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शहर में नहीं निकलेगी रथयात्रा, 101 साल में पहली बार टूटी परंपरा

शहर में नहीं निकलेगी रथयात्रा, 101 साल में पहली बार टूटी परंपरा
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धमतरी । एएनएन (Action News Network)

शहर में महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा कीरथ यात्रा निकालने की गौरवशाली परंपरा रही है। काेरोना संक्रमण के चलते 101 साल के इतिहास में पहली बार शहर के अंदर रथयात्रा नहीं निकाली जा रही है। इससे भक्तों में निराशा है। परंपरा का निर्वहन करते हुए सोमवार को मंदिर तीनों देवी-देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा कर पूजा-अर्चना की गई।

धमतरी शहर में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा नहीं निकाली जाएगी। प्रशासन के निर्देश के बाद मंदिर समिति की ओर से हवन-पूजन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। सोमवार की अलसुबह महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और माता सुभद्रा का महास्नान कराने के बाद श्रृंगार किया गया। इसके बाद हवन-पूजन हुआ। मुख्य पुजारी पंडित बालकृष्ण शर्मा की अगुवाई में पूजा की रस्म निभाई गई।

जगन्नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष सीए अजय अग्रवाल ने बताया कि रथयात्रा नहीं निकलने के चलते 101 साल में पहली बार भगवान अपने ननिहाल जनकपुर (गौशाला) नहीं जा सकेंगे। ऐसे में जनकपुर दरबार इस साल सूना रहेगा।

मंदिर समिति के सभी सदस्यों की सहमति के बाद यह निर्णय लिया गया है। मंदिर के इस साल कोरोना संकट को देखते हुए मंदिर का पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए नहीं खोला जाएगा। रथयात्रा भी नहीं निकाली जाएगी।

ऐसी स्थिति में मंदिर में ही भगवान की प्रतिमा की रहेगी। कोरोनाकाल में भीड़ से संक्रमण का खतरा है इसलिए प्रशासन के निर्देश पर निर्णय लिया गया है। पहला ऐसा मौका है, जब 101 साल बाद शहर में रथयात्रा निकालने और भगवान मौसी के घर जाने की परंपरा टूटेंगी। मंदिर ट्रस्ट ने जिला प्रशासन के आदेश अनुसार रथयात्रा के दिन 23 जून को सुबह पांच बजे आरती के बाद मंदिर के पट दिनभर बंद रखने का फैसला लिया है।

1918 से निकाली जा रही रथयात्रा

पीढ़ियों से पूजा कर रहे पुजारी पंडित बालकृष्ण शर्मा ने बताया कि शहर के गुलाब हलवाई भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने पुरी गए थे। वहां रथयात्रा देखकर उनके मन में आया कि धमतरी में भी यह महोत्सव मनाया जाना चाहिए। साल 1908 में वे भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की मूर्ति ले आए।

उसके बाद से यहां रथयात्रा महोत्सव मनाया जा रहा है। 1914 के आसपास मूर्तियों के हाथ हिलने लगे। मूर्ति खंडित न हो जाए इसलिए लक्ष्मण दाऊ, सावतराम खंडेलवाल और पं. घासीराम 1918 में नई मूर्ति लेकर आए। उसी के बाद से आठ से 10 फीट के रथ में रथयात्रा निकाली जा रही थी।

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