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ऑनलाइन कवि गोष्ठी में रचनकारों ने समा बांधा

ऑनलाइन कवि गोष्ठी में रचनकारों ने समा बांधा
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ऋषिकेश । एएनएन (Action News Network)

कोरोना की जंग में कवि भी वायरस से दो-दो हाथ करते नजर आ रहे हैं। स्थानीय साहित्यिक संस्था 'आवाज' के तत्वावधान में ऑनलाइन कवि गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाओं ने से समा बांधागोष्ठी का आगाज सुनील थपलियाल ने किया। उन्होंने अपनी कविता-अरे सुनो !उपचार इसका, हर घर में होगा ,कोई मां जलायेगी दीपक कहीं यज्ञ प्रारंभ होगा...' के माध्यम से कोरोना को हराने में घर की भूमिका का वर्णन किया। रामकृष्ण पोखरियाल ने ने संदेश दिया-'सफर बहुत लंबा है, होशियारी से रहना होगा, थम जाएगा शोर ये, सन्नाटों से लड़ना होगा...।' धनेश कोठारी ने संदेश दिया-' मैं इसी में खुश हूं कि मेरा देश रुका नहीं ,चल रहा है खाई दर खाई के बीच, देश बैठा नहीं,चल रहा है...।'

प्रबोध उनियाल ने मजदूरों की बेचारगी पर प्रतिक्रिया दी-'भूख की ये बेबसी देखिए चल दिए पांव, गांव देखिए, धूप सिर में, बच्चा कंधे पर कभी ट्रॉली पर लदा देखिए...'। महेश चिटकारिया ने कहा-' ख़्वाबों को न देख तू ,अब जाग जा हकीकत के यूं सवाल तू न टाल जा, बुरा वक्त नहीं होता, हमेशा साथ-साथ दिया उम्मीदों का जले, ये ख्वाब पाले जा।' सत्येंद्र चौहान ने कहा- 'जितना बड़ा सेठ उतना मोटा पेट, आखिर पापी पेट का सवाल है....' आलम मुसाफिर ने अर्ज किया-'किसी का दर्द भला कोई पत्थर क्या जाने, हुआ है जख्मी किसी का सिर क्या जाने...?' रचनाकार धनीराम ने लोगों का आह्वान किया-'रहें घर में सुरक्षित, स्वीकार करें अपनों का प्यार...।'

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