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विश्वसाहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान :प्रो० प्रसून दत्त

विश्वसाहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान :प्रो० प्रसून दत्त
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रांची। एक्शन इंडिया न्यूज़

महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतीहारी के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो० प्रसून दत्त सिंह ने कहा कि विश्वसाहित्य में श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान के श्रीमुख से निःसृत परम रहस्यमयी दिव्यवाणी है। प्रो० सिंह बुधवार को संस्कृत साहित्य परिषद्, डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची के द्वारा आयोजित 'वर्तमा‌न सन्दर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता' विषय पर आयोजित एक दिवसीय ई-संगोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे। प्रो० सिंह ने कहा कि गीता में स्वयं भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर मनुष्यमात्र के कल्याण के लिए उपदेश दिया है। गीता में किसी मत का आग्रह नहीं, प्रत्युत केवल जीव के कल्याण का आ‌ग्रह है। गीता में समता को 'योग' कहा गया है। गीता की वाणी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियन्त्रण में रखकर उन्हें सबल बनाने की विधि बताती है, जिससे हम बाहरी परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना कर सकें। उन्होंने आगे कहा कि गीता व्यक्तित्व के समग्र विकास, सांगोपांग उत्थान अथवा सर्वांगपूर्णता की शिक्षा देती है। गीता का उद्देश्य है नर में नारायणत्व जगाकर उसे नारायण बना देना, पूर्णता देना। गीता विषाद से आनन्द तक, अन्धकार से प्रकाश तक, नरत्व से नारायणत्व तक अथवा अपूर्णता से पूर्णता तक मन की अन्तर्यात्रा है तथा मानव के समग्र विकास का जीवन-दर्शन है। जिसका अनुसरण मानव के नीरस अस्तित्व को सरस जीवन-संगीत बना देता है। यह कोई आश्चर्य नहीं कि केवल हिन्दू ही नहीं, अन्य धर्मावलम्बी भी, तथा केवल भारतवासी ही नहीं, असंख्य विदेशी भी, गीता-कल्पवृक्ष के मधुर फल का आस्वादन करके मुक्तकण्ठ से सराहना करते हैं। संगोष्ठी के सारस्वत अतिथि डा० शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि गीता जीवन प्रबन्धन का शास्त्र है। अनियंत्रित मन समस्त दुःखों का मूल है और गीता मनोनियंत्रण से अनुशासित जीवन जीने का उपदेश करती है। अनियंत्रित इन्द्रियाँ मनुष्य को विनाश के गर्त में गिरा देती हैं । वर्तमान समय की महामारी इसीलिए आई कि हमारी अनियंत्रित इन्द्रियों ने अभक्ष्य भक्षण, अश्रव्य श्रवण, अवाच्य वाचन, अगम्य गमन, अदर्शनीय अवलोकन आदि तमाम कुकर्मों से जीवन का अनुशासन भंग किया । उन्होंने आगे कहा कि गीता कर्मठता का मंत्र सिखलाती है ।फल की चिन्ता किए बिना कर्म में अपनी समस्त ऊर्जा लगाएँ तो अच्छे फल की प्राप्ति होगी, लेकिन वर्तमान संदर्भ में लोग फल के चिंतन में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं । कर्म के प्रति कोई उत्साह नहीं, ध्यान नहीं । गीता किसी धर्म या संप्रदाय का ग्रंथ नहीं है वरन् समस्त मानवजाति के कल्याण का पथ प्रशस्त करने वाला महाग्रंथ है जिसके सिद्धान्त सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं ।

गीता को पढ़ने या उसे समझ लेने मात्र से आपका कल्याण नहीं हो सकता वरन उसके उपदेशों के परिपालन से जीवन में शान्ति और समृद्धि आएगी । संस्कृत साहित्य परिषद्, डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, राँची के समन्वयक डा० धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता संस्कृत वाङ्मय का एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें दर्शन, धर्म और नीति का समन्वय हुआ है। गीता के सन्देश का क्षेत्र सार्वभौम है। गीता का उपदेश किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए नहीं, अपितु मानवमात्र के लिए कल्याणकारी हैं। गीता की लोकप्रियता उसके महत्त्व की ओर संकेत करती है। वस्तुतः मानव-जीवन की समस्त समस्याओं का निदान और उपचार गीता में मिलता है। गीता हमें उच्च आकांक्षा एवं आशा के अनुरूप जीने के लिए अन्तःस्फूर्ति एवं अन्तर्प्रेरणा देती है, जीवन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करती है।

उन्होंने कहा कि गीता के मतानुसार मनुष्य को कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, अपितु कर्म के फल का त्याग करना चाहिए। गीता मनुष्य को काम, क्रोध और लोभ का त्याग करने की प्रेरणा देती है। वस्तुतः काम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं।


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