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रंगकर्मी आशीष ने नाटक में उकेरी मजदूरों के पलायन की त्रासदी

रंगकर्मी आशीष ने नाटक में उकेरी मजदूरों के पलायन की त्रासदी
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बलिया । एएनएन (Action News Network)

रेलिया में भरि-भरि गइले पछिमवा हो। अपने ही देशवा में भइलीं रे विदेशिया..., गरीब भइल बड़ी हो सजाइया...कभी यह गीत गाता तो कभी अपने बेटे से यह संवाद 'धीरे-धीरे चल रे बाबू...' करता एक मजदूर की कथा-व्यथा बयां करता एकल नाटक 'सुगना' मजदूरों के पलायन की पृष्ठभूमि में किसी के भी कलेजे को चीर देने के लिए काफी है।

यहां बात हो रही है, बलिया में रंगमंच को अपने संघर्ष की बदौलत जिंदा रखने वाले रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी की। कोरोना के चलते पूर्णबन्दी (लॉकडाउन) में देश फिलहाल प्रवासी मजदूरों के पयालन की त्रासदी से गुजर रहा है। आशीष ने मजदूरों के दर्द को दिखाने के लिए डिजिटल प्लेटफार्म फेसबुक लाइव का सहारा लिया। कोरोना काल में पयालन को मजबूर मदन का माथे पर गठरी लेकर पैदल चलते-चलते अपने बेटे से स्थापित संवाद मन को झिंझोड़ देता है। बम्बई से बेटे सुगना के साथ चल पड़े मदन रास्ते में किन-किन परेशानियों से गुजरता है, यह देख हर किसी के आंखों में आंसू निकल आते हैं।

मजदूरों की इस त्रासदी को रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी ने एकल नाटक 'सुगना' के जरिए उकेरने की कोशिश की तो उनका यह अभिनव प्रयोग खूब सराहा गया। साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था 'संकल्प' के फेसबुक पेज पर एकल नाटक की प्रस्तुति को हजारों लोगों ने इसे देखा। इसके लिए आशीष ने अपने घर को ही रंगमंच बना दिया।

मजदूरों के पलायन को प्रदर्शित करते नाटक 'सुगना' को लोगों तक पहुंचाने में दो गज दूरी के नियम का पालन किया गया। इसमें युवा रंगकर्मी सोनी, ट्विंकल आदि ने सहयोग दिया। आशीष त्रिवेदी ने दिखाया कि कैसे गांव का युवक मदन अपने इलाके में काम नहीं मिलने पर बम्बई जाने का निर्णय लेता है। दस साल तक काम करने के बाद कोरोना आता है। इसके बाद देश में पूर्णबन्दी कर दी जाती है। जब तक पैसा रहा मदन अपने बेटे के साथ खाया-पीया। अब ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों वाले शहर मुम्बई में मदन का रहना मुश्किल हो जाता है।

मजबूरन मदन अपने बेटे के साथ पैदल ही गांव के लिए चल देता है। पैदल चलते-चलते मदन के बेटे सुगना की रास्ते में भूख और प्यास से उसी सड़क पर तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है, जिसे उसने और उसके जैसे मजदूरों ने ही बनाया था। इसके बाद मदन अपने मृत बेटे की लाश को बलिया ले जाने का निर्णय लेता है। वह कहता है कि मेरे बेटे की लाश कुछ देर बाद सड़ जाएगी। लेकिन मैं उसे बम्बई से लेकर बलिया ले जाऊंगा। ताकि इसकी दुर्गंध इतनी फैले कि लोगों का घर में रहना मुश्किल हो जाए। लोग घरों से बाहर निकलें और या तो मेरी हत्या कर दें या उनकी हत्या कर दें, जिनकी वजह से एक बच्चे की लाश उसके पिता की गोद में सड़ गई। आशीष की इस प्रस्तुति को देख आंसुओं की धार को रोक पाना कठिन है।

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