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कोरोना संकट में किसानों का सहारा बनेगी प्राकृतिक खेती

शिमला । एएनएन (Action News Network)

वैश्विक महामारी कोरोना ने स्वास्थ्य के अलावा लगभग सभी अन्य क्षेत्रों में भी कई नए संकट पैदा कर दिए हैं। कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रह पाया है। किसानों और बागवानों के समक्ष इस समय कुछ चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, लेकिन इन चुनौतियों के बीच किसानों को प्राकृतिक खेती के रूप में एक बड़ी उम्मीद भी दिखाई दे रही है। प्राकृतिक खेती को अपनाने के इच्छुक किसानों के लिए प्रदेश सरकार ने ‘प्राकृतिक खेती, खुशहाल योजना’ आरंभ की है। इस खेती के माध्यम से किसान न केवल घर पर ही उपलब्ध संसाधनों से अच्छी पैदावार करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण मेें भी अच्छा योगदान दे सकते हैं।

कुल्लू जिला में आतमा परियोजना के माध्यम से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। परियोजना निदेशक डाॅ. एसके ठाकुर का कहना है कि कोरोना संकट के इस दौर में हमें किसानों का भी विशेष अभिनंदन करना चाहिए। क्योंकि, अभूतपूर्व प्रकोप के बीच करोड़ों देशवासियों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रखने के लिए किसान अपने खेतों-खलिहानों में अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं की तरह कार्य कर रहे हैं। इन योद्धाओं की आय बढ़ाने के लिए सरकार आतमा परियोजना के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। इसी के मद्देनजर प्राकृतिक खेती, खुशहाल किसान योजना शुरू की गई है।

प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ सुभाष पालेकर की प्राकृतिक विधि पर आधारित इस खेती में किसी भी तरह की रासायनिक खाद, कीटनाशक या अन्य रसायनों का बिलकुल भी प्रयोग नहीं किया जाता है। महंगे रसायनों और उर्वरकों के प्रयोग के बजाय प्राकृतिक खेती में केवल देसी गाय के गोबर व मूत्र तथा घर पर ही उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री का ही प्रयोग किया जाता है। इन प्राकृतिक सामग्रियों के प्रयोग से खेती की लागत लगभग शून्य ही रहती है और पैदावार भी ज्यादा होती है। खतरनाक रसायनों से मुक्त खाद्यान्न और फल-सब्जियों को बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं तथा किसानों को काफी अच्छी आय होती है। लिहाजा, प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है।

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