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कैलाश मानसरोवर व अक्साई चीन वापस लेने का यही सही समय: प्रो. रविन्द्र शर्मा

कैलाश मानसरोवर व अक्साई चीन वापस लेने का यही सही समय: प्रो. रविन्द्र शर्मा
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भारत-चीन के मध्य इन दिनों चरम तनाव की स्थिति है। अभी हाल ही में गलवान घाटी में चीन से हुई हिंसक मुठभेड़ में हमें अपने 20 भारतीय वीरों के अमूल्य जीवन को खोना पड़ा है। यह अलग बात है कि ये वीर गुरू गोविन्दसिंह जी की सुप्रसिद्ध सूक्ति ‘इक-इक सें में लाख लड़ाऊं’ को चरितार्थ करते हुए चीन का बड़ा नुकसान कर भारत मां के चरणों में शहीद हुए हैं।

फिर भी हम भारतीयों (खासकर 1962 के बाद जन्मे लोगों) में इस विवाद का इतिहास, भूगोल, 1962 की पराजय के कारण, देश की वर्तमान सामरिक स्थिति आदि को जानने समझने की जिज्ञासा है। इस जिज्ञासा का समाधान करने के लिए एक्शन इंडिया समाचार ने कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष व सैन्य विशेषज्ञ प्रो. रविन्द्र शर्मा से वार्ता की। हमारे संवाददाता कृष्णप्रभाकर उपाध्याय से हुए साक्षात्कार के सम्पादित अंश-

पूर्वी लद्दाख सीमा पर चीन के साथ तनाव को आप किस रूप में देखते हैं?

वास्तव में देश की आजादी के साथ ही चीन भारतीय सीमा पर निरन्तर अतिक्रमण करने लगा था। अगर हम पूर्ववर्ती इतिहास को देखें तो सन् 1905 तक जब भारत में बर्तानिया का शासन था, लार्ड कर्जन के जमाने तक तिब्बत को एक 'बफर स्टेट' माना जाता था।

अर्थात् भारत-चीन के मध्य तिब्बत अलग लगभग एक स्वशासित स्वतंत्र देश के रूप में मान्य था और चीन से हमारी सीधी सीमाएं नहीं लगती थी। 1947 के पश्चात पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व कांग्रेस की सरकारों ने कभी भी इस ओर सामरिक एवं राजनीतिक दृष्टि से ध्यान नहीं दिया। इस तरह चालाक व धोखेबाज चीन धीरे-धीरे तिब्बत पर अपना अधिकार करता चला गया।

भारतीय क्षेत्रों में 1954-60 के मध्य चीन ने सड़क का निर्माण कर कैलाश, मानसरोवर, लद्दाख के विस्तृत भू-भाग पर अधिकार कर लिया। ऐसा ही उसने उत्तरांचल-उत्तरप्रदेश-अरूणाचल प्रदेश के विशाल भूमि क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। नेहरूजी की तो यह मान्यता थी कि इस इलाके में घास का एक तिनका तक नहीं उगता।

हमें इसकी क्या जरूरत है। 1954 से 1962 तक जब चीन सीमा पर सड़कों का निर्माण कर रहा था, बड़ी-बड़ी चौकियां बना रहा था, तब भी भारत की कांग्रेस सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय के रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने तो अपने टाॅप ब्रास जनरलों की बात मानने तक से इंकार कर दिया था और कोई कदम नहीं उठाया। यहीं से इस लड़ाई के बीज पड़े।

चीन कभी आक्रामक तो कभी बचाव की मुद्रा में दिखता है, आखिर उसकी मंशा क्या है?

यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। चीन की मंशा को प्रारम्भ से देखें और पुराने चीनी नक्शों का अध्ययन करें तो पाते हैं कि उसने तुर्किस्तान के कुछ हिस्से, मंगोलिया का बहुत बड़ा क्षेत्र, रूस के कुछ हिस्से जिसके लिए उसके रूस से उसूरी नदी के तट पर युद्ध करना पड़ा।

