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कामाख्या मंदिर के बंद होने से फूल बेचने वाली असहाय महिला की बढ़ी परेशानी

कामाख्या मंदिर के बंद होने से फूल बेचने वाली असहाय महिला की बढ़ी परेशानी
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गुवाहाटी । एएनएन (Action News Network)

आठ साल की उम्र में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को फूल की माला पहनाने वाली विमला आठपुरिया इन दिनों दाने-दाने के लिए मोहताज है। कामाख्या मंदिर प्रांगण में फूल बेचकर अपना भरण-पोषण करने वाली महिला विमला ने बताया है कि जब वह 08 साल की थी तब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कामाख्या दर्शन करने के लिए पहुंचे थी। उस दौरान उसने गेंदे के फूल से बनी माला को इंदिरा गांधी को पहनाया था।

कामाख्या धाम में फूल व माला बेचकर अपना भरण-पोषण करने वाली विमला की आर्थिक स्थिति लॉकडाउन और श्रद्धालुओं के लिए कामाख्या मंदिर के बंद होने के चलते वर्तमान समय में बेहद खराब हो गई है।

एक्शन इंडिया समाचार के साथ सूनसान पड़े कामाख्या धाम परिसर में बातचीत के दौरान विमला ने बताया कि उसके पिता कामाख्या मंदिर में पूजा-अर्चना का काम किया करते थे। महज 07 साल की उम्र से वह कामाख्या मंदिर में फूल बेचना शुरू किया था।

शादी के बाद कामख्या मंदिर परिसर में फूल बेचना बंद कर दिया था। पिता के देहांत के बाद विमला ने विवाह किया था। विमला ने बताया कि उसके दो बेटे और एक छोटी बेटी है। घर-परिवार सब ठीक-ठाक चल रहा था। इसी दौरान डायरिया की वजह से पति की मौत हो गई।

इसी बीच विमला काफी बीमार पड़ गई। जब डॉक्टर के पास गई तो उसे पता चला कि उसे टीवी है। जिसकी वजह से अपनी डेढ़ वर्ष की बच्ची को मिर्जा के एक व्यक्ति को सौंपते हुए यह कहा कि अगर मैं मर जाऊं तो मेरी बच्ची को परवरिस अच्छी तरह से करना। उसके बाद से मेरी बच्ची कहा है मुझे कुछ पता नही है।

उसने में बताया कि मेरे दोनों बेटे मेरी देखभाल नहीं करते हैं। पति की मौत के बाद मैं लगभग 15 वर्ष से अपना भरण-पोषण के लिए कामख्या मंदिर परिसर में फूल बेच रही हूं। लॉकडाउन वजह से जब मंदिर बंद हो गया तब से लेकर आज तक मैं दाने- दाने के लिए मोहताज हो गई हूं।

लॉकडाउन से पहले लगभग 50 से 100 रुपये के फूल का माला बेच लिया करती थी। लॉकडाउन के बाद अनलॉक-1 में मैं प्रतिदिन कामाख्या के माली बागान से सुबह 06 बजे फुल की माला लेकर मंदिर आती हूं।

मंदिर बंद होने की वजह से दस-बीस रुपये का फूल का माला पुजारियों को बेचकर दोपहर बारह बजे घर चली जाती हूं। दो वक्त की रोटी का भी जुगाड़ नहीं कमा पाने की वजह से खाने पीने में मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लॉकडाउन के दौरान सरकार की ओर से दो बार चावल मिला था। इन दिनों मांग कर अपना पेट भर रही हूं।

मैं हर रोज मंदिर प्रांगण में इस उम्मीद से आती हूं कि मंदिर खुलेगा और लोग मुझसे फूल खरीदेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। मैं उम्मीद करती हूं कि सब कुछ जल्द ठीक होगा और मंदिर फिर से खुलेगा।

विमला ने बताया कि अंबुबासी मेला के दौरान काफी मात्रा में फूल की माला बेच ले लिया करती थी। मेले के दौरान हर रोज लगभग पांच सौ रूपये का माला बेच लेती थी। इस बार मेला नहीं लगा है जिसकी वजह से मैं काफी दुखी हूं।

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