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अंग्रेजों की मूँछ उखाड़ ली थी रामसेवक ने - नृपेन्द्र अभिषेक नृप

अंग्रेजों की मूँछ उखाड़ ली थी रामसेवक ने - नृपेन्द्र अभिषेक नृप
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नई दिल्ली । Action India News

"अमर रहेगी युग-युगान्त तक उनकी गौरव गाथा,उनके उत्सर्गो के सम्मुख सदा झुकेगा माथा।" महल के कमरे की शोभा सभी देखते हैं, परन्तु नीवं की ईंटों की निःस्वार्थ सेवा ,त्याग तपस्या एवं बलिदान को कोई नहीं देखता, जिसके आधार पर महल इठलाते रहते है। नीव की ईंट का अपना कोई सम्मान नहीं।

उसने इमारत हेतु अपनी प्राणहुति कर दी, नींव की ईंटों ने अपने सम्मान एवं पूजा के लिए कुर्बानी नही की। इस तरह जंगे आज़ादी को जिन्होंने अपने खून से सिंचित किया, कठिन कारावास सहकर भी पराधीनता पशिचिनी का पुतना बध किया, स्वतंत्रता आंदोलन की अवधि में ढ़ोढ़ स्थान की धरती ने कुछ ऐसे सपूतों को जन्म दिया जिनकी याद सदियों तक रहेगी।

ऐसे महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों के बीच ढ़ोढ़स्थान क्षेत्र की उत्तरांचल के श्री राम सेवक प्रसाद का नाम प्रातः स्मरणीय हैं। इस गांधीवादी आया संकल्प इतिहास के पन्नों में अंकित हैं..-"है अपूर्व यह युद्ध हमारा, हिंसा की न लड़ाई है,तलवारों की धार मोड़ने, गरर्दन आगे आई है ।"

फलवानुमा शरीर, गोरा बदन, लम्बा कद, विशिष्ट लोकोत्तर आभा से आलोकित त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति खादीधारी श्री प्रसाद का जन्म सारण जिला के अंतर्गत जनता बाजार थाना के भटवलिया ग्राम में 1892 ई० को हुआ था।

इनके पिता का नाम दलसिंगार प्रसाद और माता का नाम शिवकालो देवी था। वे शुरू से ही अत्यंत तीव्र बुद्धि के थे । इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव पर हुई।आगे की पढ़ाई इन्होंने जिला स्कूल छपरा से की थी और शुरू से ही इनमें राष्ट्रीय चेतना का प्रबल प्रभाव था। इन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारी को निकट से देखा था।

हरपुर कोठी में निलिहों की कोठी थी, जहाँ से कृषकों को नील की खेती के लिए बाध्य किया जाता था। खेती नहीं करने पर तंगों तबाह किया जाता था। इन्होंने अपने परिजन शिक्षक श्री राजरूप प्रसाद पर अंग्रेजों के मानसिक दबाव और प्रताड़ना को निकट से देखा था, फलस्वरूप अंग्रेजों के प्रति नफरत की भावना विद्यार्थी जीवन से ही परिव्याप्त थी।

श्री प्रसाद का पारिवारिक माहौल शिक्षापूर्ण और सामाजिक प्रतिविधियों का केंद्र था।यहां जिला के कोना-कोना से सामाजिक और क्रांतिकारी लोगों का जुटना होता था।यहाँ गोपनीय रणनीति बनायी जाती थी और उसके पालन का भार नौजवानों को सौप दिया जाता था इन सबका प्रभाव इनके दिलों- दिमाग पर पड़ा। यही कारण था कि जब गांधी जी छपरा के रामलीला मठिया में भाषण देने आये थे और उन्होंने नौजवानों को स्कूल-कॉलेज छोड़कर आगे आने का आहवान किया तो आहवान पर इन्होंने बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी।