परन्तु घातक झड़पो के बाद भी रूसी सेना ने उसे उसूरी नदी के इलाके से आगे नहीं बढ़ने दिया। घातक झड़पो के बाद भी उन देशों के अंदर हस्तक्षेप करने के चीन ने निरन्तर प्रयास जारी रखें। विशेषकर चाहे वियतनाम, जापान, मंगोलिया, हमारे पड़ोसी म्यांमार का यूनान क्षेत्र हो, चाहे लद्दाख हो, चाहे अक्षयचिह्न, कैलाश-मानसरोवर का क्षेत्र हो, उत्तराखंड का इलाका हो, आज का चीन जो दिखता है, वह अपने वास्तविक इलाके से डबल (दो गुने) से भी अधिक दूसरों के इलाकों पर अधिकार कर ही बना है।

वर्तमान समय में सीमा पर उत्पन्न किए जाने वाले विवाद की वस्तु स्थिति क्या है?

लड़ाई का एक मात्र कारण है चीन की लिप्सा। उसकी रूस से लड़ाई हुई। उसे कसूरी नदी के किनारों पर अधिकार करना चाहा था। उसकी वियतनाम से उसके खनिज सम्पदा क्षेत्रों को लेकर लड़ाई हुई। साथ ही वियतनाम के समुद्री इलाकों पर भी अधिकार करना था। उसकी जापान से उसके सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण टापुओं को लेकर आपसी सम्बन्धों में कटुता है। चीन जापान के द्वीपों पर भी अधिकार करना था।

वर्मा रोड पर तो उसकी ब्रिटिश जमाने में ही अधिकार करने की कोशिश की थी। बर्मा के यूनान क्षेत्र पर उसने अधिकार कर लिया, उससे उसका झगड़ा हुआ। मंगोलिया पर अधिकार कर लिया, तुर्कमेनिस्तान के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी के लिए उसकी बार-बार पड़ोसियों से लड़ाई होती रहती है।

हमारे साथ भी यही बात है। उसने हमारे कैलाश, मानसरोवर, लद्दाख, अरूणाचल प्रदेश पर अवैधानिक कब्जा किया हुआ है। 1954 से 1962 तक देश में कांग्रेस सरकार रही। 1962 में जब चीन का हमला हुआ तो उसे हार का सामना करना पड़ा। हमारे बहुत सारे सैनिकों को बलिदान देना पड़ा।

कांग्रेसी सरकार यह कहती रही कि हम वीरता से पीछे हटे, किन्तु हमने युद्ध किया। किन्तु हमारी वीरता का वास्तविक श्रेय तत्कालीन सरकार को नहीं, यह श्रेय तो जाता है मेजर शैतानसिंह को जिन्होंने चुशुल में अपरिमित शौर्यता, निर्भीकता, कुशल प्रशासनिक अमर बलिदान देकर भारत का सम्मान बचा लिया। अरूणाचल में यह श्रेय ब्रिगेडियर होशियार सिंह को जाता है जिन्होंने सेला दर्रा में अमर बलिदान देकर तात्कालिक नेफा को चीन के हाथों में जाने से बचा लिया।

गलवान नदी की घाटी को भी बचाने का श्रेय उस जमाने के सैनिकों को ही है जिनमें सरदार जोगेन्द्र सिंह, धन सिंह थापा जैसे हजारों भारत मां के सपूत हैं। कांग्रेसी सरकार तो तवांग-तेजपुर क्षेत्र तक को खाली करा चुकी थीं। आज के विरोधीदल के लोग कहते हैं कि बताएं क्या स्थिति है? उसके लिए वास्तव में वे ही लोग जिम्मेदार रहे हैं।

1962 का युद्ध एकतरफा थोपा गया था। इसके लिए भारत की कोई तैयारी नहीं थी। उस समय भी एक बड़ी कमी यह रही कि हमने अपनी वायुसेना का प्रयोग ही नहीं किया। एयर मार्शल बोरबोरा के अनुसार उस जमाने में चीन की वायुसेना बिल्कुल न के बराबर थी। हम आसानी से बढ़त बना सकते थे लेकिन आज की स्थिति में यह सम्भव है।

आधिकारिक रूप से हम भले न माने किंतु सच यही है कि 1962 के युद्ध में हम चीन से पराजित हुए और चीन ने हमारे एक बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया?

