव में ये पत्र बंद हो गये।

1933 में गांधीजी ने समाज के उपेक्षित व अस्पृक्ष्य वर्ग को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए अंग्रेजी में 'हरिजन' और हिन्दी में 'हरिजन सेवक' तथा गुजराती में 'हरिबन्धु' का प्रकाशन किया मग ये अख़बार भी स्वतंत्रता बाद बंद हो गए. गांधीजी के इन अखबारों में कभी-कभी सुभाष चंद्र बोस भी आर्टिकल्स लिखा करते थे.

गांधीजी अखबारों में विज्ञापनों के कट्टर विरोधी थे मगर उनके नाम पर ही 60 साल राज करने वाली कांग्रेस ने कभी गाँधी के सिद्धांतो को अमल करवाने हेतु नहीं सोचा. यहाँ तक की इन अखबारों के पुनरुद्धार का ख्याल भी नहीं आया. आज गाँधी के इन अखबारों की झलक, मात्र पत्रकारिता कर रहे विद्यार्थियों की पुस्तकों तक ही सिमित है.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया

इस समय 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को देश का सबसे बड़ा अख़बार माना जाता है. सरकार हो या बड़े बड़े बुद्धिजीवी सभी इसका रेफ़्रेन्स देने को पीछे नहीं हटते. यहाँ तक की छोटे मीडिया चैनल्स-अख़बार और संसद में भी इस अख़बार की रिपोर्टिंग को तर्कों का आधार बनाया जाता है.

यदि हम थोडा पीछे जाएँ और 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के इतिहास को देखे तो हमें मालूम होगा की इसे अंग्रेजो द्वारा शुरू किया था और इसका शुरुआत से ही मुख्य उद्देश्य "अंग्रेजो की भारत विरोधी नीतियों" का समर्थन करना था.

यह अख़बार 1838 में शुरू हुआ था जब इसे 'द बोम्बे टाइम्स एंड जर्नल ऑफ़ कॉमर्स' के नाम से जाना जाता था. 1861 में इसने दुसरे अखबारों के साथ मिल कर नया नाम दिया 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया'. 1892 में थॉमस बेनट 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के संपादक और मोरिस कोलेमन के साथ कम्पनी के हिस्सेदार बने. दोनों ने कंपनी का नया नाम रखा "Bennett, Coleman & Co. Ltd. (BCCL)" और आज भी 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' अख़बार इसी कंपनी की छात्र छाया में चल रहा है.

1907 के प्रथम कांग्रेस अधिवेशन में जहाँ 'द हिन्दू' जैसे अखबारों ने देशहित में सम्पूर्ण कवरेज को लोगो के समक्ष रखा था वहीं 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने इस अधिवेशन में भाग लिए नेताओ की कड़ी आलोचना की थी.

आजादी के बाद राम किशन दालमिया ने 'टाइम्स ग्रुप' पर कब्ज़ा जमाया लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान बैंक से बीमा कंपनी(जिसके अध्यक्ष वे खुद थे) में पैसो की लेन-दें करते हुए उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया. इस कांड की खबर नेहरु सरकार को होते हुए भी इसे नजरअंदाज किया गया लेकिन आगे चलके फिरोज गाँधी ने यह मुद्दा संसद में उठाया जिसके तहत दालमिया को 2 वर्ष की जेल हुई.

इस धोखाधड़ी के बावजूद, जवाहरलाल नेहरू ने 'टाइम्स ग्रुप' पर कोई भी भारी जुर्माना नहीं लगाया और इसकी मलिकी दालमिया परिवार के दामाद साहू शांति प्रसाद जैन को दे दी. 1960 में एकबार फिर दालमिया परिवार के दामाद और 'टाइम्स ग्रुप' के नए मालिक साहू शांति प्रसाद जैन को सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त 'टाइम्स ग्रुप' की नकलों की काला बाजारी करने का मामला बाहर आया. इस अवैध काम के लिए शांति प्रसाद जैन को दोषी ठहराया गया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा. इसके बाद भारत सरकार ने 'टाइम्स ग्रुप' का स्वामित्व अपने हाथ ले लिया.

