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ईरान चीन डील है भारत ईरान सम्बन्धों की कड़वाहट - नृपेन्द्र अभिषेक नृप

नई दिल्ली । Action India News

देशों के बीच संबंधों में उतार चढ़ाव आना सामान्य बात है। प्राचीन भारत से ही ईरान से भारत का सम्बंध अच्छा रहा है और अब ईरान की चाबहार के तीखी प्रतिक्रिया के बाद सम्बन्धो में हल्की खटास दिख रही है जो भारत के विदेश नीति के लिए चुनौती भरा दिख रहा है।

आज़ादी के बाद से अब तक, भारत की विदेश नीति ‘स्ट्रैटिजिक अटॉनमी’ की रही है अर्थात भारत किसी ख़ास देश या ग्रुप में शामिल नहीं होता था, उनके दबाव में नहीं आता था और अपने हितों के अनुसार सभी देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखने की कोशिश करत था।

मगर ऐसा लगता है कि पिछले कुछ वर्षों से भारत की यह नीति कमज़ोर पड़ी है।भारत के पड़ोसी देशों में भी यह धारणा बनी है कि भारत कहीं न कहीं अमरीकी प्रभाव में है। गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों से इतर भारत का झुकाव अमेरिका के तरफ ज्यादा हुआ है और इसका प्रभाव एन्टी अमेरिकी देशों के साथ सम्बन्धो पर पड़ रहे बुरे प्रभाव से दिख रहा है।

2016 में ईरान और चीन में एक महात्वाकांक्षी डील हुई थी , जिसने पूरी दुनियां को झकझोर कर रख दिया है। अब इसे अम्लीय जामा पहनाने की ओर दोनो देशों ने कदम बढ़ाया है। 25 वर्षो के लिए हुए इस डील के अम्लीय रूप देने की शुरुआत के बाद ही ईरान ने चाबहार रेल प्रोजेक्ट से भारत को अलग कर दिया है ।

उसने इसकी वजह भारत की ओर से फंड मिलने में देरी को बताया है । ईरान और भारत के बीच चार साल पहले चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर ज़ाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर समझौता हुआ था ।

चाबहार से जाहेदान तक की महत्वपूर्ण रेल परियोजना भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है और इससे बाहर होना भारत के लिए बड़ा झटका है। दरअसल, अमेरिका से भारत की नजदीकी और ईरान से तेल न खरीदने के दबाव का फायदा चीन ने उठाने की कोशिश की है। चीन और ईरान की जुगलबंदी भारत के लिए ही नही पूरी दुनियां के लिए परेशानी की वजह जरूर हो सकती है।

भारत की परेशानी की कई वजहें हैं। एक तो इस फैसले से अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों तक कारोबार करने की भारत की रणनीति को गहरा धक्का लगा है। दूसरा, ईरान ने संकेत दिए हैं कि समूचे चाबहार सेक्टर में चीन की कंपनियों को बड़ी भागीदारी दी जा सकती है, जबकि चाबहार प्रोजेक्ट को भारत में चीन पाकिस्तान के सीपीईसी प्रोजेक्ट का जवाब माना जाता है।

दोनों देश ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे.डील को अभी ईरान की संसद मजलिस से मंज़ूरी नहीं मिली है और न ही इसे सार्वजनिक किया गया है। समझौते में दो प्राचीन एशियाई संस्कृतियां, व्यापार, राजनीति, संस्कृति और सुरक्षा के क्षेत्र में समान विचारों वाले दो सहयोगी, कई साझा द्विपक्षीय और बहुपक्षीय हितों वाले देश, चीन और ईरान एक दूसरे को अपना रणनीतिक सहयोगी मानेंगे।

