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प्रवासियों की जुबानी : "भूखे मरने से अच्छा है काम कर अपने परिवार को जिंदा रखें"

प्रवासियों की जुबानी : भूखे मरने से अच्छा है काम कर अपने परिवार को जिंदा रखें
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  • परदेश से लौटे मजदूर मनरेगा मे जुट कर रहे कडी मेहनत

  • महिला मजदूर भी पुरूषो की तरह चला रही फावडा

जौनपुर । एएनएन (Action News Network)

रोजी रोटी व परिवार का पेट पालने के लिए बाहर कमाने गये मजदूरों को कोरोना महामारी ने कमाने खाने भी नहीं दिया। मजबूर हो वह फिर गांव लौट रहे हैं। गरीब मजदूरों का अब मनरेगा ही एक सहारा दिख रहा है। महामारी से निबटने के लिए शासन-प्रशासन व सामाजिक संगठन दिन रात सहायता के लिए खड़े हैं, फिर भी गरीब मजदूर परेशान है। परदेश से आए एकांतवास समय काटते हुए मजदूर अब गांव में ही काम की तलाश में लग गये हैं। ऐसे में उनका मुख्य सहारा मनरेगा बना है। अब मनरेगा में भी परदेशी महिला पुरूष दोनों हाथ में फावड़ा, तसला लेकर कड़ी धूप में मजदूरी कर रहे हैं।

क्षेत्र के गद्दोपुर ग्राम प्रधान शिवकुमार गौतम बताते हैं कि वे अपनी ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत करीब एक महीने से निरंतर सैकड़ों मजदूरों को कार्य दे रखा है। मनरेगा के तहत प्रतिदिन 203 रूपये की दर से प्रति मजदूर दिहाड़ी पर लिखिया नाले की सफाई करा रहे हैं। कभी ईंट खरंजा तो कभी खेत मेड़बंदी समतलीकरण में कार्य दे मजदूरों की रोजीरोटी चला रहे हैं। गद्दोपुर गांव में परदेश से गांव वापस लौटे दर्जनों महिला पुरूष किसी मायने में देहाती मजदूरों से पीछे नहीं दिख रहे हैं। जहां महिलाएं मनरेगा में सिर पर भरा तसला ढो रही हैं, तो वहीं बारी-बारी से पुरूषों की बराबरी में परदेशी महिलाएं अपने कोमल हाथों में फावड़ा सम्भाल रखी है।

महाराष्ट्र, मुम्बई, गुजरात, सूरत, दिल्ली, राजस्थान, अहमदाबाद से एक डेढ़ माह पहले गांव वापस लौटे मजदूर मनरेगा में कार्य मे जुटे मजदूर ओमप्रकाश, सूरज ईदरीश संदीप, संतोष कुमार गुज्डू बबलू गौतम, इनरावती, कमलादेवी, सूरसती, अजयकुमार विनोद राजेश का मानना है कि शहर (परदेश) से बढ़िया कमाई व सुख शान्ति गांव में है। जहां प्रेम से रहकर मजदूरी कर निर्धन असहाय गरीब भी परदेश जैसी अच्छी आमदनी कर परिवार का जीवनयापन कर सकता है।

इसी प्रकार राजमन, सुरेश, कमलेश,आदि मजदूरों का कहना है कि अब हम लोग परदेस नहीं, अपने देश में ही थोड़ा कमाएंगे, लेकिन यहीं रहेंगे। इस महामारी में जिस तरह से हम लोग की दुर्दशा हुई है। ऐसा कभी सोचा नहीं था, गांव में आके अपनों के बीच पाकर जो खुशी महसूस हो रही है, वह परदेश में नहीं थी। आज हम लोग मनरेगा के तहत अपने गांव में मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं, हालांकि तालाबंदी के दौरान सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए काम करना कठिन हो रहा है, लेकिन भूखों मरने से अच्छा है काम कर अपने परिवार कि जिंदा रखा जाए।

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