देश की लोकशाही को खंडित करने वाले आपातकाल के दौरान एकबार फिर 'टाइम्स ग्रुप' की मलिकी, सरकार का विश्वास तोड़ने के दोषी, शांति प्रसाद जैन के बेटे अशोक जैन को दे दी गई. वैसे तो इंदिरा गाँधी शरुआत से ही निजीकरण की विरोधी थी मगर यहाँ किस वजह से उन्होंने अपनी ही सरकार से ज्यादा एक निजी कंपनी पर विश्वास किया इसका पता कुछ समय बाद चला जब 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' आपातकाल को समर्थन देने वाला भारत का पहला अख़बार बना. यह वही समय था जब लोग 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को 'द टाइम्स ऑफ़ इंदिरा' के नाम से जानने लगे थे.

आजादी के समय देश में अंग्रेज विरोधी लहर को समाप्त करने हेतु समय समय पर अंग्रेजो ने भारतीय भाषा की पत्रकारिता पर नए नए एक्ट द्वारा अंकुश लगाने का प्रयत्न किया जिसमे बंगाल, बोम्बे और मद्रास ओरडीनन्स एक्ट मुख्य थे. अंग्रेजो के इन एक्ट्स का हेतु भारतीय भाषा के अखबारों की आवाज दबाना, जिसमे अमृत बाजार पत्रिका मुख्य थी. अंग्रेजो की नीति का अनुसरण करते हुए कुछ उसी तरह 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की कमान सँभालते ही अशोक जैन ने सभी राष्ट्रिय पत्रकारों और ऐसे पत्रकारों जो नेहरु-गाँधी परिवार के आलोचक थे उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

कांग्रेस और 'टाइम्स ग्रुप' में संबंधो का कर्ज चुकाने का सिलसिला आज भी थमा नहीं है. काग्रेस ने 'टाइम्स ग्रुप' को लुटयंस दिल्ली में एक मशहूर भवन आवंटित कर रखा है जिसे इंदु जैन(वर्तमान मालिक) का परिवार एक निजी बंगले के रूप में इस्तेमाल कर रहा है. यहाँ आपको ये भी जानना जरुरी है कि इंदु जैन भारत के सबसे धनि व्यक्तियों में से एक है. वे यदि कांग्रेस द्वारा आवंटित भवन लौटा देते है तो भी उन्हें उतना फरक नहीं पड़ेगा मगर वे ऐसा करेंगे नहीं क्योकि 'फ़ोकट का माल कौन जाने दे'!

द हिन्दू

भारत की आज़ादी तक देश में करीब 500 अख़बार प्रकाशित होने लगे थे. अधिकतर अख़बार, क्रन्तिकारी विचारों को दफ़नाने की बाज़ीगरी के भोग बने वहीं कुछ अख़बार आज जर्जर अवस्था में हैं वहीं कुछ आज भी उसी साख को बनाए रखने में कामयाब हुए हैं. 'द हिन्दू' उन साख बनाए रखने वाले अख़बारों में से एक है.

यह अख़बार 1878 में एक साप्ताहिक के तौर पर शुरू हुआ था और आज भारत का दूसरा सबसे बड़ा अंग्रेजी अख़बार है. 2010 तक इसका रेवन्यू $200 मिलियन के करीब था.

यह अख़बार भी ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों का विरोध करने के लिए स्थापित अख़बारों में एक था. प्रारंभ में इस अख़बार के लेख उदारवादी हुआ करते थे लेकिन अब ये लेख वामपंथी विचारधारा में लिप्त हो चुके हैं.

द नेशनल हेराल्ड

यह अख़बार इन दिनों काफी चर्चा में रहा है. इसका मुख्य कारण इस अख़बार से जुडा भ्रष्टाचार है. जवाहरलाल नेहरु की प्रेस नीतियों को देखे तो उनमे स्वतंत्रता सैनानी अखबारों को जीवित रखने या पुनर्जीवित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए. उस समयांतर निकलने वाले अधिकतर स्वतंत्रता सैनानियो के अख़बार बंद हो गए या बंद कर दिए मगर 1938 में नेहरु द्वारा शुरू किया गया 'द नेशनल हेराल्ड' आज तक जारी है. 2008 में किन्ही कारणों से इसे बंद किया गया था लेकिन 2017 में इसे रीलॉन्च किया गया.

