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काफल की कमाई पर लॉक डाउन ने लगाया ब्रेक

काफल की कमाई पर लॉक डाउन ने लगाया ब्रेक
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गोपेश्वर । एएनएन (Action News Network)

लाॅक डाउन के कारण इस बार औषधीय गुणों वाला काफल पहाड़ के बाजारों से गायब है। इससे काफल के शौकीन और विपणन करने वाले काश्तकार मायूस हैं। काफल पहाड़ के अन्य जिलों की तरह चमोली जिले में पर्याप्त मात्रा में होता है। इस साल यह औषधीय फल जंगलों में ही बेकार हो रहा है।स्थानीय निवासी अर्जुन सिंह, तेजपाल और सतेश्वरी का कहना है कि बीते वर्षों तक काफल का विपणन कर वे प्रतिदिन सात- आठ सौ रुपये तक की आय अर्जित कर लेते थे।

इस वर्ष शीतकाल में भारी बर्फबारी के चलते अच्छी मात्रा में काफल का उत्पादन हुआ है। लॉकडाउन के चलते काफल का दोहन और विपणन नहीं हो पा रहा है। काफल उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में समुद्र तल से एक हजार से दो हजार मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। इसका वानस्पतिक नाम माइरिया स्कूलेंटा है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में किया जाता रहा है। डायरिया, अल्सर, नाक, कान और गले से संबंधित रोगों के उपचार में काफल को उपयोगी माना जाता है। काफल को पाचन शक्तिवर्द्धक भी बताया जाता है। वनस्पति विज्ञानियों के अनुसार काफल के फल के साथ ही पत्ती, तना, छाल और जड़ें भी औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।

श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय कैंपस गोपेश्वर के वनस्पति विज्ञानी डॉ. विनय नौटियाल का कहना है कि काफल का आयुर्वेद में सर्वाधिक उपयोग एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में किया जाता है। वैज्ञानिकों ने काफल से 50 से अधिक विभिन्न दवाइयों में उपयोग आने वाले कैमिकलों की खोज की है। इसके पौधे की प्रवृत्ति के चलते इसका अनियंत्रित दोहन भविष्य के लिए खतरनाक है। वन विभाग को इसके संरक्षण के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए।

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