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दुर्गा के रूप में ममता की मूर्ति बनाने वाले कलाकार ने कहा : नहीं चाहता था ऐसा करना

दुर्गा के रूप में ममता की मूर्ति बनाने वाले कलाकार ने कहा : नहीं चाहता था ऐसा करना
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कोलकाता। एक्शन इंडिया न्यूज़

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा राज्य की वैश्विक पहचान रही है जो मूल रूप से सैकड़ों सालों से शक्ति की आराधना के लिए विख्यात है। तकनीक का हाथ पकड़कर तेजी से विकसित होती दुनिया के साथ राजधानी कोलकाता समेत पूरे राज्य में थीम आधारित पूजा पर बल दिया जा रहा है जिसके अंतर्गत पंडालों से लेकर मूर्तियों तक को एक खास संदेश समेटे हुए स्थापित किया जाता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब सामाजिक संदेश के नाम पर धार्मिक परंपराओं की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और धार्मिक आस्था को आघात पहुंचाया जाता है । इस बार दुर्गा पूजा के मौके पर कोलकाता में कई पूजा पंडालों में राजनीति की छाप स्पष्ट नजर आ रही है।

कोलकाता के बागुईआटी स्थित एक पंडाल में देवी दुर्गा की जगह तृणमूल सुप्रीमों ममता बनर्जी की मूर्ति लगाई गई है । उत्तर 24 परगना के नजरुल पार्क उन्नयन समिति द्वारा आयोजित इस पूजा में ममता की मूर्ति के दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र की जगह राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की तस्वीरे लगाई गई हैं। इसे लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं समेत कई विद्वानों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे हिंदू आस्था का अपमान बताया है। यह प्रतिमा बनाई है कोलकाता के मशहूर मूर्तिकार मिंटू पाल ने। उनसे जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने खुलासा किया कि वह व्यक्तिगत तौर पर मानते हैं कि इस तरह की मूर्तियां नहीं बनाई जानी चाहिए, लेकिन आयोजकों के कहने पर बनाना पड़ा है।

दरअसल इस बार विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की जीत के बाद कई पूजा आयोजक केंद्र विरोधी अथवा ममता के पक्ष में पंडाल और मूर्ति बना कर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता का संदेश देने की कोशिश करते नजर आये हैं। दुर्गा के रूप में ममता बनर्जी की मूर्ति स्थापित करना राजनीतिक प्रतिबद्धता जाहिर करने का तरीका माना जा रहा है।

इस बारे में मूर्तिकार मिंटू पाल से "हिन्दुस्थान समाचार" ने राजनीति और दुर्गा पूजा के घालमेल की प्रासंगिकता को लेकर सवाल किया तो उनका कहना था कि वह व्यक्तिगत तौर पर मानते हैं कि ऐसा होना नहीं चाहिए। देवी दुर्गा की जगह है ममता बनर्जी की प्रतिमा बनाने के औचित्या के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आयोजक संस्था राज्य के विकास को दिखाना चाहते थे। उन्होंने ही देवी की जगह ममता की मूर्ति बनाने को कहा था इसलिए बनानी पड़ी। हालांकि जब उनसे पूछा गया कि अगर राज्य के विकास को दिखाना है तो कई दूसरे जरिए हो सकते हैं। देवी दुर्गा की जगह ममता की मूर्ति क्यों बनाई? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि लंबे समय से ऐसा होता रहा है कि राजनीतिक पार्टी से जुड़े नेता जो इन पूजा पंडालों में प्रमुख होते हैं, धार्मिक आयोजन के जरिए बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार और जन सरोकार हासिल करना चाहते हैं। यह भी उसी का एक हिस्सा है।

हालांकि उनसे यह भी पूछा गया कि एक समय में इंदिरा गांधी न केवल भारत बल्कि विश्व की सबसे साहसी महिला के तौर पर परिचित रही हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं जैसे सोमेन मित्र, अजीत पांजा ने राज्य में लंबे वक्त तक पूजा आयोजन किया लेकिन कभी भी इस तरह की मूर्ति स्थापित नहीं हुई।

इसके जवाब में मिंटू पाल ने कहा कि इसी बंगाल की भूमि से कलाकारों ने इंदिरा को विश्व जननी के तौर पर बताते हुए गीत गाया है। इस पर हिन्दुस्थान समाचार की ओर से पूछा गया कि गीत और धर्म एक नहीं होता। आप राजनेताओं के माथे पर दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते।

इसके जवाब में मिंटू पाल ने कहा, "आप ठीक कह रहे हैं ऐसा होना नहीं चाहिए। लेकिन जिस क्लब ने मां दुर्गा को ममता के तौर पर स्थापित किया है उन्होंने मूर्ति के पैर में ममता की तरह हवाई चप्पल बनाने को कहा था लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया है।"

कुल मिलाकर कहें तो देवी के तौर पर दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने वाले मिंटू पाल व्यक्तिगत तौर पर मानते हैं कि ऐसा होना नहीं चाहिए। इसके अलावा दमदम पार्क के भारत चक्र पूजा आयोजक द्वारा पंडाल को जूते चप्पलों से सजाया जाने पर मिंटू पाल ने कहा कि ऐसा भी नहीं होना चाहिए था।

इस बारे में भारतीय जनता पार्टी की राज्य कमेटी के सदस्य तथा फिल्म निर्देशक संघमित्रा चौधरी ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि बंगाली भाषी समुदाय खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने और दिखाने में गर्व महसूस करता है लेकिन इसकी आड़ में अल्पसंख्यक समुदाय का तुष्टिकरण और हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाना ही मुख्य मकसद है। ऐसा 34 सालों के वाममोर्चा के शासन और वर्तमान में 11 सालों के तृणमूल के शासन के प्रभाव की वजह से होता रहा है। उन्होंने कहा कि दुर्गा पूजा को मां की आराधना के तौर पर सीमित रखा जाना चाहिए। थीम आधारित पूजा का नाटक बंद करने की जरूरत है और इसके लिए सबसे कारगर उपाय है कि केवल उन दुर्गापूजा पंडालों को पुरस्कृत किया जाए जो पारंपरिक पूजा करते हैं।

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