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आया राम और गया राम के बीच ओली के ‘नए राम’ - डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा

आया राम और गया राम के बीच ओली के ‘नए राम’ - डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
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नई दिल्ली । Action India News

अयोध्या में तीन दोस्त रहते थे। गप्पुराम, झप्पुराम और ठप्पुराम। काम-धाम तो था नहीं लेकिन बीबीसी, सीएनएन-आईबीएन, अलजजीरा से ज्यादा अपडेटेड रहते थे। गप्पुराम अपने नाम के मुताबिक काम करता था। एक बार शुरु हो जाता तो रुकने का नाम नहीं लेता। उसकी गप्प हाँकने की लत एकदम चीविंगगम की तरह थी।

छोटी सी छोटी बात को कुछ इस तरह खींच-खांचकर बड़ा कर देता कि पता ही नहीं चलता बहस किस के लिए हो रही है। अब बात करते हैं झप्पुराम की। मित्र गप्पुराम की गप्पावली का सिर हिला-हिलाकर उत्तर देने वाले झप्पुराम जागते कम सोते ज्यादा हैं।

लेकिन एक बात तो तय है कि झप्पुराम ने कभी अपनी नींद को दूसरों के लिए नींद लगने ही नहीं दिया। वह कुछ इस तरह से आँखें बंद करता मानो चिंतन-मनन कर रहा हो। बीच-बीच में ऊँघने के क्रम में सिर दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे हिला देता था, जो गप्पुराम की गप्प में प्रतिक्रिया का सूचक था। कहना न होगा कि कभी उसने गप्पुराम की गप्प पर गलत ढंग से सिर हिलाया हो।

अब अंत में बात करते हैं तीसरे मित्र की। जी हाँ ठप्पुराम की। इनका केवल एक ही काम है, और वह है गप्पुराम की हर बात पर सही-गलत का ठप्पा लगाना। ठप्पा लगाते समय पंचलाइन की तरह बात-बात पर ‘यह हूई न बात’ कहना नहीं भूलते। इस तरह तीनों मित्रों में बड़ी गहरी मित्रता थी। तीनों की ‘अंडस्टांडिंग’ इतनी अच्छी थी कि उन्हें उनके सिवाय कोई नहीं समझ सकता। यहाँ तक कि उनके माता-पिता या फिर घरवाले।

एक दिन चाय की टपरी पर तीनों बैठे थे। किसी नवआगंतुक ने तीनों के बारे में जाने बिना नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली की डुप्लीकेट अयोध्या वाली बात छेड़ दी। मानो गप्पुराम को बैठे बिठाए बटेर मिल गया। बहस में कूद पड़े।

गप्पुराम ने नवआगंतुक को पास बुलाते हुए कहा – बेटा! लगता है तुम्हें रामायण-महाभारत की थोड़ी सी भी समझ नहीं है। बता सकते हो रामायण-महाभारत में कॉमन फैक्टर क्या है? नवआगंतुक ने कहा – यह भी कोई पूछने वाली बात हुई। एक में राम और दूसरे में श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन है। दोनों ही धर्म की स्थापना का महत्व बताते हैं। गप्पुराम ने कहा – बेटा अभी तुम बच्चे हो। यह सब किताबी बाते हैं।

रामायण-महाभारत राम या कृष्ण की नहीं बल्कि सीता और द्रौपदी की कहानी है। यदि ये दोनों अपने अन्यायों के साथ समझौता कर लेतीं तो आज राम और कृष्ण पूजे ही नहीं जाते। झप्पुराम ने झपकी लेते हुए और ठप्पुराम ने ‘यह हुई न बात’ की पंचलाइन से गप्पुराम का हौंसला बढ़ाया। इस पर नवआगंतुक ने आश्चर्य भरे में स्वर में पूछा – आपकी इन बातों का के.पी.शर्मा ओली के बयान से क्या लेना-देना?

गप्पुराम ने किसी बूढ़े बाज़ की तरह आँखें गड़ाकर कहा – बेटा, रामायण-महाभारत की भांति नेपाल की राजनीति को प्रभावित करने वाली भी एक स्त्री ही है। उसका नाम है हाओ यांकी। यह नेपाल में चीन की राजदूत है। यह वह बला है जो ओली को भांग की गोली खिला रही है। अपने प्रेम के मोहजाल में बांधकर उनसे दिन को रात और रात को दिन कहलवा रही है।

जब से ओली का दिल ओले-ओले कहने लगा है तब से वे प्रधानमंत्री कम आशिक मिजाज ज्यादा लगते हैं। वह दिन दूर नहीं जब यांकी के प्यार में आशिकी-3, यांकी-ओली की अमर प्रेमकथा जैसी फिल्मों में बतौर हीरो काम करते नजर आयेंगे।

नवआगंतुक की आँखें फटी-फटी की रह गई। गप्पुराम ने आगे कहा – बेटा यह ओली नहीं चीन की ब्यूटीफुल गोली का असर है। हांकी बीच-बीच में अपने प्रेम का इजहार ट्विटर्राते हुए कहती है कि हम लोग पड़ोसी हैं जो पहाड़ों और नदियों से जुड़े हुए हैं, हमारी दोस्ती अमर है।

ज़रूरत के वक़्त काम आने वाला दोस्त ही असल में दोस्त है। चीन (हांकी) हमेशा नेपाल (ओली) के साथ खड़ा रहेगा। कहते हैं न जो आदमी प्यार में पड़ जाता है वह निकम्मा बन जाता है। और प्यार बुढ़ापे में हो जाए तो शामत ही शामत है।

इसीलिए आए दिन ओली साहब हांकी की प्यार वाली भांग की गोली खाए कभी नेपाल का नक्शा बदल देते हैं, तो कभी भारत के अयोध्या और राम को डुप्लीकेट और नेपाल को राम की असली जन्मभूमि बताते हैं। पिद्दी भर का देश नहीं आज भारत पर आँख उठाने चला है। ओली यह समझ रहे हैं कि ऐसा बयान देकर भारत को हिला देंगे।

यह ओली के पागलपन की निशानी और सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। वह भारत और नेपाल के धार्मिक संबंधों को बखूबी समझते हैं लेकिन चीन (हांकी) के बहकावे में आकर ये सब कर रहे हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब उन्हें गैंग्स ऑफ वसीपुर की स्टाइल में समझाना पड़ेगा। आजकल कुछ ज्यादा ही पर फड़फड़ा रहे हैं।

मुंगेरीलाल के हसीन सपने की तरह दुनिया के सारे देशों (चीन को छोड़कर), ग्रहों, समुद्रों, वनस्पतियों का नामकरण नेपाल करने पर तुले हैं। वैसे भी जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की ओर दौड़ता है।

झप्पुराम और ठप्पुराम अपने मित्र के अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान से नवआगंतुक को घुटनों के बल झुककर आशीर्वाद लेने पर मजबूर कर देते हैं। नवआगंतुक को लगा ओली के लिए गप्पु, झप्पु और ठप्पु की टोली ही काफ़ी है।

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