खादी का कपड़ा पहनना शुरू कर दिया। उन्होंने गाँव-गांव में घुम-घुम ग्राम सभा के गठन का कार्य शुरू किया। 1924 ई० में स्वयं सेवक दल के भर्ती का कार्य शुरू हुआ तो ये गांव-गांव में घूमकर कांग्रेस कमिटी के गठन के कार्य मे लग गये। गांव-गांव में लोगों के जगाने लगे। गीत गाने लगे- 'कचहरी में बोलेला सियार रे वकीलवा'- उठो सवेरे गांधी जगा रहा हैं।'

इन्होंने स्वामी मोहन स्वरूप , विगहा के गिरजा दत्त, माधोपुर के पारसनाथ ठाकुर, महराजगंज के गंगा प्रसाद , सकरी के विद्या सिंह, सिसई के कपिलदेव, जुआफ़र के शुभलाल प्रसाद आदि के साथ क्रांति का अलखनाद किया। इसी क्रम में मुलाकात रामदेनी सिंह से हुई, जिनके साथ मिलकर इन दोनों व्यक्तियों ने बसंतपुर के बगल में एक अंग्रेज ऑफिसर की मूंछ को ही उखाड़ दिया था। इन्हीं लोगों ने अंग्रेजों की राह को रोकने के लिए कोडर के पूल को तोड़ दिया था।

जब 1923 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह का कार्यक्रम शुरू हुआ तो ये भी वहां गए थे। बंगरा के रामलखन सिंह, टेबड़ा के रामगति सिंह के साथ ये भी 14 दिन के लिए गिरफ्तार हुए। बाद में रिहा कर दिए गये।यह इनकी पहली जेल यात्रा थी।1930 में महाराजगंज के पास मौनिया बाबा के पास राजेन्द्र बाबू और जवाहर लाल नेहरु आये थे।

उस सभा में अपने साथियों के साथ इन्होंने भी भाग लिया। उसी समय नमक सत्याग्रह का कार्यक्रम शुरू हुआ। गांधी जी ने कहा था कि बिना लाइसेंस का नमक बनाओं। हवा, पानी, मिट्टी पर सरकारी प्रतिबंध नहीं रहेगा। भरत मिश्र के मार्ग निर्देशन में छपरा जिला में नमक सत्याग्रह का कार्यक्रम शुरु हुआ।

पहला सत्याग्रह 6 अप्रैल 1930 को बरेजा में गिरीश तिवारी के नेतृत्व में शुरू हुआ।उसके बाद यह कार्यक्रम फैलता गया।श्री प्रसाद ने 8 अप्रैल 1930 को अपने गांव भटवलिया में अपने दलान पर नमक बनाने का कार्यक्रम अपने साथियों के सहयोग से शुरू किया।इसी कार्यक्रम के साथी शुभलाल प्रसाद, रामदेनी सिंह, रामलखन प्रसाद आदि थे।लेकिन बगल के गांव हरपुर कोठी में ही अंग्रेजों की कोठी थी।

अंग्रेजों को इसकी खबर मिली। वे लोग नमक सत्याग्रह को विफल करने पर अड़ गये। जब श्री प्रसाद कराह में नमक बना रहे थे, उसी समय अंग्रेज ऑफिसर आकर कराह उलटने लगा। वे अड़ गये। उन्होंने गरम कराह को अपनी छाती से सटा लिया, परन्तु उलटने नहीं दिया। उनकी छाती जल गयी। वे बेहोश हो गये परन्तु नमक सत्याग्रह को विफल नहीं होने दिया। इस तरह के दृढ़ संकल्पी थे- श्री प्रसाद।

अंत में अंगेज लोग इन्हें पकड़ कर ले गये।इन्हें 19 माह की सजा हुई।गरखा के जगलाल चौधरी, अमनौर के हरमाधव सिंह, बरेजा के सवालिया बाबू, मांझी के सभापति सिंह, मद्रासी जी, शान्ति ओझा और हजियापुर के भूलन बाबू के साथ ये भी जेल में बंद रहे।जेल से निकलने के बाद भी इनकी गतिविधियां बंद नहीं हुई, ये जोर-शोर से आज़ादी के लड़ाई में लग गये। इसी क्रम में इनकी शादी 23 वर्ष की उम्र में मानती देवी के साथ हुई परन्तु पत्नी के स्नेह पाश ने स्वतंत्रता आंदोलन से इन्हें विलग नहीं किया, बल्कि पत्नी भी धर्म परायण और सामाजिक चेतना की प्रतिमूर्ति थी। घर आये क्रांतिकारी युवकों की आवभगत करती थी।

