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राज्य के लिए जब अपमान सह गए पहाड़ के गांधी

राज्य के लिए जब अपमान सह गए पहाड़ के गांधी
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  • पूरा उत्तराखंड आज मना रहा स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी की पुण्यतिथि

  • राज्य आंदोलन का निर्णायक श्रीगणेश करने का श्रेय बडोनी को ही

देहरादून । Action India News

सफेद दाढ़ी, कुर्ता पायजामा और पूरे व्यक्तित्व में प्रथमदृष्ट्या ही पर्वतीय आभा दिवंगत इंद्रमणि बडोनी के साथ जुड़ी अटूट पहचान रही। उत्तराखंड जैसे जनांदोलन को जिस तरह से बडोनी ने चलाया, उनके नेतृत्व के इस ढंग ने ही उनके लिए एक नाम उपलब्ध कराया-पहाड़ का गांधी। 1925 में जन्मे बडोनी की आज पूरे उत्तराखंड में पुण्यतिथि मनाई जा रही है।

इस मौके पर इस बात को याद करना भी जरूरी है कि राज्य की खातिर बडोनी दिल्ली में अपने लोगों की बदसलूकी को भी सह गए थे।दरअसल, उत्तराखंड आंदोलन के चरम पर पहुंचने की स्थिति में दिल्ली में 1994 को एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। यह आयोजन आंदोलन के दौरान उत्तराखंड की ताकत सबसे बड़ा प्रदर्शन था।

आंदोलन में विभिन्न संगठनों और विचारधाराओं के प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी थी, इसलिए सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव था, फिर भी इंद्रमणि बडोनी एक ऐसा नाम था, जिनका सभी सम्मान करते थे और उनकी बात को काफी हद तक मानते थे। इन स्थितियो के बीच, केंद्र सरकार पर निर्णायक दबाव बनाने के लिए दिल्ली रैली का आयोजन किया गया।

दिल्ली में उत्तराखंडियों की भारी भीड़ जुटी। मंच पर नेतृत्व करने के लिए नेताओं में धक्का मुक्की हुई। बडोनी के हाथ से भी कुछ शरारती तत्वों ने माइक छीन लिया और धक्का मुक्की की। बडोनी ने इस मामले को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे आंदोलनकारियों की खंडित एकता का प्रदर्शन होता।

बडोनी ने सभी लोगों को शांत कराया और बाद में यह रैली बहुत अच्छेे से हुई।उत्तराखंड राज्य की मांग तो बहुत पहले से होती आई थी, लेकिन 1994 को आंदोलन के इतिहास में सबसे ज्यादा अहम माना जाएगा, जबकि सड़कों पर अभूतपूर्व आंदोलन हुआ। रामपुर तिराहा, मसूरी, खटीमा कांड हुए। इस आंदोलन की शुरुआत 1994 में आरक्षण के विरोध से हुई लेकिन बाद में यह राज्य आंदोलन में तब्दील हो गया।

पौड़ी में बडोनी अपने तीन साथियों को लेकर अनशन पर बैठे और उन्हें जबरन उठा लिया गया तो आंदोलन भड़क उठा। ग्राम प्रधान से लेकर तीन बार विधायक रहे बडोनी एक शानदार लोक कलाकार भी थे। यह बदकिस्मती रही कि राज्य आंदोलन के लिए पुरजोर संघर्ष करने वाले बडोनी उत्तराखंड का निर्माण अपने जीते जी नहीं देख पाए। राज्य गठन से करीब सवा साल पहले 1999 में आज के दिन ही उनका देहांत हो गया।

उनके भांजे वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर भट्ट बताते हैं कि स्वर्गीय बडोनी एक जनसेवक, एक लोक कलाकार और एक प्रकृति प्रेमी के तौर पर बेजोड़ थे। उन्होंने पूरा जीवन सादगी से बिताया। उत्तराखंड के विकास के लिए वह एक खास विजन रखते थे।

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