Top
Action India

अनूपपुर: बकरीद का त्यौहार मनाया गया, नमाज अदा कर दी बधाई

अनूपपुर: बकरीद का त्यौहार मनाया गया, नमाज अदा कर दी बधाई
X

अनूपपुर। एक्शन इंडिया न्यूज़

बुधवार को ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्यौहार मुस्लिम धर्म के लोगों ने बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाया।


इस खास त्यौहार का इस्लाम में बड़ा ही महत्व है। बुधवार सुबह 9 बजे जिलेभर के विभिन्न मस्जिदों और ईदगाहों में 6-6 सदस्यों ने सिर झुकाकर सजदा किया और विश्व कल्याण की मन्नत मांगी। अन्य वर्षो की भांति इस वर्ष कोरोना संक्रमण और शासन के आदेश के पालनार्थ मुस्लिम समुदायों ने नवाज अदा करने ईदगाहों के ओर रूख नहीं किया, बल्कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सभी लोगों ने अपने अपने घरों में नमाज अदा की।

इस्लाम में बकरीद की खास मान्यता है।

इस दिन लोग पैगंबर हजरत इब्राहिम की कुर्बानी को याद करते हैं जो सच्चाई के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हो गए थे। कहते हैं खुदा के कहने पर वे अपने बेटे की कुर्बानी देने जा रहे थे लेकिन उनकी वफादारी और सच्चाई देख कर खुदा ने उन्हें रोक दिया था जिसके बाद उन्होंने एक बकरे की कुर्बानी दी थी।

  • कुर्बानी का महत्व

इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग बकरीद के दिन सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर नए कपड़े पहन कर ईदगाह में ईद की नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद एक दूसरे से गले मिलकर ईद की मुबारकबाद देते हैं। और इसके बाद जानवरों की कुर्बानी का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुर्बानी जिसे तीन हिस्सों में बांटा जाता है। सबसे पहला हिस्सा गरीबों को दान करने के लिए निकालते हैं। उसके बाद का हिस्सा रिश्तेदारों के लिए होता है, तीसरा और आखिरी हिस्सा परिवार वालों के लिए होता है। इस दिन गरीबों को पेट भर कर खाना खिलाया जाता है जिसे इस्लाम में खुदा की इबादत माना जाता है।

  • मीठी ईद के 70 दिन बाद आती है बकरीद

12 जुलाई से इस्लामिक कैलंडर का अंतिम माह शुरू होने जा रहा है। जिले में ईद उल जुहा पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। ईद उल जुहा के दौरान मुसलमान ईदगाह और मस्जिद में नमाज अदा की। मीठी ईद यानी ईद-उल-फितर के 70 दिन बाद बकरीद यानी ईद-उल-अल्हा का त्योहार मनाया जाता है।

  • बकरा ईद का महत्व

ईद-उल-फितर के लगभग 70 दिन बाद ईद-उल-अजहा यानी बकरा ईद का आगमन होता है। इस्लाम धर्म में बकरीद लोगों को सच्चाई की राह में अपना सब कुछ कुर्बान कर देने का संदेश देती है। इस त्योहार को मनाने का कारण हजरत इब्राहिम की कुर्बानी है, जिन्हे याद करते हुए इस पर्व को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुकुम पर अपनी वफादारी दिखाने के लिए अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे। जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए आगे बढ़े तो अल्लाह ने उनकी निष्ठा को देखते हुए इस्माइल की जगह दुंबे को रख दिया जिससे कुर्बानी इस्माइल की नहीं बल्कि दुंबे की हुई। तब से ही यह प्रथा चालू हो गई और इस दौरान कुर्बानी के रूप में बकरा या फिर दुंबे की कुर्बानी दी जाने लगी।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि जिलेभर में 14 मस्जिद और 9 ईदगाह जहां नमाज अदा की जाती रही है। लेकिन इस बार मस्जिदों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए नमाज अदाएगी की गई है। मस्जिदों की सुरक्षा और भीड़ एकत्रित न हो के एतिहातन तौर पर सुरक्षा बल तैनात किए गए थे। सभी जगह शांतिपूर्वक नमाज अदाएगी के साथ पर्व मनाया गया है। राजेन्द्रग्राम में भी ईद के मौके पर स्थानीय मुस्लिम धर्मावलंबियों ने जुहिला नदी के किनारे बने मस्जिद में खुशियों के साथ नमाज अदा की तथा अल्लाह के सजदे में अपना सिर एक साथ झुकाया। वही पांच सदस्यों के अलावा अन्य लोगों ने घर पर ही नमाज अदा की। जबकि भालूमाड़ा में ईद उल फित्र का पर्व सदभावनापूर्ण व सौहार्द्र के साथ मनाया गया।

Next Story
Share it