ऐसा भी नहीं है की यह अख़बार पहले कभी बंद नहीं हुआ! 1942 के बाद जब ब्रिटिशों ने इंडिया प्रेस पर हमला किया तो उस दौरान हेराल्डर अखबार को भी बंद करना पड़ा था मगर 1945 के अंतिम महीनों में एक बार फिर से इसकी शुरुआत की गई. वर्ष 1977 में जब लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की हार हुई थी तब भी इस अखबार को दो सालों के लिए बंद कर दिया गया था. फिर यह 1 अप्रैल 2008 तक जारी रहा. इसके बाद उसका मालिकाना हक "एसोसिएटड जर्नल्स" को दे दिया गया. कुछ समय बाद "एसोसिएटड जर्नल्स" को कर्मचारियों को बेरोजगार होने से बचाने की वजह से 90 करोड़ का कर्ज दिया. इतना होते हुए भी यह अख़बार आज भी जारी है. आप समझ सकते हैं कि इसके पीछे क्या कारण है! नेहरू की जगह किसी स्वतंत्रता सैनानी ने इस अख़बार की नीवं रखी होती तो शायद आज इसका दफ्तर भी धूल खा रहा होता.

क्रांतिकारी अखबारों को जिन्दा का रखने में सरकार की उदासीनता

जहां तक भारत की आजादी के लिए क्रांतिकारी आंदोलनों का संबंध है ये आंदोलन बंदूक और बम के साथ नही समाचार पत्रों से शुरु हुए थे. सरकार चाहती तो क्रांतिकारियों के लक्ष्य को लेकर छोटे अखबारों के लिए म्यूजियम बन सकते थे, वही बड़े अखबारों को पुनः शुरू करके क्रांतिकारियों के विचारों को जगाए रखा जा सकता था मगर आजादी के बाद से ही इस मुद्दे पर भारत सरकार का रवैया उदासीन रहा. सरल शब्दों में बात कही जाए तो सरकार के पास आजादी की जंग लद्दे अखबारों के लिए कोई रोड मेप नहीं था, नाही अब है.

सरकार ने क्रांतिकारी अखबारों की जगह अंग्रेजो के अखबारों को अधिक प्राथमिकता दी जिसके परिणाम स्वरुप धोखाधड़ी का पर्याय 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' देश का सबसे बड़ा अख़बार बन गया और तिलक, लाला लाज पतराय, भगत सिंह, अरबिंदो घोष, दादाभाई नौरोजी, बिपिन चन्द्र पाल, गिरीश चन्द्र घोष, जैसे कई क्रांतिकारियों के अख़बार ठन्डे बस्ते में समेट कर रख दिए गए.

आज एक प्रश्न सीधा मन में आता है कि अंग्रेजो के अख़बार 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को उसी सरलता से वर्षो से चलाया जा सकता है तो आजादी की जंग लड़े अखबारों को क्यों नहीं?

यदि नेहरु का 'द नेशनल हेराल्ड' कई बार बंद होकर भी फिरसे शुरू हो सकता है तो आजादी की जंग लड़े क्रांतिकारियों के अख़बार क्यों नही?

इस मामले में पाकिस्तान हमसे बेहतर है

जब क्रांतिकारी अखबारों को जिन्दा रख कर क्रांतिकारियों के विचारो को जीवित रखने की बात आती है तो पाकिस्तान हमसे बेहतर नजर आता है. 1941 में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा दिल्ली से शुरू किया गया मुस्लिम लीग का मुखपत्र 'डॉन' आज भी पाकिस्तान में उतने ही सम्मान के साथ देश का सबसे बड़ा अख़बार बना हुआ है. इतना ही नहीं इससे एक कदम आगे जाते हुए 2007 में 'डॉन न्यूज़' नाम से 24 कार्यरत टीवी चैनल भी शुरू किया गया.

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