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भारतीय कारीगरी का अद्भुत नमूना मोठपूर का तालाब व बावड़ी

भारतीय कारीगरी का अद्भुत नमूना मोठपूर का तालाब व बावड़ी
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बांरा । एएनएन (Action News Network)

जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व मे स्थित प्राचीन गांव मोठपूर है। यहां एक प्राचीन तालाब है, जिसे शक्तिसागर के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण संवत 1557 में धारू खींची ने शूरू किया और उसके पुत्र शक्तु ने इसे पूरा किया। इसके पास ही एक अति प्राचीन बावड़ी है, जिसमें एक कीर्ति स्तंभ है। उसमें लिखा हुआ है कि इस बावड़ी को धीरादेव इसका बेटा शक्तू देव उसका भाई कुभ्भादेव उसका बेटा श्री वर्मादेव एवं राणी उमादेवी (जो राणा सांगा की पुत्री थी) ने शाके 1422 अगहन सुदी पंचमी सोमवार को बनाई। सन (1506) मोठपुर खींचियों का प्राचीन नगर रहा है।

किसी जमाने मे यह वैभवशाली नगर था जो खींची रियासत का हिस्सा रहा है। धन्यधान्य से परिपूर्ण था। बावड़ी के साथ ही क्षार बाग भी है, जिसमें अनेक खींची राजाओ के स्मारक बने हैं। बावड़ी शिल्पकला का अनुपम नमूना है, इसमें बहुत सारे देवी देवताओं की मूर्तियां है बावड़ी में कईं मंजिलें है। अंदर झरोखे एवं बालकनी जैसी इमारतें बनी है। बावड़ी के अंदर पहुंचने की लिए प्रवेशद्वार जिसका रास्ता सीढ़ीयों से जाता है। बावड़ी कई ज्यामितीय आकृतियों में बनी है लेकिन अचरज की बात यह है की नीचे ही नीचे जाकर बाउडी चौकोर की जगह गोलाकार हो जाती है।

इसमें सैंकड़ों साल पहले भी स्वच्छ निर्मल जल भरा रहता था। वर्तमान में भी इसमें जल रहता है। यह भारतीय कारीगरी का बेजोड़ नमुना है। यह उस प्राचीन शिल्प विज्ञान पर आधारित है, जिसमे हमारे प्राचीन जल स्रोत बनाये जाते थे। पुरातत्व धरोहरों की दृष्टी से ऐसे अनेक अनमोल खजाने बांरा जिले मे बिखरे पड़े हैं। जब कोई पर्यटक इन देखता है तो उसके अनायास ही वाह शब्द निकल पडता है। लेकिन अफसोस बांरा मे इस तरह की अनमोल धरोहरों के संरक्षण के लिए कोई खास प्रयास नहीं किये जाते है।

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