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चिंता बढ़ा रहे श्रीलंका के नए राष्ट्रपति

चिंता बढ़ा रहे श्रीलंका के नए राष्ट्रपति
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श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव में गोटबाया राजपक्षे को जीत मिली है, जो पूर्व प्रेजिडेंट महिंदा राजपक्षे के ही भाई है। भले ही यह घटनाक्रम श्रीलंका की आंतरिक राजनीति का है, लेकिन भारत के लिए भी यह चिंता बढ़ाने वाला है। माना जाता है कि गोटबाया चीन के काफी करीबी हैं।

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  • श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान विवादित रक्षा सचिव रहे गोटबाया ने राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज की
  • उन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी के सजीत प्रेमदास को 13 लाख से अधिक मतों से पराजित किया
  • राजपक्षे परिवार फिर सत्ता में, चुनाव में 52.25 प्रतिशत मत मिले, प्रेमदास को 42 प्रतिशत
  • राजपक्षे (70) ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्ण ढंग से जीत का जश्न मनाने की अपील की

कोलंबोएएनएन (Action News Network)

श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में चीन के करीबी माने जानेवाले गोटबाया राजपक्षे को जीत मिली है, जो पूर्व प्रेजिडेंट महिंदा राजपक्षे के ही भाई है। भले ही यह घटनाक्रम श्रीलंका की आंतरिक राजनीति का है, लेकिन भारत के लिए भी यह चिंता बढ़ाने वाला है। दरअसल, गोटबाया को चीन की तरफ झुकाव रखने वाला माना जाता है। इसके अलावा तमिल हथियारंबद संगठन लिट्टे के खिलाफ जंग के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। एक वर्ग मानता है कि उन्होंने बेहद निर्दयता के साथ लिट्टे के खात्मे के लिए अभियान चलाया था। उन्हें 'टर्मिनेटर' भी कहा जाता है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर गोटबाया को जीत की बधाई दी है।

https://twitter.com/narendramodi/status/1195960355551268865

13 लाख वोटों से जीते हैं गोटबाया राजपक्षे
गोटबाया ने सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार सजीत प्रेमदास को 13 लाख से अधिक मतों से पराजित किया है। गोटबाया की जीत 5 साल पहले सत्ता से बाहर हुए राजपक्षे परिवार को फिर से देश की सत्ता में ले आई है। आधिकारिक परिणामों के अनुसार राजपक्षे को 52.25 प्रतिशत (6,924,255) मत मिले जबकि प्रेमदास को 41.99 प्रतिशत (5,564,239) वोट प्राप्त हुए।

चीन के नियंत्रण में लंका का हंबनटोटा पोर्ट
श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह को विकसित करने के लिए भारी लोन लिया था। फिर लोन चुका न पाने पर उसने यह अहम पोर्ट चीन को 99 साल की लीज पर दे दिया। फिलहाल इसपर चीन का अधिकार है। चीन ने श्रीलंका को एक युद्धपोत भी गिफ्ट किया हुआ है। ऐसा दिखाया गया कि यह आपसी संबंध मजबूत करने के लिए हुआ, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, ऐसा करके चीन हिंद महासागर में अपनी सैन्य पहुंच बना रहा है।

नायक की छवि और विवादित भी
गोटबाया की इस द्वीपीय देश में विवादित एवं नायक दोनों की छवि है। बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध उन्हें ‘युद्ध नायक’ मानते हैं, जबकि अधिकतर तमिल अल्पसंख्यक उन्हें अविश्वास की नजर से देखते हैं। गोटबाया 70 वर्षीय नेता हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर स्थित ‘काउंटर इंसर्जेंसी एंड जंगल वारफेयर स्कूल’ में प्रशिक्षण लिया था।

बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति रहने के दौरान उन्होंने वर्ष 2005 से 2014 में रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई थी। वर्ष 1983 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से रक्षा अध्ययन में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। गोटबाया वर्ष 2012 और 2013 में रक्षा सचिव रहते भारत के दौरे पर आए थे। तमिल मूल के परिवार जिनके अपने गृहयुद्ध के दौरान मारे गए या लापता हो गए हैं, वे गोटबाया पर युद्ध अपराध का आरोप लगाते हैं।

तमिलों के अलावा मुस्लिम भी हैं गोटबाया से आशंकित
सिंहली बौद्धों में गोटबाया की लोकप्रियता से मुस्लिम समुदाय भी आशंकित रहता है। उन्हें आशंका है कि ईस्टर के मौके पर इस्लामी आतंकवादियों के गिरजाघरों पर किए गए हमले के बाद दोनों समुदायों में पैदा हुई खाई और चौड़ी होगी। हिंदू और मुस्लिम की संयुक्त रूप से श्रीलंका की कुल आबादी में 20 फीसदी हिस्सेदारी है।

UN को किए वादों पर अमल से किया इनकार
राष्ट्रपति चुनाव के लिए श्रीलंका पीपल्स पार्टी (एसएलपीपी) का प्रत्याशी नामित होने के बाद अक्टूबर में पहली बार मीडिया से बातचीत करते हुए गोटबाया ने कहा था कि अगर वह जीतते हैं तो युद्ध समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष जताई गई प्रतिबद्धता या मेलमिलाप का सम्मान नहीं करेंगे। उनके इस बयान के चलते अल्पसंख्यकों के बीच चिंताएं और बढ़ी हैं।

2006 में लिट्टे के अटैक में बचे थे गोटबाया
गोटबाया पर नागरिकों और विद्रोही तमिलों को यातना दिए जाने और अंधाधुध हत्या तथा बाद में राजनीतिक हत्याओं को अंजाम दिए जाने के आरोप हैं। लिट्टे के निशाने पर रहे गोटबाया 2006 में संगठन के आत्मघाती हमले में बाल-बाल बचे थे। माना जाता है कि उनका झुकाव चीन की ओर अधिक है। गोटबाया के भाई के शासन में चीन ने बड़े पैमाने पर श्रीलंका की आधारभूत परियोजनाओं में निवेश किया था।

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