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झारखंड

राजमहल परियोजना : संदेह के घेरे में सुरक्षा व्यवस्था

राजमहल परियोजना : संदेह के घेरे में सुरक्षा व्यवस्था
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गोड्डा। एक्शन इंडिया न्यूज़

जिले में कार्यरत ईसीएल सालाना आठ से दस करोड़ रुपये सीआईएसएफ एवं तीन से चार करोड़ रुपये ईसीएल सिक्योरिटी एवं होमगार्ड के जवानों पर खर्च करती है। इसके बाद भी यहां के खदानों में रोजाना लाखों रुपये के सामानों की चोरी हो रही है। ऐसे में इन सुरक्षा प्रणालियों पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ईसीएल के द्वारा खर्च करने के औचित्य पर प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठने लगा है।

उल्लेखनीय है कि राजमहल परियोजना की खुली खदान में इन दिनों सीआईएसएफ ने अपनी ड्यूटी हटा ली है तथा यह कंपनी अपने निर्धारित पोस्ट से हटकर महज पेट्रोलिंग में अपने जवानों की पोस्टिंग कर रही है। दूसरी ओर आउटसोर्सिंग कंपनी की हालात देखे तो आरसीएमएल ने महज 89 सुरक्षा गार्ड एवं अधिकारियों के द्वारा अपने पूरे खदान की मशीनों की सुरक्षा बखूबी करने में सक्षम हो रही है।

चोरी की घटनाओं के आंकड़े को देखें तो आरसीएमएल में प्रति महीने एक या दो घटनाएं रिपोर्ट की जाती है तो दूसरी ओर ईसीएल की तमाम मशीनों में चोरी की घटनाओं की संख्या प्रति माह 15 से 20 तक हो रही है। इसके बाद भी ईसीएल की राजमहल परियोजना प्रबंधन इन तमाम सुरक्षाबलों को बैठा कर चोरी की घटना होने के बाद भी मोटी पगार दे रही है।

उल्लेखनीय है कि खान की सुरक्षा में प्रथम पाली में करीब 30 द्वितीय पाली में 40 तथा तृतीय पाली में 60 सुरक्षा बल कार्यरत रहते हैं। इनके संचालन व्यय पर राजमहल परियोजना द्वारा अलग से गाड़ी एवं रहने खाने की व्यवस्था की गई है। बावजूद सुरक्षा के नाम पर इन से कुछ भी बेहतर नहीं होना इन तमाम खर्चों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। पूर्व में खदान से कोयले की चोरी की जाती थी लेकिन अब डीजल एवं पार्ट्स पुर्जों की चोरी जोरों पर है।

-एंटी थेफ्ट मशीनों को तोड़ने का है प्रयास

खदान क्षेत्र में काम करने वाली वर्तमान समय में आई नई मशीनों में एंटी थेफ्ट प्रणाली लगाई गई है, जिससे डीजल की चोरी करना लगभग असंभव सा है। 190 टन क्षमता वाले कैटरपिलर डंपरों से चोरी करने के लिए उसके टैंक एवं अन्य सामानों को तोड़ने का काम चल रहा है। इसी तरह एक्सकैवेटर मशीनों को भी क्षतिग्रस्त कर उसके सामानों की चोरी की जा रही है। इन मशीनों की देखभाल में लगे अभियंता एवं चालक अपने स्तर से चोरी की घटना की सूचना देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

-खदान के कामगारों की भूमिका भी संदिग्ध

राजमहल परियोजना की खदान क्षेत्र में काम करने वाले 23 सौ कर्मचारियों को इन चोरी की घटनाओं से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता। जानकारों का मानना है कि इन सब कामगारों के साथ चोरों की सांठगांठ लंबे समय से चल रही है तथा एक सुनियोजित तरीके से चोरी की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। सारी जानकारी होने के बाद भी परियोजना प्रबंधन खदान क्षेत्र की विभिन्न गड़बड़ियों को छुपाने के लिए इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। यदि जल्द ही इस और आवश्यक कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में तमाम मशीनें काम करने में असमर्थ हो जाएंगी तथा राजमहल परियोजना पूरी तरह से निजी हाथों में जाने का रास्ता साफ हो जाएगा।

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