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झारखंड

प्रवासी मजदूरों के दर्द की नहीं मिली दवा

गोड्डा । एएनएन (Action News Network)

प्रवासी मजदूरों के दर्द की दवा अब तक नहीं मिल सकी है। मजदूर आज भी रोड पर पैदल अपने मंजिल की ओर जाने में अपनी उर्जा लगा रहे हैं। रोजाना पत्थर उठाने वाले हाथ आज बेबस हैं। लखनऊ से पैदल 15 दिन से चल रहे कुछ मजदूरों ने अपनी दास्तां सुनाई तो कठोर दिल भी इनकी दास्तां सुनकर पिघले बिना नहीं रह सकता। हर हाथ को काम दिलाने वाले कानून की असली सच्चाई अब खुलकर सामने आने लगी है। रेलवे की पटरी पर पत्थर डालने वाले यह मजदूर बताते हैं कि ढाई महीने से जब ठेकेदार ने उनकी कमाई की गई मजदूरी भी नहीं दी तथा यह कह कर चलते बने कि जैसे भी हो घर निकल जाओ, तब वह लाचार होकर पैदल ही चलते चलते यहां तक पहुंच पाए हैं।

ललमटिया में कुछ देर तक इन लोगों से बात करने पर पता चला कि कटिहार जिले के एक व्यक्ति ने उन्हें लखनऊ जाने के लिए तैयार किया था। इन मजदूरों को बंगाल के मानिकचक अपने घर वापस जाना है तथा कुछ को राजमहल जाना है इन लोगों ने रास्ता की भी जानकारी ली। मजदूरों में फूल मोहम्मद, सारीकुल, महमूद अंसारी आदि ने बताया कि रास्ते में उन्हें किसी ने कोई पूछताछ नहीं की है। जगह जगह पर वे लोग आम लोगों द्वारा चलाए जाने वाले भंडारे में खाकर यहां तक पहुंचे हैं। झारखंड सरकार द्वारा प्रवासी मजदूरों के वापसी के लिए किए गए प्रावधान तथा ट्रेन चलने की बात पर उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है, उनको कोई इस संबंध में कुछ भी नहीं बताया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन मजदूरों के दर्द की दवा कब मिलेगी।

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