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ग्रामीणों को भयमुक्त करने 103 वर्ष पहले महाराजा वेंकट रमन सिंह ने किया था बाघ का शिकार

ग्रामीणों को भयमुक्त करने 103 वर्ष पहले महाराजा वेंकट रमन सिंह ने किया था बाघ का शिकार
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छुईहाई के जंगल में लगा शिलालेख बखान कर रहा रीवा महाराजा का पराक्रम

अनूपपुर। एक्शन इंडिया न्यूज़

बात वर्ष 1918 यानी करीब 103 साल पहले की है। अनूपपुर जनपद अंतर्गत ग्राम भोलगढ़ के समीप स्थित छुईहाई के बीहड़ जंगल में आदमखोर बाघ की दहशत से स्थानीय ग्रामीण खौफ के साए में जी रहे थे। तब यह इलाका सोहागपुर क्षेत्र में शामिल था।

आदमखोर बाघ ने जंगल के नजदीक ही बहते जल स्रोत को अपना ठिकाना बना रखा था, जहां वह पानी के लिए पहुंचने वाले मवेशियों का शिकार करता था। इसके साथ ही आदमखोर हो चुके बाघ ने कभी कभी ग्रामीणों को भी अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया था।

अपने परिवार के सदस्यों को बाघ का शिकार बनता देख लोग डर से गांव छोडक़र पलायन करने लगे थे। यह जानकारी जब इलाकेदार के माध्यम से रीवा रियासत के महाराजा वेंकट रमण सिंह के पास पहुंची तो उन्होंने अपनी बंदूक उठा ली और आदमखोर का बाघ का शिकार अपनी प्रजा को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।

महाराजा रीवा की यह पराक्रम कथा आज भी छुईहाई के जंगल में लगे एक शिलालेख पर पढ़ी जा सकती है।

103 वर्ष पूर्व किया था अंतिम शिकार

महाराजा वेंकटरमण सिंह के द्वारा 103 वर्ष पूर्व वर्ष 1918 में 19 जून रविवार के दिन इस आदमखोर बाघ का शिकार किया गया था।जिस जगह पर बाघ का शिकार किया गया था, वहीं, पर एक शिलालेख भी लगाया गया है।

छुईहाई कैंप सीतापुर जो कि अब भोलगढ़ नाले के नाम से जाना जाता है, यहां पर महाराजा के द्वारा किया गया आदमखोर बाघ का शिकार, महाराजा का अंतिम शिकार था। इसके बाद उनके द्वारा किसी भी बाघ का शिकार नहीं किया गया।

शिलालेख में इसके प्रमाण भी उत्कीर्ण हैं। उल्लेखनीय है कि आज भी भोलगढ़ के जंगल बाघ तो नहीं तेंदुए का रहवास स्थल के रूप में जाना जाता है। जंगलों की कटाई के कारण अब बाघों ने अहिरगवां या बांधवगढ़ के जंगल को अपना आश्रय स्थल बना लिया है ।

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