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पश्चिम बंगाल

सोशल मीडिया की चकाचौंध में इतिहास बनी विजयादशमी पर पत्र के जरिये शुभकामनाएं देने की परंपरा

सोशल मीडिया की चकाचौंध में इतिहास बनी विजयादशमी पर पत्र के जरिये शुभकामनाएं देने की परंपरा
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कोलकाता। एक्शन इंडिया न्यूज़

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के बाद विजयादशमी के दिन लोग एक दूसरे को शुभकामनाएं और आशीर्वाद देते हैं। यह बंगाल की संस्कृति का अनमोल हिस्सा रहा है। हालांकि तकनीक का हाथ पकड़कर तेजी से आगे बढ़ रही दुनिया के साथ परंपराएं भी बदलती जा रही हैं। सैकड़ों सालों से बंगाल में लोग विजयादशमी की शुभकामनाएं अपने अपने दोस्तों रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को चिट्ठियों के जरिए देते थे। विजयादशमी आते ही अपनों के खत का इंतजार लोगों को रहता था। वक्त बदला है और चिट्ठियां इतिहास की बात हो गई हैं। नई पीढ़ी तो शायद ही यह बात जानती होगी। आज लोग इंटरनेट के जरिए सोशल मीडिया पर व्हाट्सएप, फेसबुक, और ट्विटर के जरिए एक-दूसरे को शुभकामनाएं दे रहे हैं। चिट्ठियों की बात गुजरे जमाने की तरह आई गई हो गई है।

इस बारे में पूर्व कुलपति पवित्र सरकार ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि 90 के दशक के बाद किसी ने चिट्ठी के जरिए विजयादशमी की शुभकामनाएं दी हो यह मुझे आज तक याद नहीं। तीसरी कक्षा में पढ़ता था तब अपने हाथ से चिट्ठी लिखकर विजयदशमी की शुभकामनाएं दी थी। मेरे पिता छठी क्लास पास थे और वह भी चिट्ठी लिखकर विजय दशमी की शुभकामनाएं देते थे। 25 साल पहले टेलीफोन का निर्माण हुआ और धीरे-धीरे पत्र लोगों के जीवन से अलविदा हो गए।

इसी तरह से पूर्व चीफ पोस्ट मास्टर जनरल गौतम भट्टाचार्य ने भी हिन्दुस्थान समाचार से कहा, "हम लोग बच्चे थे तब चिट्ठियों के जरिए विजयादशमी की शुभकामनाएं भेजे थे। दूसरे राज्य अथवा दूसरे देशों में रहने वाले काका काकी, मौसी मौसा को भी चिट्ठी लिखकर ही प्रणाम भेजते थे। लेकिन अब वक्त बदल गया है और अधिकतर लोग फोन के जरिए ही शुभकामनाएं दे रहे हैं। मुलाकात होने पर गले लगाते हैं या कुशल छेम पूछ लेते हैं। अगर बात करने का मन ना हो तो व्हाट्सएप के जरिए मैसेज भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि चिट्ठियों के जरिए जो अपनापन महसूस होता था वह आज मोबाइल के व्हाट्सएप मैसेज पर नहीं है।

डाक विभाग के पूर्व डायरेक्टर जनरल अरुंधती घोष ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि बचपन में मां बाप को चिट्ठी लिखते हुए देखती थी। विजयादशमी की शुभकामनाएं देने के लिए बड़ी संख्या में चिट्ठियां लिखी जाती थीं। मां की चिट्ठियों के निचले हिस्से में मैं भी विजय दशमी का प्रणाम लिख कर भेजती थी। थोड़ी बड़ी हुई तो मैं भी चिट्ठियां लिखती थी। तब केवल चिट्टियां लिखना ही नहीं बल्कि किसी की चिट्ठियां मिलनी भी बड़ी खुशी देती थी। 2017-18 में जब चीफ पोस्ट मास्टर जनरल थी तब इस परंपरा को कायम रखते हुए पोस्टकार्ड पर चिट्ठी लिखी थी।

इसके पहले 2013 में भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चिट्ठी लिखकर पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, वाममोर्चा चेयरमैन विमान बसु सहित बड़े नेताओं को विजयादशमी की शुभकामनाएं दी थी। पुराने लोगों का कहना है कि पूजा से ठीक पहले पोस्ट ऑफिस में चिट्ठियां लिखने के लिए पोस्टकार्ड खरीदने वालों की भीड़ लग जाती थी। दशमी के बाद एकादशी को सुबह-सुबह फिर पोस्ट ऑफिस में भीड़ लगती थी उस पोस्ट कार्ड पर लिखे गए चिट्ठियों को भेजने के लिए। अब तो विजयदशमी की शुभकामनाएं उंगलियों का खेल हो गई हैं। मोबाइल पर व्हाट्सएप खोलिए और जिसे जो मैसेज भेजना है भेज दीजिए। कुल मिलाकर कहें तो चिट्ठियां अब अतीत में खो गई हैं।

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