वास्तव में चीन ने जिन इलाकों पर अधिकार किया है, इसे हम खुलकर कब तक नहीं कहेंगे। कब तक नहीं कहेंगे कि कैलाश, मानसरोवर हमारा है। भला कैलाश से बड़ी और कौन सी चीज हो सकती है। कौन आदमी यह कह सकता है कि मक्का-मदीना हमारा है, नहीं यह मुसलमानों का है। कौन आदमी यह कह सकता है कि यरूशलम हमारा है, नहीं यह ईसाइयों का है।

कौन आदमी यह कह सकता है कि ननकाना साहिब हमारा है, नहीं यह गुरू नानक देवजी का है। यह भारत का है, यह हमारा है। इसी प्रकार कौन आदमी यह कह सकता है कि कैलाश-मानसरोवर चीन का है, नहीं वह भारत का है। यह हमारा है। अब समय आ गया है कि भारत भी यह कहे कि चीन कैलाश, मानसरोवर के इलाकों को चीन खाली करे। यह सदा सर्वदा से हमारा इलाका है।

सीमा-विवाद सुलझाने के लिए बरसों से बातचीत भी जा रही है किंतु समाधान की दिशा में इंच भर भी परिवर्तन नहीं हुआ है। आखिर क्या है इन विवादों का इतिहास ?

जहां तक आपत्तियों की बात है तो वर्तमान मोदी सरकार ने सीमा के अंदर सड़कों, हवाईअड्डों, छावनियों का जाल बिछाकर अपना इन्फरास्ट्रक्चर बहुत ही मजबूत कर लिया है। बस, यही चीन की आपत्ति है।

मैं यहां देश की मर्यादा से बंधा हुआ हूं, इसलिए बता नहीं सकता कि हमने क्या-क्या तैयारियां कर रखीं हैं। हां, इतना कह सकता हूं कि ये तैयारियां इतनी शानदार हैं कि चीन जब भी युद्ध की हिमाकत करेगा, हम उसे 'छठी का दूध' याद दिला देंगे।

मान लें कि आज यदि चीन से युद्ध छिड़ जाए तो?’

ये 1962 का भारत नहीं है। अब यदि युद्ध हो जाएगा तो चीन को बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और उसे हमारा कैलाश और मानसरोवर तक का इलाका तक खाली करना पड़ेगा। गलवान का उदहारण अभी देश ने देखा ही है।

भारत की पिछली और वर्तमान सामरिक नीति में आपको क्या बदलाव दिखता है?

नरेन्द्र मोदी की सरकार में हमने विश्व स्तर पर नये आयाम स्थापित किये हैं। आज अमेरिका हमारा दोस्त है, ऑस्ट्रेलिया हमारा दोस्त है, जापान हमारा दोस्त है। वियतनाम, रूस, इजरायल, ब्राजील, फ्रांस- मैं किसका नाम बताऊं, सारे के सारे तो हमारे दोस्त हैं। सिर्फ हमारे उन नाशुकरे, नागवार व थैंकलैस पड़ोसियों के जो चाहकर भी हमारी बढ़ती हुई ताकत व शक्तियों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।

इस समस्या का कोई स्थाई समाधान भी है क्या?

अब समाधान कैसा? अब तो ‘नाउ आर नेवर’ की बात है। अब तो बात कैलाश-मानसरोवर की होगी, अक्षय चिह्न (आक्साई चीन) की होगी। गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में साफ-साफ कह दिया है कि ‘नहीं जान देकर भी 'अक्षय चिह्न' को वापस लेकर मानेंगे।

उनका आत्मविश्वास साहस इसका स्पष्ट प्रमाण है। देश के 135 करोड़ भारतीय यह वचन देते हैं कि हम अक्षय चिह्न वापस लेकर ही मानेंगे। वह हमारा अभिन्न अंग है। वह भारत का ताज है।

भारत और चीन के मध्य सशस्त्र संघर्ष होने पर कौन-कौन से देश भारत के साथ खड़े होंगे?’

जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस, इजरायल, अमरीका, ब्राजील, रूस लगभग सारे ही देश हमारे साथ हैं। अब तो वह दिन भी दूर नहीं जब चीन को पता लग जाएगा कि आज का भारत सन् 1962 वाला नहीं है वह 'सर्वदा शक्तिशाली है' आज की तारीख में चीन को करारा प्रतिउत्तर देने में हमेशा हमेशा सक्षम हैं।

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