Top
Action India

....जिद पूरी कर पाते तो शायद बच्चे जिंदा होते

....जिद पूरी कर पाते तो शायद बच्चे जिंदा होते
X

नई दिल्ली । Action India News

उत्तर पश्चिमी जिले के मॉडल टॉउन इलाके में सोमवार रात हुए हिट एंड रन मामले में मृतक बच्चों के माता-पिता और दादा-दादी का कहना है कि जब तक वह नहीं मरते हैं तब तक उनको यहीं चीज याद आएगी कि काश अगर बच्चों की जिद को वह पूरा नहीं कर पाते तो उस समय उनके बच्चे उनके सामने होते हैं।

यह काश शब्द ही उनको अब जीने नहीं देगा। उनके परिवार की खुशियां देखते ही देखते खत्म हो गईं। अब उनके घर में कोई जिद करने वाला एक ही बच्चा बचा है। भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उसको भगवान पूरी तरह से ठीक कर दे। नहीं तो उनकी जिंदगी पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।

बच्चों के पिता जसपाल का कहना है कि तीनों बच्चों इश्किा, भूमि और उनके छोटे भाई गौरव की जिद के आगे मजबूर था। कोरोना की वजह से वैसे ही बच्चों को वह बाहर नहीं निकाल रहे थे। जब सोमवार को जिद की तो उसने भी कहा कि चलो बच्चे और परिवार वाले अपनी कार से घूम भी आएंगे और दवाई भी ले आऊंगा। लेकिन पता नहीं था कि जिन बच्चों को वह साथ ले जा रहा है वह उसकी सबसे बड़ी गलती है। उसने अपने बच्चों को खून से लथपथ और तड़पती हालत में अपनी गोद में देखा था। उसके लिए सबसे भयंकर समय वो समय था, जब आसपास सडक़ पर खून पड़ा था और उसने बच्चों को गोद में लिया हुआ था।

वो आखिरी बार पकड़वाई थी बच्चों की उंगली-परिवार

परिवार के सदस्यों ने बताया कि कोरोना काल में वह बच्चों को ही नहीं वह भी बाहर की चीज को खाने से मना कर देते थे। जब जसपाल सीएनजी भरवा रहा था। आईस्क्रीम दिलवाने से मना भी किया था, लेकिन उनके दोस्त मिलाप ने कहा था कि बच्चे हैं मैं खिलाकर लाता हूँ। मिलाप को भी नहीं पता था कि जिनको वो उंगली पकडक़र ध्यान से सडक़ पार करवाने की कोशिश कर रहा है। वो उंगली अब हमेशा हमेशा के लिए छूटने वाली है। पहली सड़क उसने ध्यान से तीनों बच्चों को पार करवा दी थी। जब वह दूसरी सड़क पार करवा रहा था तभी नीले रंग की कार ने सभी को अपनी चपेट ले लिया। मिलाप को अस्पताल में दोनों बच्चों की मौत की खबर मिली। मिलाप की हालत तभी से ज्यादा खराब है। वो भी सोच रहा है कि काश वो बच्चों को सड़क पार नहीं करवाता।

टक्कर लगने से काफी ऊंचाई तक उछली थी दोनों बहनें-मंजू

मॉडल टॉउन झुग्गी बस्ती में रहने वाली मंजू हादसे की चश्मदीद है। उसने बताया कि वह सड़क किनारे ही खड़ी थी। तभी नीले रंग की कार आई। जिसमें सिर्फ चालक ही था। उसकी दाढ़ी भी थी। चारों को उसने टक्कर मारी। दोनों बच्चियां काफी ऊपर तक उछलकर सड़क पर गिरी। गुरुद्वारे में आए श्रद्धालुओं ने मौके पर पहुंचकर सभी घायलों को सडक किनारे किया और सडक पार से उनके परिवार वालों ने मौके पर पहुंचकर अपनी कार से और एक सरदार जी ने अपनी कार से घायलों को नजदीक के अस्पताल में भर्ती करवाया। बच्चों के बाकी परिवार वालों को गुरुद्वारे के लोगों ने वहीं पर बैठाकर उनको सब ठीक होने का भरोसा दिलवाया। कुछ लोगों ने शोर मचाकर कार का पीछा करने की कोशिश भी की थी।

सितंबर में मनाया था दोनों बहनों का एक साथ बर्थ डे-फुफा

मंगोलपुरी इलाके में रहने वाले बच्चों के फुफा रवि ने बताया कि सिंतबर में कुछ दिन आगे पीछे इश्किा और भूमि का जन्मदिन होता था। कोरोना की वजह से दोनों का जन्मदिन एक साथ ही मनाने की सोची थी। 23 सितंबर को वह अपने परिवार के साथ बुराड़ी बच्चों के घर गया था। यहां पर परिवार वालों ने दोनों का जन्मदिन मनाया था।

सोमवार को भी वह घर पर मिलने के लिए गया था। बच्चों के पिता जसपाल के पेट में तकलीफ रहने लगी है। जिसका उपचार भी चल रहा है। उसने नहीं सोचा था कि जिन बच्चों से वह अभी मिल रहा है। कुछ देर बाद वह हमेशा हमेशा के लिए सबको छोडक़र चले जाएंगे। उनका कहना है कि चालक को पकडक़र पुलिस उसे फांसी की सजा दिलवाए। उसने परिवार और बच्चों की ख्वाहिशों को मार दिया है। जो जिंदा है,उनको जीते जी मरने के लिए छोड़ दिया है। आरोपी को पुलिस जल्द से जल्द पकड़े।

इश्किा में कुछ करने की इच्छा शक्ति थी-परिवार

परिवार वालों ने बताया कि तीनों बच्चे प्राईवेट स्कूल से पढ़ाई कर रहे हैं। जिस तरह से इश्किा अभी छोटी ही कक्षा की पढ़ाई कर रही थी, लेकिन उसका दिमाग काफी तेज चलता था। उसमें बड़ा होकर कुछ बनने की इच्छा थी। वह कई बार ऐसी बातें करती थी। जिसको सुनकर परिवार वाले भी एक बार सोच में पड़ जाते थे कि इतनी छोटी उम्र में कैसे बच्चे इतनी बड़ी बात को बोल व सोच सकते हैं। उनका पिता जसपाल अपनी बेटियों व बेटे के लिए दिन-रात मेहनत करके उनको कुछ बनाने के सपने देखा करता था। जसपाल के पास अपनी कार है। जिसको आजकल वह किसी कॉल सेंटर में लगाने की कोशिश कर रहा था।

बच्चों को बचाने की कोशिश थी मौके पर

कुछ चश्मदीदों ने बताया कि जब हादसा हुआ वहां पर पचास से ज्यादा लोग मौजूद थे। हादसे के बाद कुछ तो कार को पकडऩे के लिए भागे थे। तो कुछ ने खून से लथपथ हालत में पड़े बच्चों को अपना बच्चा मानकर अपने रुमाल आदी से उनका खून रोकने की कोशिश की थी। कोई पानी ला रहा था तो कोई कपड़ा ला रहा था। सहायता करने वाले ने उस वक्त यह नहीं देखा कि बच्चे अपने हैं या फिर किसी ओर के। सभी को सिर्फ उस वक्त बच्चों को बचाने की कोशिश थी। एक सरदार जी अपनी कार में घायल बच्चों और परिवार वालों को बैठाकर अस्पताल ले गए थे।

Next Story
Share it