हालांकि ईरान की जनता इस डील की ख़बरों से ख़ुश नज़र नहीं आ रही है। सोशल मीडिया पर लोग इस समझौते के ‘चीनी उपनिवेशवाद’ की शुरुआत बता रहे हैं। डील की प्रमुख बातें - चीन ईरान के तेल और गैस उद्योग में 280 अरब डॉलर का निवेश करेगा। चीनी ईरान में उत्पादन और परिवहन के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी 120 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा।

ईरान चीन को अगले 25 वर्षों तक नियमित रूप से बेहद सस्ते दरों पर कच्चा तेल और गैस का निर्यात करेगा। चीन 5जी तकनीक के लिए इंफ़्रास्ट्रक्चर विकसित करने में ईरान की मदद करेगा। बैंकिंग, टेलिकम्युनिकेशन, बंदरगाह, रेलवो और दर्जनों अन्य ईरानी परियोजनाओं में चीन बड़े पैमाने पर अपनी भागीदारी बढ़ाएगा।

दोनों देश आपसी सहयोग से साझा सैन्य अभ्यास और शोध करेंगे। दुनिया के लिए एक और बड़ी समस्या उनकी दिल से है। चीन और ईरान मिलकर हथियारों का निर्माण करेंगे और एक-दूसरे से ख़ुफ़िया जानकारियां भी साझा करेंगे।

ईरान चीन की झोली में तब से जाने लगा था जब अमेरिकी प्रतिबंध के बाद भारत ने ईरान के मामलों में हस्तक्षेप करना छोड़ दिया था। अमरीकी पाबंदियों की वजह से ईरान में विदेशी निवेश लगभग ठप पड़ा है।

ऐसे में चीन की वजह से ईरान में विदेशी निवेश, तकनीक और विकास को गति मिलेगी। दूसरी तरफ़, कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातक देश चीन को ईरान से बेहद सस्ती दरों पर तेल और गैस मिलेंगे। इसके अलावा, रक्षा मामलों में चीन की स्थिति काफ़ी मज़बूत है।

इसलिए, चाहे रक्षा उत्पादों के ज़रिए हो या सामरिक क्षमता के ज़रिए, चीन दोनों तरह से ईरान की मदद कर सकता है।दूसरी तरफ़, चीन के लिए ईरान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये उसकी वन बेल्ट, वन रोड परियोजना को कामयाब बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

पहले से ही भारत चीन के रिश्तों में आग लगी है और उसमें घी का काम चाबहार प्रोजेक्ट कर दिया। भारत चीनी निवेश ईरान में जाने का नुक़सान भी भारत को होगा। भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित करना चाहता था और इसे चीन के पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट का जवाब माना जा रहा था। चाबहार भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

ऐसे में चीन की मौजूदगी, भारतीय निवेश के लिए मुश्किलें पैदा करेंगी। अमरीकी प्रतिबंधों के कारण भारत, ईरान से तेल आयात करना लगभग बंद कर चुका है जबकि कुछ साल पहले तक यह भारत के लिए तेल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता हुआ करता था।

तात्कालिक रूप से भारत के संबंध तेहरान के अलावा सऊदी प्रायद्वीप से भी समान रूप से उपयोगी हैं। संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी और एक प्रमुख निवेशक भी है। अब भारत को ईरान से अनबन के बाद जरूरत है कि अन्य गल्फ देशों से संबंध बेहतर रखे।

कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब से सम्बन्धो में तल्खी आई थी। उसे पाटने की जरूरत है। सरकार को सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात से संप्रभु धन कोष और रेमिटेंस प्राप्त होता है जिसका उपयोग भारत में बुनियादी ढाँचा निर्माण में किया जाता है।

दोनों देश भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को निवेश के लिये एक प्रमुख गंतव्य के रूप में देखते हैं। हालांकि ईरान के महत्व को समझते हुए भारत को उससे वार्ता करते रहना चाहिए। एकतरफ़ा अमेरिका के लिए अन्य देशों से लगातार खट्टे हो रहे सम्बन्धो में मिठास लानी होगी।

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