जब 1942 का आंदोलन 'करो और मरो' के रूप में बदल गया था, तब इन्होंने सर पर कफ़न बांध कर अंग्रेजी हुकूमत के भयानक खिलाफ़त का निर्णय लिया था। 14 अगस्त 1942 को बंगरा के फुलेना प्रसाद, महुआरी के चंद्रमा प्रसाद, जुआफ़र के शुभलाल प्रसाद आदि के साथ इन्होंने गुप्त मीटिंग में भाग लिया और निर्णय लिया गया था कि 16 अगस्त 1942 को विभिन्न थानों पर झंडा फहराया जाय।

इसी क्रम में फुलेना प्रसाद, तारा रानी, शुभलाल प्रसाद वगैरह रह गये जबकि बिरिश तिवारी के नेतृत्व में श्री प्रसाद और साथी दूसरे थाना पर फहराने चले गये। इसी क्रम में डिप्टी मजिस्ट्रेट शारदा प्रसाद सिन्हा और रमजान अली दारोगा के नेतृत्व में गोली चलाये जाने से 6 लोगों की जान गया। रास्ते में यह खबर सुनकर श्री प्रसाद बड़े दुःखी हुए। उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया- काशः हम भी होते और अपनी शहादत दे दिये होते।' इस बात का दुःख इन्हें जिंदगी भर रहा। अपने संबंधी शुभलाल प्रसाद की शहादत ने इन्हें झकझोर कर रख दिया था।

1942 में अंग्रेज इनके पीछे पड़ गये थे।अंग्रेजों ने इनके घर छप्पर को पीट कर फोड़ दिया इन्हें तार कटी, रेल लाईन तोड़-फोड़ के आरोप में गिरफ़्तार कर ले ले गये। इस बार इनकी सज़ा 7 वर्षो की हुई और ये हजारीबाग जेल भेज दिए गये। बाद में आज़ादी मिलने पर ये समय पूर्व रिहा किये गये।

इनकी भावना हमेशा कहती रही -

"मिट्टी से जिसकी पलकर हम सब बड़े हुए है,
इसके लिए मरेंगे, यह शान है तो सब कुछ है।
मरना वतन पे सीखो, जीना वतन पे सीखों,
इंसान में अगर यह अरमान है तो सबकुछ ।"

श्री प्रसाद सामाजिक कार्यकर्ता थे और बहुत ही प्रगतिशील विचार के थे। ये अंध विश्वास के मुखर विरोधी थे। आज़ादी की लड़ाई में ज्यादा योगदान देने के चलते इन्होंने अपने एक मात्र पुत्र बालदेव प्रसाद जी को उचित शिक्षा नही दिया, परन्तु उनके भीतर एक सुसंस्कार का सृजन जरूर किया।उन्होंने जीवन भर अन्याय का विरोध किया था। यही कारण था कि इन्होंने निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार करने के आरोप में दरोगा कप भी पीट दिया था। जब तक जीत रहे गांव के झगड़ों को कचहरी तक नहीं जाने दिया। आज भी इस गांव-जवार के लोग इन्हें याद करके श्रद्धा सिक्त हो जाते हैं। अंत मे 1959 में वे स्वर्गवासी हो गये।

आज भी उनके परिवार से कवि, लेखन, शिक्षाविद एवं पत्रकार के रूप में उनके पौत्र प्रो० विभाकर उनके वैचारिक दर्शन को जीवंत बनाये हुए हैं।आज़ादी के इस दीवाने के प्रति में श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ। इतिहास के पन्नो ने जरूर भुलाया हैं, परन्तु जनमानस में वे आज भी जिंदा हैं और आगे भी जिंदा रहेंगें। सचमुच-

"हमने देखा भूतन पर एक ऐसा भी इंसान,
जिसे देख झुक जाता हैं भावों का भगवान।"

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